मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
प्रारंभिक पृष्ठ एवं मुहूर्त-शास्त्र मंगलाचरण
दैवज्ञ राम-विरचित
मुहूर्त्तचिन्तामणि
सान्वय
(भाषा-टीका-सहित)
टीकाकार
पंडित रामरत्न अवस्थी
संपादक
चण्डिका प्रसाद अवस्थी
प्रकाशक
तेजकुमार बुक डिपो (प्रा०) लिमिटेड
उत्तराधिकारी - नवल किशोर प्रेस, लखनऊ
दसवाँ संस्करण ] सन् २००४ ई० [ मूल्य ६० रुपये
ॐ नमः शिवाय
विषय-सूची
विषय पृष्ठ
शुभाशुभप्रकरण
मङ्गलाचरण ... १
तिथीशचक्र ... २
नन्दातिथिसंज्ञाचक्र ... ३
तिथिवारमृत्युयोगचक्र ... ४
नक्षत्रवारदग्धयोगचक्र ... ४
अधम तिथियों का चक्र ... ५
दग्धविषाख्यहुताशनचक्र ... ६
यमघंटचक्र ... ६
शून्यतिथिचक्र ... ७
निन्द्य तिथि और निन्द्य नक्षत्र ... ७
चैत्रादि मासों में शून्य नक्षत्र ... ८
चैत्रादि मासों में शून्य राशियां ... ८
प्रतिपदादि विषम तिथियों में
दग्ध लग्नें ... ६
पूर्वोक्त दुष्ट योगों का परिहार ... ६
शुभ कर्मों में निषिद्ध योग ... ६
गृहप्रवेश, यात्रा तथा विवाह में
त्याज्य वार, नक्षत्र ... १०
आनन्दादि अट्ठाइस योग ... १०
योगों के जानने का उपाय ... ११
आनन्दादि चक्र ... १२
दुष्टयोगों का परिहार ... १३
संपूर्ण दोषों का नाशक रवियोग ... १३
सर्वार्थसिद्धियोग ... १३
सर्वार्थसिद्धियोगचक्र ... १४
उत्पातादियोगचतुष्टय चक्र ... १४
निन्दितयोगों का परिहार ... १५
संपूर्ण कृत्यों में वर्जनीय वस्तुएँ ... १५
सूर्य और चन्द्रग्रहण के त्याज्य नक्षत्र
और दिन ... १६
विषय पृष्ठ
त्याज्य नक्षत्र और योग आदि ... १६
पक्षरन्ध्र तिथि और उनका परिहार ... १७
कुलिक आदि दुष्ट मुहूर्त ... १७
प्रकारान्तर से वर्जित मुहूर्त ... १८
देशभेद से होलाष्टक का निषेध ... १९
चन्द्रमा अनुकूल होने से दुष्ट योग भी
शुभ होते हैं ... १८
अन्य परिहार ... २०
भद्रा आदि का परिहार ... २०
भद्राकाल ... २०
भद्रा के मुख और पुच्छ का विचार ... २०
भद्रा का निवास और फल ... २१
शुक्रास्त आदि में वर्जनीय क्रिया ... २१
सिंह और मकरराशि में स्थित बृहस्पति
का दोष ... २२
सिंहस्थ बृहस्पति-दोष का परिहार ... २२
लुप्त संवत्सर-दोष और उसका
परिहार ... २४
होरासिद्धि के लिए वारप्रवृत्ति ... २४
कालहोरा ... २५
कलहोरा का प्रयोजन ... २५
संपूर्ण कार्यों में निषिद्ध मन्वादि और
युगादि तिथियाँ ... २६
--नक्षत्रप्रकरण
नक्षत्रों के स्वामी ... २६
नक्षत्र-स्वामियों का चक्र ... २७
नक्षत्रों की संज्ञा ... २७
नक्षत्रों की अधोमुखादि संज्ञा ... २९
मूंगा और दाँत आदि धारण करने
का मुहूर्त ... ३०
नवीन वस्त्र के जलने आदि का
शुभाशुभ फल ... ३०
( २ )
विषय पृष्ठ | विषय पृष्ठ
वस्त्रनवधाचक्र ... ३१ | वीरसाधन व अभिचार का मुहूर्त ४४
निन्द्यकाल में भी वस्त्रधारण ... ३१ | रोग शान्त होने पर स्नान का मुहूर्त ४४
राजदर्शन, मद्यारम्भ और गो-क्रय- | शिल्पविद्या के आरम्भ का मुहूर्त ... ४५
विक्रय का मुहूर्त ... ३१ | सन्धि करने का मुहूर्त ... ४५
पशुओं के पालने का मुहूर्त ... ३२ | परीक्षा का मुहूर्त ... ४५
औषध और सूचीकर्म का मुहूर्त ... ३२ | सब शुभ कार्यों में लग्नशुद्धि ... ४६
क्रय-विक्रय मुहूर्तों का परस्पर निषेध | जिन नक्षत्रों में ज्वर आने से मृत्यु हो
तथा क्रयमुहूर्त ... ३३ | जाती है अथवा जितने दिनों तक
विक्रय और विपणि का मुहूर्त ... ३३ | ज्वर रहता है उनका वर्णन ... ४६
घोड़ा और हाथी के कृत्य का मुहूर्त ... ३४ | रोगी के शीघ्र ही मरने का योग ४७
भूषाघटनादि का मुहूर्त ... ३४ | प्रेतक्रिया का मुहूर्त ... ४७
मुद्रापातन और वस्त्रक्षालन का | त्रिपुष्करयोग और उसका फल ... ४८
मुहूर्त ... ३
( ३ )
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उक्त संज्ञाओं का प्रयोजन ... ५८ | निन्दित प्रथम रजोदर्शन ... ७५
कर्क संक्रान्ति के रविवारादि में अब्द- | प्रथम रजस्वला के स्नान का मुहूर्त ... ७५
विशोषक ... ५६ | गर्भादान का मुहूर्त ... ७६
कर्कसंक्रान्ति में अब्दविशोषकचक्र ... ५६ | गर्भाधान में लग्नबल ... ७६
संक्रान्तियों के वाहन, वस्त्र, आयुध, | सीमन्तोन्नयन मुहूर्त ... ७७
भक्ष्य और लेपन आदि का विचार ... ६० | गर्भाधान से लेकर प्रसव पर्यंत
संक्रांतिवश से शुभाशुभ फल ... ६२ | महीनों के स्वामी ... ७७
संक्रान्ति के नक्षत्र से जन्म-नक्षत्रचक्र ... ६२ | पुंसवन का मुहूर्त ... ७८
सूर्यादि के बली रहते कार्य और | जातकर्म और नामकर्म का मुहूर्त ... ७८
संक्रान्ति करते हुए ग्रहों का बल ... ६३ | प्रसूता स्त्री के स्नान करने का
अधिकमास और क्षय मास का निर्णय ६३ | मुहूर्त ... ७६
अथ गोचरप्रकरण | प्रथम आदि महीनों में बालक के दाँत
सूर्यादि ग्रहों का शुभ व विद्ध विचार ... ६४ | निकलने का फल ... ७६
वामवेध और शुक्लपक्ष में चन्द्रमा | दोलारोहण का मुहूर्त ... ७६
का बल ... ६६ | जलपूजा का मुहूर्त ... ८१
क्रमवेध और विपरीतवेध में मतभेद ... ६७ | अन्नप्राशन का मुहूर्त ... ८१
ग्रहणनक्षत्र का फल ... ६८ | अन्नप्राशन के लिए लग्न-शुद्धि ... ८२
चन्द्रमा का विशेष शुभाशुभत्व ... ६८ | अन्नप्राशन मुहूर्त में ग्रहों का फल ... ८२
प्रकारान्तर से चन्द्रमा का शुभाशुभ फल ६६ | बालकों को भूमि में बैठाने का
ग्रहों की शांति के लिए नव-रत्नों का | मुहूर्त ... ८३
धारण ... ६६ | बालक की जीविका-परीक्षा का
प्रत्येक ग्रह की प्रसन्नता के लिए | मुहूर्त ... ८३
माणिक्यादि का धारण ... ७० | ताम्बूलभक्षणमुहूर्त ... ८३
ताराओं के नाम और फल ... ७० | कर्णवेध मुहूर्त ... ८३
दुष्ट तारा का परिहार ... ७१ | कर्णवेध में लग्नशुद्धि ... ८५
चन्द्रमा की अवस्था ... ७१ | मुण्डन आदि में निषिद्ध काल ... ८५
अवस्थाओं के नाम और फल ... ७२ | शुक्र और बृहस्पति की बाल्यावस्था ... ८६
ग्रहदोष की शान्ति के लिए औषध- | मतान्तर से बाल्यवृद्धावस्था ... ८६
युक्त जल से स्नान ... ७२ | चूड़ाकर्म का मुहूर्त ... ८७
ग्रह गन्तव्य राशि का फल कितने | जिसकी माता गर्भवती हो उसके
दिन पहले देने लगते हैं ... ७३ | मुण्डन का मुहूर्त ... ८७
दुष्ट योगादि की शांति के लिए दान ... ७३ | तारा-दोष का अपवाद ... ८८
राश्यन्तर में गये हुए ग्रहों के फल देने | मुण्डन आदि कार्यों में निषिद्ध काल ... ८८
का काल ... ७३ | साधारण क्षौर आदि का मुहूर्त और
संस्कारप्रकरण | निषेध ... ८६
प्रथम रजोदर्शन में उत्तम, मध्यम, | निमित्तवश क्षौरकर्म ... ८६
निकृष्ट नक्षत्र ... ७४ | क्षौरकर्म में राजाओं के लिए विशेष ... ८६
( ४ )
विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ
अक्षरारम्भ का मुहूर्त | ६० | शान्ति का उपाय | १०२
विद्यारम्भ का मुहूर्त | ६० | प्रश्न के समय प्रथम सन्तान का |
वर्णक्रम से यज्ञोपवीत का समय | ६१ | विचार | १०२
यज्ञोपवीत के नक्षत्रादि | ६१ | प्रश्नकाल में साधारण शुभाशुभ |
यज्ञोपवीत में लग्नदोष | ६२ | फल | १०३
यज्ञोपवीत में लग्न के गुण | ६२ | कन्यावरण मुहूर्त | १०३
वर्णेश और शाखेश | ६३ | वरवरण अर्थात् फलदान का मुहूर्त | १०३
शाखेश और वर्णेश का प्रयोजन | ६३ | विवाहकाल में ग्रहशुद्धि | १०४
जन्म मासादि का यज्ञोपवीत में | | विवाह के महीने | १०४
अपवाद | ६३ | सन्तानभेद से जन्ममासादि अशुभ |
बृहस्पति का बल | ६४ | और शुभ विवाह | १०४
गुरुदोषापवाद | ६४ | ज्येष्ठ मास में विशेष | १०५
यज्ञोपवीत में निषिद्ध समय | ६४ | विवाहादि विशेष का निषेध | १०५
सूर्यादि ग्रहों के नवांश में यज्ञोपवीत | | विपत्ति में विवाहविचार | १०६
होने का फल | ६५ | उक्त विषय पर विशेष | १०६
यज्ञोपवीत में चन्द्रनवांश का फल | ६५ | दुष्ट नक्षत्रों में उत्पन्न वरकन्या का |
केन्द्रस्थित सूर्यादि ग्रहों का फल | ६६ | फल | १०७
यज्ञोपवीतकाल में संयुक्त ग्रहों का | | अष्टकूट | १०७
फल | ६६ | वर्णकूट | १०८
यज्ञोपवीत में चन्द्रवश से शुभाशुभ | | वश्यकूट | १०८
योग | ६६ | ताराकूट | १०६
अनध्यायसंज्ञक तिथियाँ | ६७ | योनिकूट | १०६
प्रदोष-लक्षण | ६७ | ग्रहमैत्रीकूट | ११०
ब्रह्मौदन के पहले उत्पात होने पर | | गणकूट | १११
शान्ति का विधान | ६७ | गणों का फल | ११२
वेदों के भेद से यज्ञोपवीत के नक्षत्र | ६८ | भकूट | ११२
यज्ञोपवीतादि में धर्मशास्त्र का | | दुष्ट भकूट का उद्धार | ११३
विचार | ६८ | दुष्ट गणकूट, भकूट और ग्रहकूटों |
छुरिकाबन्धन का मुहूर्त | ६६ | का परिहार | ११४
केशान्तकर्म का मुहूर्त | ६६ | नाड़ीविचार | ११४
विवाहप्रकरण | | अन्य प्रकार का वर्गकूट | ११५
विवाहप्रश्नविधि | १०० | अवर्गादि चक्र | ११५
विवाहकारक अन्य योग | १०० | नक्षत्र और राशि के एक और भिन्न |
वैधव्य योग | १०१ | होने का विचार | ११६
कुलटा और मृतवत्सायोंग | १०१ | राशियों के स्वामी | ११६
विवाहभंगयोग | १०१ | राशीशचक्र | ११६
जन्मकालिक बालविधवायोग की | | नवांशचक्र | ११७
( ५ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| होरा | ११७ | उपग्रहदोष | १३३ |
| त्रिंशांश | ११८ | पातादि दोषों पर विशेष | १३३ |
| त्रिंशांशचक्र | ११८ | अशुभ अर्द्धयामचक्र | १३४ |
| द्रेष्काण | ११८ | कुलिकदोष | १३४ |
| द्रेष्काणचक्र | ११८ | कुलिकमुहूर्तचक्र | १३५ |
| द्वादशांशविधि | ११८ | दग्धातिथि | १३५ |
| द्वादशांशचक्र | १२० | दग्धातिथिचक्र | १३५ |
| षड्वर्ग | १२० | जामित्रदोष | १३५ |
| नक्षत्रों की पूर्वार्धयोगि आदि संज्ञा और उनका फल | १२० | एकार्गल आदि दोषों का परिहार | १३६ |
| स्वामी और सेवक के जन्मनक्षत्र का विचार | १२१ | देशभेद से उक्त दोषों का परिहार | १३६ |
| गण्डान्त का दोष | १२१ | दश दोष | १३६ |
| कर्तरीदोष | १२२ | उक्त दश दोषों का फल | १३७ |
| संग्रहदोष | १२३ | दक्षिण देशों में प्रसिद्ध बाणदोष | १३८ |
| अष्टम स्थान का दोष और उसका परिहार | १२३ | अन्य बाणदोष | १३८ |
| अन्य परिहार | १२३ | बाणदोष का परिहार | १४० |
| आठवीं राशि के नवांशादि और बारहवीं राशि का दोष | १२४ | ग्रहों की दृष्टि | १४० |
| विषघटी दोष | १२४ | लग्नस्थान की शुद्धि | १४१ |
| दिन के पन्द्रह मुहूर्त | १२६ | लग्न से सातवें भाव की शुद्धि | १४२ |
| रात्रि के पन्द्रह मुहूर्त | १२६ | अन्य प्रकार से लग्न और सातवें भाव की शुद्धि | १४२ |
| आदित्यादि वारों में निषिद्ध मुहूर्त | १२७ | सूर्यसंक्रान्ति का दोष | १४३ |
| विवाह के नक्षत्र और अभिजित् नक्षत्र का मान | १२७ | सूर्यादि ग्रहों की संक्रान्तियों में निषिद्ध काल | १४३ |
| ग्रहों द्वारा नक्षत्रों का वेध | १२८ | पंगु और आन्धादि लग्नदोष | १४३ |
| सप्तशलाकाचक्र में ग्रहों द्वारा नक्षत्रों का वेध | १२६ | मतान्तर से पंगु आदि दोष | १४४ |
| सप्तशलाकाचक्र | १३० | पंग्वादि लग्नों का फल | १४४ |
| क्रूरग्रहों से बिद्ध नक्षत्रों का दोष और उसका परिहार | १३० | शुभनवांश | १४५ |
| लत्तादोष | १३१ | विहित नवांशों में भी किसी का निषेध | १४५ |
| पातयोग | १३१ | सर्वथा लग्नभङ्ग योग | १४५ |
| क्रान्तिसाम्ययोग | १३२ | विवाहकालिक शुभग्रह | १४६ |
| एकार्गलदोष | १३२ | कर्तरी आदि महादोषों का परिहार | १४६ |
| वर्षा आदि अनेक दोषों का परिहार | १४७ | ||
| अन्य दोषों का परिहार | १४७ | ||
| सामान्य दोषों का परिहार | १४७ |
( ६ )
विषय पृष्ठ | विषय पृष्ठ
लग्न का विंशोपक बल ... १४८ अग्न्याधानप्रकरण
श्वश्रूवादि के सुख-दुःख जानने का लग्नशुद्धि ... १६२
उपाय ... १४८ अग्न्याधानकालिक लग्नवश से यज्ञ-
संकरवर्णों के विवाह का मुहूर्त ... १४६ कारक योग ... १६२
गान्धर्वादि विवाह में और त्रिपदी- राजाभिषेकप्रकरण
चक्र में नक्षत्रशुद्धि ... १४६ नक्षत्र तथा लग्नशुद्धि ... १६३
सूर्य के नक्षत्र से अशुभ और शुभ राजाभिषेक काल में ग्रहस्थिति फल ... १६३
नक्षत्र ... १५० सम्पत्ति तथा पृथ्वीस्थिति ये दो
विवाह से पूर्व होनेवाले कार्यों का योग ... १६४
मुहूर्त ... १५० यात्राप्रकरण
वेदी के लक्षण तथा मंडप का प्रश्नकालिक शुभयात्रा योग ... १६५
उद्वासन ... १५० प्रश्नकालिक अशुभयात्रा योग ... १६६
मंडप के खम्भ गाड़ने का मुहूर्त ... १५१ प्रश्नद्वारा यात्रा की दिशा का
स्तम्भचक्र ... १५१ निर्णय ... १६६
गोधूलिप्रशंसा ... १५१ मासभेद से यात्रा के शुभाशुभ भेद
समय-भेद से गोधूलिकाल ... १५२ और तारा ... १६७
गोधूलि-समय में त्याज्य दोष ... १५२ यात्रा में निषिद्ध तिथि और विहित
सूर्य की स्पष्टगति ... १५३ तिथि ... १६७
सूर्य स्पष्ट करने की रीति ... १५३ वांरशूल और नक्षत्रशूल ... १६८
लग्नघटिका साधनार्थ लग्नभुक्तांश- कालविशेष में विशेष नक्षत्रों का
साधन ... १५४ निषेध ... १६८
लग्न और सूर्य से इष्टकालसाधन ... १५४ यात्रा में मध्यम नक्षत्र तथा कई
लखनऊ का लग्नमान ... १५५ निषिद्ध नक्षत्रों की त्याज्य घटी ... १६६
इष्टकाल बनाने की विशेष रीति ... १५५ अन्य मत से त्याज्य घटी ... १६६
शुभ कार्यों में अवश्य त्यागने योग्य •नक्षत्रों की जीवपक्षादि संज्ञा ... १६६
दोष ... १५६ जीवपक्षादि संज्ञा चक्र ... १७०
कन्या आदि के तेल आदि लगाने जीवपक्षादि का विशेष फल ... १७०
की संख्या ... १५८ युद्धयात्रा के उपयोगी कुलाकुल
वधूप्रवेश प्रकरण संज्ञक तिथि, वार और नक्षत्र ... १७१
वधूप्रवेश का मुहूर्त ... १५६ पन्थाराहु का विचार ... १७२
विवाह के बाद प्रथम वर्ष के महीनों पन्थाराहुचक्र ... १७३
में स्वामी के घर में स्त्री के रहने पन्थाराहुचक्रफल ... १७३
का फल ... १५६ पौषादि मासों की परिवादि तिथियों
द्विरागमन प्रकरण में पूर्वादि दिशाओं की यात्रा का
सम्मुख और दक्षिण शुक्र का दोष ... १६० शुभाशुभ फल ... १७३
शुक्रदोष का परिहार ... १६१ तिथिचक्र ... १७५
( ७ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| सर्वांक योग | १७६ | शुभलग्न | १८६ |
| महाडल और भ्रमण योग | १७६ | दिशाओं के स्वामी | १८७ |
| हिम्बराख्य योग | १७७ | दिक्स्वामिचक्र | १८७ |
| घातचन्द्र योग | १७७ | दिग्गीश कहने का प्रयोजन | १८७ |
| घातचन्द्रचक्र | १७७ | लालाटिक योग | १८८ |
| घातक नक्षत्रपाद | १७७ | प्रास्थानिक यात्रायोग | १८८ |
| घातक नक्षत्रपादचक्र | १७८ | समयबल | १८६ |
| घातक तिथियाँ | १७८ | लग्नादि बारह भावों के नाम | १८६ |
| व्राततिथिचक्र | १७६ | यात्रा में ग्रहों का शुभाशुभ फल | १६० |
| घातक वार | १७६ | यात्रा के अधिकारी | १६० |
| घात वारचक्र | १७६ | योगयात्रा | १६० |
| घातक नक्षत्र | १७६ | यात्राकालिक योगादि | १६५ |
| घातनक्षत्रचक्र | १८० | विजयादशमी की प्रशंसा | १६६ |
| तिथियोगिनी | १८० | यात्रा में चित्तशुद्धि की प्रधानता | १६६ |
| योगिनीचक्र | १८० | यात्राप्रतिबन्धक कार्य | १६६ |
| घातक लग्न | १८० | यात्राविशेष का विचार | १६७ |
| घातक लग्नचक्र | १८१ | यात्रा में रिक्तनवमी दोष | १६७ |
| कालपाशयोग | १८१ | यात्राकाल में कर्तव्य विधि | १६८ |
| कालपाशचक्र | १८२ | नक्षत्रदोहद | १६८ |
| परिघदण्डदोष | १८२ | दिग्दोहद | १६६ |
| परिघदण्डचक्र | १८२ | वारदोहद | १६६ |
| आग्नेयादि कोणों की यात्रा तथा परिघदण्ड का अपवाद | १८३ | तिथिदोहद | १६६ |
| परिघदण्ड का अन्य अपवाद तथा केन्द्र आदि स्थानों में वक्री ग्रह का निषेध | १८३ | यात्रा का अन्य प्रकार | २०० |
| दिशाओं के वाहन | २०० | ||
| यात्रा करने का स्थान | २०० | ||
| प्रस्थानविधि | २०१ | ||
| अयनशुद्धि | १८३ | मतभेद से प्रस्थान कितनी दूर पर करना चाहिए | २०१ |
| सम्मुख शुक्रदोष | १८४ | प्रस्थान की स्थिति का प्रमाण तथा यात्रा में त्याज्य वस्तु | २०२ |
| वक्रनीचादिस्थित शुक्रदोष | १८४ | यात्रा के अन्य नियम | २०३ |
| कालविशेष में शुक्रदोषाभाव तथा अस्तादि विचार | १८५ | आवश्यक यात्रा में अकालवृष्टि की शान्ति | २०३ |
| लग्नविशेष का त्याग | १८५ | शुभ शकुन | २०४ |
| मीन और मीन के नवांश का फल तथा शुभलग्न | १८५ | अशुभ शकुन | २०४ |
| अन्य अनिष्ट लग्न | १८६ | अन्य शकुन | २०५ |
| अन्य शुभ लग्न | १८६ | वामभाग में शुभ शकुन | २०६ |
| सम्मुख तथा पृष्ठगत लग्न | १८६ |
( ८ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| दक्षिणभाग में शुभ शकुन ... | २०६ | अन्य प्रकार से सौर चान्द्रमासों | |
| साधारण शकुन ... | २०६ | की एकता ... | २१६ |
| अशुभ शकुन का उद्धार ... | २०७ | तिथियों के क्रम से द्वार का निषेध ... | २२० |
| यात्रा से लौटने पर गृहप्रवेश का | गृहारम्भ में पञ्चांगशुद्धि ... | २२० | |
| मुहूर्त ... | २०७ | देवालय आदि के स्थानभेद से | |
| पूर्वोक्त दोषों का पुनः परिगणन ... | २०८ | राहु का मुख ... | २२१ |
| लग्न के दोषों का पुनः परिगणन ... | २०८ | राहुचक्र ... | २२२ |
| घर में कूप बनाने की विधि ... | २२२ | ||
| वास्तुप्रकरण | गृह-कूपचक्र ... | २२२ | |
| मकान के भीतर कहाँ कौन घर | |||
| राशिद्वारा निषि |
मुहूर्त्तचिन्तामणि
भाषा-टीका सहित
❖ :०: ❖
शुभाशुभप्रकरण
मंगलाचरण
गौरीश्रवःकेतकपत्रभङ्गमाकृष्य हस्तेन ददन्मुखाग्रे ।
विघ्नं मुहूर्त्तकलितद्वितीयदन्तप्ररोहो हरतु द्विपास्यः ॥ १ ॥
अन्वयः—गौरीश्रवःकेतकपत्रभंगं हस्तेन आकृष्य मुखाग्रे ददत् (अतएव) मुहूर्त्ता
कलितद्वितीयदन्तप्ररोहो द्विपास्यः (अस्माकं) विघ्नं हरतु ॥ १ ॥
श्रीपार्वतीजी के कान में स्थित केतकी के फूल के दल को सूँड़ से लेकर
ओष्ठ पर धरते समय मुहूर्त्तभर दूसरे दाँत के सदृश करने वाले श्रीगणेशजी
हमारे विघ्न को हरें ॥ १ ॥
ग्रन्थ रचने का प्रयोजन
क्रियाकलापप्रतिपत्तिहेतुं संक्षिप्तसारार्थविलासगर्भम् ।
अनन्तदैवज्ञसुतः स रामो मुहूर्त्तचिन्तामणिमातनोति ॥ २ ॥
अन्वयः—अनन्तदैवज्ञसुतः स रामः क्रियाकलापप्रतिपत्तिहेतुं संक्षिप्तसारार्थविलासगर्भ-
मुहूर्त्तचिन्तामणि आतनोति ॥ २ ॥
अनन्त दैवज्ञ के पुत्र राम मुहूर्त्तचिन्तामणि नाम ग्रन्थ की रचना करते हैं ।
यह ग्रन्थ जातकर्म आदि अनेक कर्मों के करने वा न करने योग्य शुभाशुभ
मुहूर्त्त के जानने का कारण है और इसमें थोड़े शब्दों में मुख्य अर्थ प्रकट
२ मुहूर्त्तचिन्तामणि
किये गये हैं । मुहूर्त्तचिन्तामणि के दो अर्थ हैं । पहिला यह कि दिन और
रात्रि के पन्द्रहवें भाग को और किसी कार्य को करने के लिए विचारे हुए
शुभाशुभ काल को मुहूर्त्त कहते हैं । उसके शुभाशुभत्व के विचारने के लिए
जितने ग्रन्थ हैं उन सबों में श्रेष्ठ । दूसरा अर्थ यह है कि वाञ्छित फल
देनेवाले मणि के सदृश वाञ्छित मुहूर्त्तों का ज्ञांन करानेवाला ग्रन्थ ॥ २ ॥
तिथीशा वह्निकौ गौरी गणेशोऽहिर्गुहो रविः ।
शिवो दुर्गान्तको विश्वे हरिः कामः शिवः शशी ॥ ३ ॥
अन्वयः—वह्निः, कः, गौरी, गणेशः, अहिः, गुहः, रविः, शिवः, दुर्गा, अन्तकः, विश्वे,
हरिः, कामः, शिवः, शशी, (एते) तिथीशाः (ज्ञेयाः) ॥ ३ ॥
अग्नि, ब्रह्मा, पार्वती, गणेश, सर्प, कार्त्तिकेय, सूर्य, शिव, दुर्गा, यम,
विश्वेदेव, हरि, कामदेव, शिव और चन्द्रमा ये देवता क्रम से प्रतिपदादि
पन्द्रह तिथियों के स्वामी हैं, अर्थात् प्रतिपदा के अग्नि, द्वितीया के ब्रह्मा,
तृतीया के पार्वती, चतुर्थी के गणेश, पंचमी के सर्प, षष्ठी के कार्त्तिकेय,
सप्तमी के सूर्य, अष्टमी के शिव, नवमी के दुर्गा, दशमी के यम, एकादशी
के विश्वेदेव, द्वादशी के हरि, त्रयोदशी के कामदेव, चतुर्दशी के शिव,
पूर्णमासी के चन्द्रमा और अमावस के पितर स्वामी हैं । जिन तिथियों के
जो स्वामी हैं, उन देवताओं की पूजा वा प्रतिष्ठा आदि उन्हीं तिथियों में
करने से शुभदायक होते हैं ॥ ३ ॥
तिथीशचक्र
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | ३० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अग्नि | ब्रह्मा | पार्वती | गणेशजी | सर्प | कार्त्तिकेय | सूर्य | शिव | दुर्गा | यम | विश्वेदेव | हरि | काम | शिव | चन्द्र | पितर |
| तिथियों की नन्दादि संज्ञा और उनका शुभाशुभत्व | |||||||||||||||
| नन्दा च भद्रा च जया च रिक्ता पूर्णेति तिथ्योऽशुभमध्यशस्ताः । | |||||||||||||||
| सितेऽसिते शस्तसमाधमाः स्युः सितज्ञभौमार्कगुरौ च सिद्धाः ॥ ४ ॥ | |||||||||||||||
| अन्वयः—सिते (शुक्ले) नन्दा च भद्रा च जया च रिक्ता पूर्णा इति तिथ्यः | |||||||||||||||
| अशुभमध्यशस्ताः (ज्ञेयाः) । असिते (कृष्णपक्षे) शस्तसमाधमाः स्युः । च (पुनः) | |||||||||||||||
| सितज्ञभौमार्कगुरौ (क्रमेण) सिद्धाः (सिद्धयोगाः स्युः) ॥ ४ ॥ |
शुभाशुभप्रकरण ३
नन्दा, भद्रा, जया, रिक्ता, पूर्णा—ये प्रतिपदा से पञ्चमी पर्यन्त, षष्ठी से
दशमी पर्यन्त और एकादशी से पूर्णमासी पर्यन्त तिथियों की संज्ञा हैं,
अर्थात् प्रतिपदा, षष्ठी, एकादशी—इनकी नन्दा संज्ञा; द्वितीया, सप्तमी,
द्वादशी—इनकी भद्रा संज्ञा; तृतीया, अष्टमी, त्रयोदशी—इनकी जया संज्ञा;
चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी—इनकी रिक्ता संज्ञा और पञ्चमी, दशमी, पूर्णमासी
और अमावस—इनकी पूर्णा संज्ञा है। ये तिथियाँ क्रम से शुक्लपक्ष में अच्छे
कार्य के लिए अधम, मध्यम, उत्तम और कृष्णपक्ष में उत्तम, मध्यम, अधम
हैं, अर्थात् शुक्लपक्ष की प्रतिपदा अधम, षष्ठी मध्यम, एकादशी उत्तम और
कृष्णपक्ष में प्रतिपदा उत्तम, षष्ठी मध्यम, एकादशी अधम है। ऐसे ही भद्रा
आदि तिथियों में भी जानना चाहिए और यही तिथियाँ क्रम से शुक्र, बुध,
मंगल, शनैश्चर, बृहस्पति इनके दिनों में हों, अर्थात् शुक्र के दिन नन्दा, बुध
के दिन भद्रा, मङ्गल के दिन जया, शनैश्चर के दिन रिक्ता और बृहस्पति के
दिन पूर्णा हो तो किये हुए कार्य की सिद्धि करनेवाली होती हैं। इस कारण
सिद्धा भी नाम है ॥ ४ ॥
नन्दादितिथिसंज्ञाचक्रम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ |
|---|---|---|---|---|
| ६ | ७ | ८ | ९ | १० |
| ११ | १२ | १३ | १४ | १५<br>३० |
| नन्दा | भद्रा | जया | रक्ता | पूर्णा |
| शु० | बु० | मं० | श० | बृ० |
| सिद्धा | मिद्धा | सिद्धा | सिद्धा | सिद्धा |
सूर्यादि वारों में निषिद्ध तिथि और निषिद्ध नक्षत्र
नन्दा भद्रा नन्दिकाख्या जया च रिक्ताभद्रापूर्णसंज्ञाऽधमार्कात् ।
याम्यं त्वाष्ट्रं वैश्वदेवं धनिष्ठाऽर्यम्णं ज्येष्ठान्त्यं रखेर्दग्धभं स्यात् ॥ ५ ॥
**अन्वयः—**अर्कात् (क्रमेण) नन्दा, भद्रा, नन्दिकाख्या, जया, रिक्ता, भद्रा, पूर्णसंज्ञा
अधमा स्यात् । च (पुनः) रवेः याम्यं, त्वाष्ट्रं, वैश्वदेवं, धनिष्ठा, अर्यम्णं, ज्येष्ठा,
अन्त्यं (क्रमेण) दग्धभं स्यात् ॥ ५ ॥
सूर्यादि वारों में नन्दा, भद्रा, नन्दा, जया, रिक्ता, भद्रा, पूर्णा ये
तिथियाँ क्रम से मृतसंज्ञक हैं, अर्थात् रविवार को नन्दा, सोमवार को भद्रा,
४ मुहूर्त्तचिन्तामणि
मंगल को नन्दा, बुध को जया, बृहस्पति को रिक्ता, शुक्र को भद्रा और
शनैश्चर को पूर्णा मृतसंज्ञक होती है। इनमें कोई शुभ कार्य न करना चाहिए।
'पूर्णामृतार्कात्' इसमें अकार का प्रश्लेष मानने से अमृत संज्ञा होती है अर्थात्
शुभप्रद है। कुछ प्राचीन आचार्यों ने ऐसा ही कहा है। जैसे-आदित्यभौमयो-
र्नन्दा भद्रा शुक्रशशांकयोः । जया सौम्ये गुरौ रिक्ता पूर्णाऽऽर्कावमृता शुभाः ।
आर्का = शनौ ।
तिथिवारमृत्युयोगचक्र
| रवि | सोम | मंगल | बुध | बृहस्पति | शुक्र | शनैश्चर |
|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | २ | १ | ३ | ४ | २ | ५ |
| ६ | ७ | ६ | ८ | ९ | ७ | १० |
| ११ | १२ | ११ | १३ | १४ | १२ | १५ |
| सूर्यादि वारों में क्रम से भरणी, चित्रा, उत्तराषाढ़, धनिष्ठा, उत्तरा- | ||||||
| फाल्गुनी, ज्येष्ठा और रेवती ये नक्षत्र दग्धसंज्ञक हैं, अर्थात् रविवार को | ||||||
| भरणी, सोमवार को चित्रा, मंगल को उत्तराषाढ़, बुधवार को धनिष्ठा, | ||||||
| बृहस्पति को उत्तराफाल्गुनी, शुक्र को ज्येष्ठा और शनैश्चर को रेवती दग्ध- | ||||||
| संज्ञक हैं। इनमें कोई शुभ कार्य न करना चाहिए ॥ ५ ॥ | ||||||
| नक्षत्रवारदग्धयोगचक्र | ||||||
| रवि | सोम | मंगल | बुध | बृहस्पति | शुक्र | शनैश्चर |
| :-: | :-: | :-: | :-: | :-: | :-: | :-: |
| भरणी | चित्रा | उत्तराषाढ़ | धनिष्ठा | उत्तराफाल्गुनी | ज्येष्ठा | रेवती |
| अधम तिथियाँ और दँतून करने का निषेध | ||||||
| षष्ठ्यादितिथयो मन्दाद्विलोमं प्रतिपद्बुधे । | ||||||
| सप्तम्यर्केऽधमाः षष्ठ्याद्यामाश्च रदधावने ॥ ६ ॥ | ||||||
| अन्वयः—मन्दात् विलोमं षष्ठ्यादितिथयः, बुधे प्रतिपत्, अर्के सप्तमी, (अधमाः) | ||||||
| च (पुनः) रदधावने षष्ठ्याद्यामाः अधमाः ॥ ६ ॥ | ||||||
| शनैश्चर से लेकर उलटे क्रम से रविवार तक षष्ठी सप्तमी आदि सीधे क्रम | ||||||
| से अधम संज्ञक होती हैं, अर्थात् शनैश्चर को षष्ठी, शुक्रवार को सप्तमी, | ||||||
| बृहस्पति को अष्टमी, बुधवार को नवमी, मंगल को दशमी, सोमवार को एका- |
शुभाशुभप्रकरण ५
दशी, रविवार को द्वादशी ये अधम संज्ञक हैं। इसे क्रकच योग कहते हैं।
और बुधवार को प्रतिपदा तथा रविवार को सप्तमी भी अधम हैं। इसे संवर्तक
योग कहते हैं। इनमें कोई शुभ कार्य नहीं करना चाहिए।
अधम तिथियों का चक्र
| शनैश्चर | शुक्र | बृहस्पति | बुधवार | मंगल | सोमवार | रविवार | दिन |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ६ | १२ | ||||||
| ६ | ७ | ८ | १ | १० | ११ | ७ | तिथि |
| षष्ठी, प्रतिपदा और अमावस ये तिथियाँ दँतून करने में निषिद्ध हैं | |||||||
| अर्थात् इनमें दँतून न करना चाहिए ॥ ६ ॥ | |||||||
| तैल आदि का निषेध | |||||||
| षष्ठ्यष्टमीभूतविधुक्षयेषु नो सेवेत ना तैलपले क्षुरं रतम् । | |||||||
| नाभ्यञ्जनं विश्वदशाद्विके तिथौ धात्रीफलैः स्नानममाद्रिगोष्वसत् ॥ ७ ॥ | |||||||
| अन्वयः—षष्ठ्यष्टमीभूतविधुक्षयेषु (क्रमेण) ना (पुरुषः) तैलपले, क्षुरं, रत नो | |||||||
| सेवेत । विश्वदशाद्विके तिथौ अभ्यञ्जनं (तथा) अमाद्रिगोषु धात्रीफलैः स्नानं | |||||||
| असत् ॥ ७ ॥ | |||||||
| छठि, अष्टमी, चतुर्दशी, अमावस—इन तिथियों में क्रम से पुरुष तेल, | |||||||
| मांस, क्षौर, रति इन कर्मों को न करे, अर्थात् छठि को तेल न लगावे, | |||||||
| अष्टमी को मांसभक्षण न करे, चतुर्दशी को बाल न बनवावे और अमावस | |||||||
| को मैथुन¹ न करे । त्रयोदशी, दशमी, दुइज—इन तिथियों में उबटन न लगावे । | |||||||
| अमावस, सप्तमी, नवमी—इन तिथियों में आँवला के फलसहित स्नान | |||||||
| न करे ॥ ७ ॥ | |||||||
| दग्ध, विषाख्य, हुताशन और यमघंट योग | |||||||
| सूर्ये शपञ्चाग्निरसाष्टनन्दा वेदाङ्गसप्ताश्विगजाङ्कशैलाः । | |||||||
| सूर्याङ्गसप्तोरगगोदिगीशा दग्धा विषाख्याश्च हुताशनाश्च ॥ ८ ॥ | |||||||
| सूर्यादिवारे तिथयो भवन्ति मघाविशाखाशिवमूलवह्निः । | |||||||
| ब्राह्मं करोर्काद्यमघण्टकाश्च शुभे विवर्ज्यागमने त्ववश्यम् ॥ ९ ॥ | |||||||
| १—अमावास्यां पौर्णमास्यां च दारां न गच्छेद्यदि गच्छेत्तर्हि निरिन्द्रियो भवेत् । |
६ मुहूर्तचिन्तामणि
अन्वयः—सूर्यादिवारे (क्रमेण) सूर्येशपञ्चाग्निरसाष्टनन्दाः, वेदाङ्गसप्ताश्वि-
गजाङ्कशैलाः, सूर्याङ्गसप्तोरगगोदिगीशाः तिथयः (क्रमात्) दग्धाः, विषाख्याः, हुताशनाः
भवन्ति च (तथा) अर्कात् (क्रमेण) मघाविशाखाशिवमूलवह्निः ब्राह्मांकरः यमघण्टकाः
भवन्ति । (इमे) शुभे विवर्ज्याः गमने तु अवश्यं (विवर्ज्याः) ।। ८-६ ।।
रविवार को द्वादशी, सोमवार को एकादशी, मंगल को पञ्चमी, बुधवार
को तीज, बृहस्पति को छठि, शुक्रवार को अष्टमी, शनैश्चर को नवमी
हो तो दग्धयोग होता है तथा रविवार को चौथि, सोमवार को छठि,
मंगल को सप्तमी, 'बुधवार को दुइज, बृहस्पति को अष्टमी, शुक्रवार को
नवमी, शनैश्चर को सप्तमी हो तो विषाख्ययोग होता है और रविवार को
द्वादशी, सोमवार को छठि, मंगल को सप्तमी, बुधवार को अष्टमी, बृहस्पति
को नवमी, शुक्रवार को दशमी और शनैश्चर को एकादशी हो तो हुताशन-
योग होता है ।। ८ ।।
सूर्यादि वारों में मघा, विशाखा, आर्द्रा, मूल, कृत्तिका, रोहिणी और
हस्त ये नक्षत्र हों, अर्थात् रविवार को मघा, सोमवार को विशाखा, मंगल
को आर्द्रा, बुधवार को मूल, बृहस्पति को कृत्तिका, शुक्रवार को रोहिणी
और शनैश्चर को हस्त हो तो यमघण्टयोग होता है । यह योग शुभ कार्यों
में वर्जनीय है । परन्तु यात्रा में तो अवश्य ही वर्जित है ।। ९ ।।
दग्ध, विषाख्य हुताशन चक्र
| रवि | सोम | मंगल | बुध | बृहस्पति | शुक्र | शनैश्चर | वार |
| १२ | ११ | ५ | ३ | ६ | ८ | ९ | दग्ध |
| ४ | ६ | ७ | २ | ८ | ९ | ७ | विषाख्य |
| १२ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | हुताशन |
यमघण्टचक्र
| रवि | सोम | मंगल | बुध | बृहस्पति | शुक्र | शनैश्चर |
| मघा | विशाखा | आर्द्रा | मूल | कृत्तिका | रोहिणी | हस्त |
शून्य तिथियाँ
भाद्रे चन्द्रदृशौ नभस्यनलनेत्रे माधवे द्वादशी
पौषे वेदशरा इषे दशशिवा मार्गेऽद्रिनागा मधौ ।