प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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Read in contextप्रेमरूपा भक्ति और गौणी भक्तिका स्वरूप १०१
उसी नटवरके अंगसौरभको ही सूंघती है। जिह्वा अविच्छिन्नरूपसे
उसी प्रेसुधाका आस्वादन करती है और शरीर सर्वदा उसी
अखिल सौन्दर्यमाधुर्य-रसाम्बुधि रसराज परम सुखस्पर्श आनन्दकन्द
श्रीनन्दनन्दनके अनुपम स्पर्श-सुखका अनुभव करता है। आकाशमें
वही शब्द है, वायुमें वही स्पर्श है, अग्निमें वही ज्योति है,
जलमें वही रस है और पृथ्वीमें वही गन्ध बना हुआ है।
सबमें वही भरा है। सबमें वही अनोखी रूपमाधुरीकी झाँकी
दिखा रहा है। सर्वत्र प्रेम-ही-प्रेम, आनन्द-ही-आनन्द है।
समस्त विश्व प्रेममय, आनन्दमय, रसमय या श्रीकृष्णमय है।
सब कुछ आनन्दसे और सौन्दर्य-माधुर्यसे भरा है। दृश्य,
द्रष्टा सभी मधुर हैं; हम-तुम सभी मधुर हैं; उस परमानन्द-
रस-सुधामय मधुराधिपतिक सब कुछ मधुर है। 'मधु वाता
ऋतायते, मधु क्षरन्ति सिन्धवः, माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः, मधुमत्
पार्थिवं रजः' सर्वत्र मधु-ही-मधु। इस प्रकार प्रेमी भक्तकी
दृष्टिमें सर्वत्र प्रेममय भगवान् हैं और भगवान्की दृष्टिमें
भक्त। भगवान्ने कहा ही है—
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥
(गीता ६।३०)
'जो मुझे सर्वत्र देखता है और सबको मुझमें देखता है, न कभी
मैं उसकी आँखोंसे ओझल होता हूँ और न वह मेरी आँखोंसे ओझल
होता है।'
इस अवस्थामें प्रेमी भक्त जिस नित्य महान् दिव्य प्रेमामृत-
रससागरमें मग्न रहता है, वह सर्वथा अनिर्वचनीय है। यही
प्रेमाभक्ति या पराभक्तिका स्वरूप है। यही महान् भूमानन्द है,