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नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

पृष्ठ 16, कुल 309 में से

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पृष्ठ 16

नाटक का कर्ता

श्री हर्ष के नाम से तीन नाटक — रत्नावली, प्रियदर्शिका तथा
नागानन्द — दो स्तोत्र और कुछ फुटकल कविता हमें प्राप्त हुई है।
तीनों नाटक एक ही हाथ की कृतियां हैं। इस पक्ष के समर्थन
में हमारे पास कई प्रमाण हैं। सब की प्रस्तावना में श्री हर्ष को सिद्ध-
हस्त कवि बताया गया है। प्रियदर्शिका के दो श्लोक नागानन्द में भी-
मिलते हैं और एक श्लोक रत्नावली में। कई गद्यांश भी मिलते जुलते
हैं और कई स्थितियां भी एक जैसी हैं तीनों नाटकों में भाव, रस और
शैली की इतनी समानता है कि एक को दूसरे से अलग करना असम्भव
है।
फिर वह कर्ता कौन है ? इस विषय में मम्मट की उक्ति ने
संशय उत्पन्न कर दिया है, जिस से साहित्यकों में मत-भेद है। अपने
ग्रन्थ 'काव्य प्रकाश' के आरम्भ में उन्होंने लिखा है— "काव्यं
यशसेऽर्थकृते। कालिदासादीनामिव यशः। श्रीहर्षादेर्धावकादीनामिव
धनम्।" कहीं कहीं 'धावक' के स्थान पर 'बाण' का भी नाम है।
जिस से पिशल आदि कई विद्वान 'धावक' को और हॉल तथा व्यूह्लर
आदि कई महानुभाव 'बाण' को इन नाटकों का कर्ता मानते हैं।
"अर्थकृते" ही उनके इस निश्चय का आधार है। उन का कहना है कि
इन्होंने लिखकर धन के लिए इन को राजा हर्ष के पास बेच दिया,
जिस ने अपने नाम के नीचे प्रकाशित किए। परन्तु ऐसा समझना
भ्रान्ति है। मम्मट की उक्ति तो श्री हर्ष की उदारता और दानशीलता
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