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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

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DevanagariHindipublished178 pages

Page 102 of 178

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Page 102

१०० प्रेम-दर्शन
ब्रह्म नहीं, माया नहीं, नहीं जीव, नहिं काल।
अपनीहू सुधि ना रही, रह्यौ एक नँदलाल॥
को कासों केहि बिधि कहा, कहै हृदैकी बात।
हरि हेरत हिय हरि गयो हरि सर्वत्र लखात॥
ऐसी अवस्थामें उसके कानमें जो कुछ भी आवाज आती है, वह
केवल प्रेममयके प्रेमसंगीतकी स्वरलहरी ही होती है; वह सर्वदा
उसकी मुरलीकी मीठी तानमें मस्त रहता है। इसी प्रकार उसके
मुखसे भी प्रेममयको छोड़कर दूसरा शब्द नहीं निकलता। वह
प्रेममयका गुण गाते-गाते कभी थकता ही नहीं, बात-बातमें उसे
केवल दिव्य प्रेमरसामृतका ही अनुपम स्वाद मिलता रहता है
और वह अतृप्त रसनासे सदा उसी अमृतरसपानमें मत्त रहता है।
उसके चित्तमें तो दूसरेके लिये स्थान ही नहीं रह गया। वहाँ
एकमात्र प्रियतमका ही अखण्ड साम्राज्य और पूर्ण अधिकार है।
ऐसा जरा-सा भी स्थान नहीं, जहाँ किसी दूसरेकी कल्पनाकी
स्मृति छायारूपसे भी आ सके। चित्त साक्षात् प्रियतमके प्रेमका
स्वरूप ही बन जाता है; इस अवस्थाका अनुमान करते हुए कवि
कहता है—
कानन दूसरो नाम सुनै, नहिं एकहि रंग रँगो यह डोरो।
धोखेहुँ दूसरो नाम कढ़ै, रसना मुख बाँधि हलाहल बोरो॥
ठाकुर चित्तकी वृत्ति यहै, हम कैसेहुँ टेक तजैं नहिं भोरो।
बावरी वे अँखियाँ जरि जायँ जो साँवरो छाँड़ि निहारति गोरो॥
समस्त अंग केवल उसीका अनुभव कर रहे हैं। सम्पूर्ण
इन्द्रियाँ उसीको विषय करती हैं। आँखें अहर्निश सम्पूर्ण
विश्वको श्याममय देखती हैं। कान सदा उसीकी मधुरातिमधुर
शब्द-ब्रह्ममयी वेणुध्वनि सुनते हैं। नासिका नित्य-निरन्तर