प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
Page 101 of 178
Read in contextप्रेमरूपा भक्ति और गौणी भक्तिका स्वरूप ९९
५५-इस प्रेमको पाकर प्रेमी इस प्रेमको ही देखता है,
प्रेमको ही सुनता है, प्रेमका ही वर्णन करता है और प्रेमका
ही चिन्तन करता है।
परम प्रेमके दिव्य रसमें डूबा हुआ प्रेमानन्दमय प्रेमी
सर्वत्र अपने प्रेममय, रसमय प्रियतमको ही देखता है। उसे
कहीं दूसरी वस्तु दीखती ही नहीं। ऐसी ही स्थितिमें एक गोपी
कहती है—
जित देखौं तित स्याममई है।
स्याम कुंज बन जमुना स्यामा, स्याम गगन घनघटा छई है॥
सब रंगनमें स्याम भरो है, लोग कहत यह बात नई है।
मैं बौरी, की लोगन ही की स्याम पुतरिया बदल गई है॥
चंद्रसार रबिसार स्याम है, मृगमद स्याम काम बिजई है।
नीलकंठको कंठ स्याम है, मनो स्यामता बेल बई है॥
श्रुतिको अच्छर स्याम देखियत, दीपसिखापर स्यामतई है।
नर देवनकी कौन कथा है, अलख ब्रह्म छबि स्याममई है॥
दूसरा भक्त कहता है—
बाटनमें घाटनमें बीथिनमें बागनमें,
बृच्छनमें बेलिनमें बाटिकामें बनमें।
दरनमें दीवारनमें देहरी दरीचनमें,
हीरनमें हारनमें भूषनमें तनमें॥
काननमें कुंजनमें गोपिनमें गायनमें,
गोकुलमें गोधनमें दामिनमें घनमें।
जहाँ-जहाँ देखौं तहाँ स्याम ही दिखाई देत,
सालिग्राम छाइ रह्यो नैननमें मनमें॥
कहि न जाय मुखसों कछू स्याम-प्रेमकी बात।
नभ जल थल चर अचर सब स्यामहि स्याम दिखात ॥