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मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

by दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी)

DevanagariHindipublished207 pages

प्रारंभिक पृष्ठ एवं मुहूर्त-शास्त्र मंगलाचरण

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दैवज्ञ राम-विरचित
मुहूर्त्तचिन्तामणि
सान्वय
(भाषा-टीका-सहित)
टीकाकार
पंडित रामरत्न अवस्थी
संपादक
चण्डिका प्रसाद अवस्थी
प्रकाशक
तेजकुमार बुक डिपो (प्रा०) लिमिटेड
उत्तराधिकारी - नवल किशोर प्रेस, लखनऊ
दसवाँ संस्करण ] सन् २००४ ई० [ मूल्य ६० रुपये

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ॐ नमः शिवाय
विषय-सूची
विषय पृष्ठ
शुभाशुभप्रकरण
मङ्गलाचरण ... १
तिथीशचक्र ... २
नन्दातिथिसंज्ञाचक्र ... ३
तिथिवारमृत्युयोगचक्र ... ४
नक्षत्रवारदग्धयोगचक्र ... ४
अधम तिथियों का चक्र ... ५
दग्धविषाख्यहुताशनचक्र ... ६
यमघंटचक्र ... ६
शून्यतिथिचक्र ... ७
निन्द्य तिथि और निन्द्य नक्षत्र ... ७
चैत्रादि मासों में शून्य नक्षत्र ... ८
चैत्रादि मासों में शून्य राशियां ... ८
प्रतिपदादि विषम तिथियों में
दग्ध लग्नें ... ६
पूर्वोक्त दुष्ट योगों का परिहार ... ६
शुभ कर्मों में निषिद्ध योग ... ६
गृहप्रवेश, यात्रा तथा विवाह में
त्याज्य वार, नक्षत्र ... १०
आनन्दादि अट्ठाइस योग ... १०
योगों के जानने का उपाय ... ११
आनन्दादि चक्र ... १२
दुष्टयोगों का परिहार ... १३
संपूर्ण दोषों का नाशक रवियोग ... १३
सर्वार्थसिद्धियोग ... १३
सर्वार्थसिद्धियोगचक्र ... १४
उत्पातादियोगचतुष्टय चक्र ... १४
निन्दितयोगों का परिहार ... १५
संपूर्ण कृत्यों में वर्जनीय वस्तुएँ ... १५
सूर्य और चन्द्रग्रहण के त्याज्य नक्षत्र
और दिन ... १६
विषय पृष्ठ
त्याज्य नक्षत्र और योग आदि ... १६
पक्षरन्ध्र तिथि और उनका परिहार ... १७
कुलिक आदि दुष्ट मुहूर्त ... १७
प्रकारान्तर से वर्जित मुहूर्त ... १८
देशभेद से होलाष्टक का निषेध ... १९
चन्द्रमा अनुकूल होने से दुष्ट योग भी
शुभ होते हैं ... १८
अन्य परिहार ... २०
भद्रा आदि का परिहार ... २०
भद्राकाल ... २०
भद्रा के मुख और पुच्छ का विचार ... २०
भद्रा का निवास और फल ... २१
शुक्रास्त आदि में वर्जनीय क्रिया ... २१
सिंह और मकरराशि में स्थित बृहस्पति
का दोष ... २२
सिंहस्थ बृहस्पति-दोष का परिहार ... २२
लुप्त संवत्सर-दोष और उसका
परिहार ... २४
होरासिद्धि के लिए वारप्रवृत्ति ... २४
कालहोरा ... २५
कलहोरा का प्रयोजन ... २५
संपूर्ण कार्यों में निषिद्ध मन्वादि और
युगादि तिथियाँ ... २६
--नक्षत्रप्रकरण
नक्षत्रों के स्वामी ... २६
नक्षत्र-स्वामियों का चक्र ... २७
नक्षत्रों की संज्ञा ... २७
नक्षत्रों की अधोमुखादि संज्ञा ... २९
मूंगा और दाँत आदि धारण करने
का मुहूर्त ... ३०
नवीन वस्त्र के जलने आदि का
शुभाशुभ फल ... ३०

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( २ )
विषय पृष्ठ | विषय पृष्ठ
वस्त्रनवधाचक्र ... ३१ | वीरसाधन व अभिचार का मुहूर्त ४४
निन्द्यकाल में भी वस्त्रधारण ... ३१ | रोग शान्त होने पर स्नान का मुहूर्त ४४
राजदर्शन, मद्यारम्भ और गो-क्रय- | शिल्पविद्या के आरम्भ का मुहूर्त ... ४५
विक्रय का मुहूर्त ... ३१ | सन्धि करने का मुहूर्त ... ४५
पशुओं के पालने का मुहूर्त ... ३२ | परीक्षा का मुहूर्त ... ४५
औषध और सूचीकर्म का मुहूर्त ... ३२ | सब शुभ कार्यों में लग्नशुद्धि ... ४६
क्रय-विक्रय मुहूर्तों का परस्पर निषेध | जिन नक्षत्रों में ज्वर आने से मृत्यु हो
तथा क्रयमुहूर्त ... ३३ | जाती है अथवा जितने दिनों तक
विक्रय और विपणि का मुहूर्त ... ३३ | ज्वर रहता है उनका वर्णन ... ४६
घोड़ा और हाथी के कृत्य का मुहूर्त ... ३४ | रोगी के शीघ्र ही मरने का योग ४७
भूषाघटनादि का मुहूर्त ... ३४ | प्रेतक्रिया का मुहूर्त ... ४७
मुद्रापातन और वस्त्रक्षालन का | त्रिपुष्करयोग और उसका फल ... ४८
मुहूर्त ... ३

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( ३ )
विषय पृष्ठ | विषय पृष्ठ
उक्त संज्ञाओं का प्रयोजन ... ५८ | निन्दित प्रथम रजोदर्शन ... ७५
कर्क संक्रान्ति के रविवारादि में अब्द- | प्रथम रजस्वला के स्नान का मुहूर्त ... ७५
विशोषक ... ५६ | गर्भादान का मुहूर्त ... ७६
कर्कसंक्रान्ति में अब्दविशोषकचक्र ... ५६ | गर्भाधान में लग्नबल ... ७६
संक्रान्तियों के वाहन, वस्त्र, आयुध, | सीमन्तोन्नयन मुहूर्त ... ७७
भक्ष्य और लेपन आदि का विचार ... ६० | गर्भाधान से लेकर प्रसव पर्यंत
संक्रांतिवश से शुभाशुभ फल ... ६२ | महीनों के स्वामी ... ७७
संक्रान्ति के नक्षत्र से जन्म-नक्षत्रचक्र ... ६२ | पुंसवन का मुहूर्त ... ७८
सूर्यादि के बली रहते कार्य और | जातकर्म और नामकर्म का मुहूर्त ... ७८
संक्रान्ति करते हुए ग्रहों का बल ... ६३ | प्रसूता स्त्री के स्नान करने का
अधिकमास और क्षय मास का निर्णय ६३ | मुहूर्त ... ७६
अथ गोचरप्रकरण | प्रथम आदि महीनों में बालक के दाँत
सूर्यादि ग्रहों का शुभ व विद्ध विचार ... ६४ | निकलने का फल ... ७६
वामवेध और शुक्लपक्ष में चन्द्रमा | दोलारोहण का मुहूर्त ... ७६
का बल ... ६६ | जलपूजा का मुहूर्त ... ८१
क्रमवेध और विपरीतवेध में मतभेद ... ६७ | अन्नप्राशन का मुहूर्त ... ८१
ग्रहणनक्षत्र का फल ... ६८ | अन्नप्राशन के लिए लग्न-शुद्धि ... ८२
चन्द्रमा का विशेष शुभाशुभत्व ... ६८ | अन्नप्राशन मुहूर्त में ग्रहों का फल ... ८२
प्रकारान्तर से चन्द्रमा का शुभाशुभ फल ६६ | बालकों को भूमि में बैठाने का
ग्रहों की शांति के लिए नव-रत्नों का | मुहूर्त ... ८३
धारण ... ६६ | बालक की जीविका-परीक्षा का
प्रत्येक ग्रह की प्रसन्नता के लिए | मुहूर्त ... ८३
माणिक्यादि का धारण ... ७० | ताम्बूलभक्षणमुहूर्त ... ८३
ताराओं के नाम और फल ... ७० | कर्णवेध मुहूर्त ... ८३
दुष्ट तारा का परिहार ... ७१ | कर्णवेध में लग्नशुद्धि ... ८५
चन्द्रमा की अवस्था ... ७१ | मुण्डन आदि में निषिद्ध काल ... ८५
अवस्थाओं के नाम और फल ... ७२ | शुक्र और बृहस्पति की बाल्यावस्था ... ८६
ग्रहदोष की शान्ति के लिए औषध- | मतान्तर से बाल्यवृद्धावस्था ... ८६
युक्त जल से स्नान ... ७२ | चूड़ाकर्म का मुहूर्त ... ८७
ग्रह गन्तव्य राशि का फल कितने | जिसकी माता गर्भवती हो उसके
दिन पहले देने लगते हैं ... ७३ | मुण्डन का मुहूर्त ... ८७
दुष्ट योगादि की शांति के लिए दान ... ७३ | तारा-दोष का अपवाद ... ८८
राश्यन्तर में गये हुए ग्रहों के फल देने | मुण्डन आदि कार्यों में निषिद्ध काल ... ८८
का काल ... ७३ | साधारण क्षौर आदि का मुहूर्त और
संस्कारप्रकरण | निषेध ... ८६
प्रथम रजोदर्शन में उत्तम, मध्यम, | निमित्तवश क्षौरकर्म ... ८६
निकृष्ट नक्षत्र ... ७४ | क्षौरकर्म में राजाओं के लिए विशेष ... ८६

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( ४ )
विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ
अक्षरारम्भ का मुहूर्त | ६० | शान्ति का उपाय | १०२
विद्यारम्भ का मुहूर्त | ६० | प्रश्न के समय प्रथम सन्तान का |
वर्णक्रम से यज्ञोपवीत का समय | ६१ | विचार | १०२
यज्ञोपवीत के नक्षत्रादि | ६१ | प्रश्नकाल में साधारण शुभाशुभ |
यज्ञोपवीत में लग्नदोष | ६२ | फल | १०३
यज्ञोपवीत में लग्न के गुण | ६२ | कन्यावरण मुहूर्त | १०३
वर्णेश और शाखेश | ६३ | वरवरण अर्थात् फलदान का मुहूर्त | १०३
शाखेश और वर्णेश का प्रयोजन | ६३ | विवाहकाल में ग्रहशुद्धि | १०४
जन्म मासादि का यज्ञोपवीत में | | विवाह के महीने | १०४
अपवाद | ६३ | सन्तानभेद से जन्ममासादि अशुभ |
बृहस्पति का बल | ६४ | और शुभ विवाह | १०४
गुरुदोषापवाद | ६४ | ज्येष्ठ मास में विशेष | १०५
यज्ञोपवीत में निषिद्ध समय | ६४ | विवाहादि विशेष का निषेध | १०५
सूर्यादि ग्रहों के नवांश में यज्ञोपवीत | | विपत्ति में विवाहविचार | १०६
होने का फल | ६५ | उक्त विषय पर विशेष | १०६
यज्ञोपवीत में चन्द्रनवांश का फल | ६५ | दुष्ट नक्षत्रों में उत्पन्न वरकन्या का |
केन्द्रस्थित सूर्यादि ग्रहों का फल | ६६ | फल | १०७
यज्ञोपवीतकाल में संयुक्त ग्रहों का | | अष्टकूट | १०७
फल | ६६ | वर्णकूट | १०८
यज्ञोपवीत में चन्द्रवश से शुभाशुभ | | वश्यकूट | १०८
योग | ६६ | ताराकूट | १०६
अनध्यायसंज्ञक तिथियाँ | ६७ | योनिकूट | १०६
प्रदोष-लक्षण | ६७ | ग्रहमैत्रीकूट | ११०
ब्रह्मौदन के पहले उत्पात होने पर | | गणकूट | १११
शान्ति का विधान | ६७ | गणों का फल | ११२
वेदों के भेद से यज्ञोपवीत के नक्षत्र | ६८ | भकूट | ११२
यज्ञोपवीतादि में धर्मशास्त्र का | | दुष्ट भकूट का उद्धार | ११३
विचार | ६८ | दुष्ट गणकूट, भकूट और ग्रहकूटों |
छुरिकाबन्धन का मुहूर्त | ६६ | का परिहार | ११४
केशान्तकर्म का मुहूर्त | ६६ | नाड़ीविचार | ११४
विवाहप्रकरण | | अन्य प्रकार का वर्गकूट | ११५
विवाहप्रश्नविधि | १०० | अवर्गादि चक्र | ११५
विवाहकारक अन्य योग | १०० | नक्षत्र और राशि के एक और भिन्न |
वैधव्य योग | १०१ | होने का विचार | ११६
कुलटा और मृतवत्सायोंग | १०१ | राशियों के स्वामी | ११६
विवाहभंगयोग | १०१ | राशीशचक्र | ११६
जन्मकालिक बालविधवायोग की | | नवांशचक्र | ११७

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( ५ )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
होरा११७उपग्रहदोष१३३
त्रिंशांश११८पातादि दोषों पर विशेष१३३
त्रिंशांशचक्र११८अशुभ अर्द्धयामचक्र१३४
द्रेष्काण११८कुलिकदोष१३४
द्रेष्काणचक्र११८कुलिकमुहूर्तचक्र१३५
द्वादशांशविधि११८दग्धातिथि१३५
द्वादशांशचक्र१२०दग्धातिथिचक्र१३५
षड्वर्ग१२०जामित्रदोष१३५
नक्षत्रों की पूर्वार्धयोगि आदि संज्ञा और उनका फल१२०एकार्गल आदि दोषों का परिहार१३६
स्वामी और सेवक के जन्मनक्षत्र का विचार१२१देशभेद से उक्त दोषों का परिहार१३६
गण्डान्त का दोष१२१दश दोष१३६
कर्तरीदोष१२२उक्त दश दोषों का फल१३७
संग्रहदोष१२३दक्षिण देशों में प्रसिद्ध बाणदोष१३८
अष्टम स्थान का दोष और उसका परिहार१२३अन्य बाणदोष१३८
अन्य परिहार१२३बाणदोष का परिहार१४०
आठवीं राशि के नवांशादि और बारहवीं राशि का दोष१२४ग्रहों की दृष्टि१४०
विषघटी दोष१२४लग्नस्थान की शुद्धि१४१
दिन के पन्द्रह मुहूर्त१२६लग्न से सातवें भाव की शुद्धि१४२
रात्रि के पन्द्रह मुहूर्त१२६अन्य प्रकार से लग्न और सातवें भाव की शुद्धि१४२
आदित्यादि वारों में निषिद्ध मुहूर्त१२७सूर्यसंक्रान्ति का दोष१४३
विवाह के नक्षत्र और अभिजित् नक्षत्र का मान१२७सूर्यादि ग्रहों की संक्रान्तियों में निषिद्ध काल१४३
ग्रहों द्वारा नक्षत्रों का वेध१२८पंगु और आन्धादि लग्नदोष१४३
सप्तशलाकाचक्र में ग्रहों द्वारा नक्षत्रों का वेध१२६मतान्तर से पंगु आदि दोष१४४
सप्तशलाकाचक्र१३०पंग्वादि लग्नों का फल१४४
क्रूरग्रहों से बिद्ध नक्षत्रों का दोष और उसका परिहार१३०शुभनवांश१४५
लत्तादोष१३१विहित नवांशों में भी किसी का निषेध१४५
पातयोग१३१सर्वथा लग्नभङ्ग योग१४५
क्रान्तिसाम्ययोग१३२विवाहकालिक शुभग्रह१४६
एकार्गलदोष१३२कर्तरी आदि महादोषों का परिहार१४६
वर्षा आदि अनेक दोषों का परिहार१४७
अन्य दोषों का परिहार१४७
सामान्य दोषों का परिहार१४७
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( ६ )
विषय पृष्ठ | विषय पृष्ठ
लग्न का विंशोपक बल ... १४८ अग्न्याधानप्रकरण
श्वश्रूवादि के सुख-दुःख जानने का लग्नशुद्धि ... १६२
उपाय ... १४८ अग्न्याधानकालिक लग्नवश से यज्ञ-
संकरवर्णों के विवाह का मुहूर्त ... १४६ कारक योग ... १६२
गान्धर्वादि विवाह में और त्रिपदी- राजाभिषेकप्रकरण
चक्र में नक्षत्रशुद्धि ... १४६ नक्षत्र तथा लग्नशुद्धि ... १६३
सूर्य के नक्षत्र से अशुभ और शुभ राजाभिषेक काल में ग्रहस्थिति फल ... १६३
नक्षत्र ... १५० सम्पत्ति तथा पृथ्वीस्थिति ये दो
विवाह से पूर्व होनेवाले कार्यों का योग ... १६४
मुहूर्त ... १५० यात्राप्रकरण
वेदी के लक्षण तथा मंडप का प्रश्नकालिक शुभयात्रा योग ... १६५
उद्वासन ... १५० प्रश्नकालिक अशुभयात्रा योग ... १६६
मंडप के खम्भ गाड़ने का मुहूर्त ... १५१ प्रश्नद्वारा यात्रा की दिशा का
स्तम्भचक्र ... १५१ निर्णय ... १६६
गोधूलिप्रशंसा ... १५१ मासभेद से यात्रा के शुभाशुभ भेद
समय-भेद से गोधूलिकाल ... १५२ और तारा ... १६७
गोधूलि-समय में त्याज्य दोष ... १५२ यात्रा में निषिद्ध तिथि और विहित
सूर्य की स्पष्टगति ... १५३ तिथि ... १६७
सूर्य स्पष्ट करने की रीति ... १५३ वांरशूल और नक्षत्रशूल ... १६८
लग्नघटिका साधनार्थ लग्नभुक्तांश- कालविशेष में विशेष नक्षत्रों का
साधन ... १५४ निषेध ... १६८
लग्न और सूर्य से इष्टकालसाधन ... १५४ यात्रा में मध्यम नक्षत्र तथा कई
लखनऊ का लग्नमान ... १५५ निषिद्ध नक्षत्रों की त्याज्य घटी ... १६६
इष्टकाल बनाने की विशेष रीति ... १५५ अन्य मत से त्याज्य घटी ... १६६
शुभ कार्यों में अवश्य त्यागने योग्य •नक्षत्रों की जीवपक्षादि संज्ञा ... १६६
दोष ... १५६ जीवपक्षादि संज्ञा चक्र ... १७०
कन्या आदि के तेल आदि लगाने जीवपक्षादि का विशेष फल ... १७०
की संख्या ... १५८ युद्धयात्रा के उपयोगी कुलाकुल
वधूप्रवेश प्रकरण संज्ञक तिथि, वार और नक्षत्र ... १७१
वधूप्रवेश का मुहूर्त ... १५६ पन्थाराहु का विचार ... १७२
विवाह के बाद प्रथम वर्ष के महीनों पन्थाराहुचक्र ... १७३
में स्वामी के घर में स्त्री के रहने पन्थाराहुचक्रफल ... १७३
का फल ... १५६ पौषादि मासों की परिवादि तिथियों
द्विरागमन प्रकरण में पूर्वादि दिशाओं की यात्रा का
सम्मुख और दक्षिण शुक्र का दोष ... १६० शुभाशुभ फल ... १७३
शुक्रदोष का परिहार ... १६१ तिथिचक्र ... १७५

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( ७ )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
सर्वांक योग१७६शुभलग्न१८६
महाडल और भ्रमण योग१७६दिशाओं के स्वामी१८७
हिम्बराख्य योग१७७दिक्स्वामिचक्र१८७
घातचन्द्र योग१७७दिग्गीश कहने का प्रयोजन१८७
घातचन्द्रचक्र१७७लालाटिक योग१८८
घातक नक्षत्रपाद१७७प्रास्थानिक यात्रायोग१८८
घातक नक्षत्रपादचक्र१७८समयबल१८६
घातक तिथियाँ१७८लग्नादि बारह भावों के नाम१८६
व्राततिथिचक्र१७६यात्रा में ग्रहों का शुभाशुभ फल१६०
घातक वार१७६यात्रा के अधिकारी१६०
घात वारचक्र१७६योगयात्रा१६०
घातक नक्षत्र१७६यात्राकालिक योगादि१६५
घातनक्षत्रचक्र१८०विजयादशमी की प्रशंसा१६६
तिथियोगिनी१८०यात्रा में चित्तशुद्धि की प्रधानता१६६
योगिनीचक्र१८०यात्राप्रतिबन्धक कार्य१६६
घातक लग्न१८०यात्राविशेष का विचार१६७
घातक लग्नचक्र१८१यात्रा में रिक्तनवमी दोष१६७
कालपाशयोग१८१यात्राकाल में कर्तव्य विधि१६८
कालपाशचक्र१८२नक्षत्रदोहद१६८
परिघदण्डदोष१८२दिग्दोहद१६६
परिघदण्डचक्र१८२वारदोहद१६६
आग्नेयादि कोणों की यात्रा तथा परिघदण्ड का अपवाद१८३तिथिदोहद१६६
परिघदण्ड का अन्य अपवाद तथा केन्द्र आदि स्थानों में वक्री ग्रह का निषेध१८३यात्रा का अन्य प्रकार२००
दिशाओं के वाहन२००
यात्रा करने का स्थान२००
प्रस्थानविधि२०१
अयनशुद्धि१८३मतभेद से प्रस्थान कितनी दूर पर करना चाहिए२०१
सम्मुख शुक्रदोष१८४प्रस्थान की स्थिति का प्रमाण तथा यात्रा में त्याज्य वस्तु२०२
वक्रनीचादिस्थित शुक्रदोष१८४यात्रा के अन्य नियम२०३
कालविशेष में शुक्रदोषाभाव तथा अस्तादि विचार१८५आवश्यक यात्रा में अकालवृष्टि की शान्ति२०३
लग्नविशेष का त्याग१८५शुभ शकुन२०४
मीन और मीन के नवांश का फल तथा शुभलग्न१८५अशुभ शकुन२०४
अन्य अनिष्ट लग्न१८६अन्य शकुन२०५
अन्य शुभ लग्न१८६वामभाग में शुभ शकुन२०६
सम्मुख तथा पृष्ठगत लग्न१८६
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( ८ )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
दक्षिणभाग में शुभ शकुन ...२०६अन्य प्रकार से सौर चान्द्रमासों
साधारण शकुन ...२०६की एकता ...२१६
अशुभ शकुन का उद्धार ...२०७तिथियों के क्रम से द्वार का निषेध ...२२०
यात्रा से लौटने पर गृहप्रवेश कागृहारम्भ में पञ्चांगशुद्धि ...२२०
मुहूर्त ...२०७देवालय आदि के स्थानभेद से
पूर्वोक्त दोषों का पुनः परिगणन ...२०८राहु का मुख ...२२१
लग्न के दोषों का पुनः परिगणन ...२०८राहुचक्र ...२२२
घर में कूप बनाने की विधि ...२२२
वास्तुप्रकरणगृह-कूपचक्र ...२२२
मकान के भीतर कहाँ कौन घर
राशिद्वारा निषि
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मुहूर्त्तचिन्तामणि
भाषा-टीका सहित
❖ :०: ❖
शुभाशुभप्रकरण
मंगलाचरण
गौरीश्रवःकेतकपत्रभङ्गमाकृष्य हस्तेन ददन्मुखाग्रे ।
विघ्नं मुहूर्त्तकलितद्वितीयदन्तप्ररोहो हरतु द्विपास्यः ॥ १ ॥
अन्वयः—गौरीश्रवःकेतकपत्रभंगं हस्तेन आकृष्य मुखाग्रे ददत् (अतएव) मुहूर्त्ता
कलितद्वितीयदन्तप्ररोहो द्विपास्यः (अस्माकं) विघ्नं हरतु ॥ १ ॥
श्रीपार्वतीजी के कान में स्थित केतकी के फूल के दल को सूँड़ से लेकर
ओष्ठ पर धरते समय मुहूर्त्तभर दूसरे दाँत के सदृश करने वाले श्रीगणेशजी
हमारे विघ्न को हरें ॥ १ ॥
ग्रन्थ रचने का प्रयोजन
क्रियाकलापप्रतिपत्तिहेतुं संक्षिप्तसारार्थविलासगर्भम् ।
अनन्तदैवज्ञसुतः स रामो मुहूर्त्तचिन्तामणिमातनोति ॥ २ ॥
अन्वयः—अनन्तदैवज्ञसुतः स रामः क्रियाकलापप्रतिपत्तिहेतुं संक्षिप्तसारार्थविलासगर्भ-
मुहूर्त्तचिन्तामणि आतनोति ॥ २ ॥
अनन्त दैवज्ञ के पुत्र राम मुहूर्त्तचिन्तामणि नाम ग्रन्थ की रचना करते हैं ।
यह ग्रन्थ जातकर्म आदि अनेक कर्मों के करने वा न करने योग्य शुभाशुभ
मुहूर्त्त के जानने का कारण है और इसमें थोड़े शब्दों में मुख्य अर्थ प्रकट

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२ मुहूर्त्तचिन्तामणि
किये गये हैं । मुहूर्त्तचिन्तामणि के दो अर्थ हैं । पहिला यह कि दिन और
रात्रि के पन्द्रहवें भाग को और किसी कार्य को करने के लिए विचारे हुए
शुभाशुभ काल को मुहूर्त्त कहते हैं । उसके शुभाशुभत्व के विचारने के लिए
जितने ग्रन्थ हैं उन सबों में श्रेष्ठ । दूसरा अर्थ यह है कि वाञ्छित फल
देनेवाले मणि के सदृश वाञ्छित मुहूर्त्तों का ज्ञांन करानेवाला ग्रन्थ ॥ २ ॥
तिथीशा वह्निकौ गौरी गणेशोऽहिर्गुहो रविः ।
शिवो दुर्गान्तको विश्वे हरिः कामः शिवः शशी ॥ ३ ॥
अन्वयः—वह्निः, कः, गौरी, गणेशः, अहिः, गुहः, रविः, शिवः, दुर्गा, अन्तकः, विश्वे,
हरिः, कामः, शिवः, शशी, (एते) तिथीशाः (ज्ञेयाः) ॥ ३ ॥
अग्नि, ब्रह्मा, पार्वती, गणेश, सर्प, कार्त्तिकेय, सूर्य, शिव, दुर्गा, यम,
विश्वेदेव, हरि, कामदेव, शिव और चन्द्रमा ये देवता क्रम से प्रतिपदादि
पन्द्रह तिथियों के स्वामी हैं, अर्थात् प्रतिपदा के अग्नि, द्वितीया के ब्रह्मा,
तृतीया के पार्वती, चतुर्थी के गणेश, पंचमी के सर्प, षष्ठी के कार्त्तिकेय,
सप्तमी के सूर्य, अष्टमी के शिव, नवमी के दुर्गा, दशमी के यम, एकादशी
के विश्वेदेव, द्वादशी के हरि, त्रयोदशी के कामदेव, चतुर्दशी के शिव,
पूर्णमासी के चन्द्रमा और अमावस के पितर स्वामी हैं । जिन तिथियों के
जो स्वामी हैं, उन देवताओं की पूजा वा प्रतिष्ठा आदि उन्हीं तिथियों में
करने से शुभदायक होते हैं ॥ ३ ॥
तिथीशचक्र

१२३४५६७८९१०१११२१३१४१५३०
अग्निब्रह्मापार्वतीगणेशजीसर्पकार्त्तिकेयसूर्यशिवदुर्गायमविश्वेदेवहरिकामशिवचन्द्रपितर
तिथियों की नन्दादि संज्ञा और उनका शुभाशुभत्व
नन्दा च भद्रा च जया च रिक्ता पूर्णेति तिथ्योऽशुभमध्यशस्ताः ।
सितेऽसिते शस्तसमाधमाः स्युः सितज्ञभौमार्कगुरौ च सिद्धाः ॥ ४ ॥
अन्वयः—सिते (शुक्ले) नन्दा च भद्रा च जया च रिक्ता पूर्णा इति तिथ्यः
अशुभमध्यशस्ताः (ज्ञेयाः) । असिते (कृष्णपक्षे) शस्तसमाधमाः स्युः । च (पुनः)
सितज्ञभौमार्कगुरौ (क्रमेण) सिद्धाः (सिद्धयोगाः स्युः) ॥ ४ ॥
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शुभाशुभप्रकरण ३
नन्दा, भद्रा, जया, रिक्ता, पूर्णा—ये प्रतिपदा से पञ्चमी पर्यन्त, षष्ठी से
दशमी पर्यन्त और एकादशी से पूर्णमासी पर्यन्त तिथियों की संज्ञा हैं,
अर्थात् प्रतिपदा, षष्ठी, एकादशी—इनकी नन्दा संज्ञा; द्वितीया, सप्तमी,
द्वादशी—इनकी भद्रा संज्ञा; तृतीया, अष्टमी, त्रयोदशी—इनकी जया संज्ञा;
चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी—इनकी रिक्ता संज्ञा और पञ्चमी, दशमी, पूर्णमासी
और अमावस—इनकी पूर्णा संज्ञा है। ये तिथियाँ क्रम से शुक्लपक्ष में अच्छे
कार्य के लिए अधम, मध्यम, उत्तम और कृष्णपक्ष में उत्तम, मध्यम, अधम
हैं, अर्थात् शुक्लपक्ष की प्रतिपदा अधम, षष्ठी मध्यम, एकादशी उत्तम और
कृष्णपक्ष में प्रतिपदा उत्तम, षष्ठी मध्यम, एकादशी अधम है। ऐसे ही भद्रा
आदि तिथियों में भी जानना चाहिए और यही तिथियाँ क्रम से शुक्र, बुध,
मंगल, शनैश्चर, बृहस्पति इनके दिनों में हों, अर्थात् शुक्र के दिन नन्दा, बुध
के दिन भद्रा, मङ्गल के दिन जया, शनैश्चर के दिन रिक्ता और बृहस्पति के
दिन पूर्णा हो तो किये हुए कार्य की सिद्धि करनेवाली होती हैं। इस कारण
सिद्धा भी नाम है ॥ ४ ॥
नन्दादितिथिसंज्ञाचक्रम्

१२३४५
६७८९१०
१११२१३१४१५<br>३०
नन्दाभद्राजयारक्तापूर्णा
शु०बु०मं०श०बृ०
सिद्धामिद्धासिद्धासिद्धासिद्धा

सूर्यादि वारों में निषिद्ध तिथि और निषिद्ध नक्षत्र
नन्दा भद्रा नन्दिकाख्या जया च रिक्ताभद्रापूर्णसंज्ञाऽधमार्कात् ।
याम्यं त्वाष्ट्रं वैश्वदेवं धनिष्ठाऽर्यम्णं ज्येष्ठान्त्यं रखेर्दग्धभं स्यात् ॥ ५ ॥
**अन्वयः—**अर्कात् (क्रमेण) नन्दा, भद्रा, नन्दिकाख्या, जया, रिक्ता, भद्रा, पूर्णसंज्ञा
अधमा स्यात् । च (पुनः) रवेः याम्यं, त्वाष्ट्रं, वैश्वदेवं, धनिष्ठा, अर्यम्णं, ज्येष्ठा,
अन्त्यं (क्रमेण) दग्धभं स्यात् ॥ ५ ॥
सूर्यादि वारों में नन्दा, भद्रा, नन्दा, जया, रिक्ता, भद्रा, पूर्णा ये
तिथियाँ क्रम से मृतसंज्ञक हैं, अर्थात् रविवार को नन्दा, सोमवार को भद्रा,

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४ मुहूर्त्तचिन्तामणि
मंगल को नन्दा, बुध को जया, बृहस्पति को रिक्ता, शुक्र को भद्रा और
शनैश्चर को पूर्णा मृतसंज्ञक होती है। इनमें कोई शुभ कार्य न करना चाहिए।
'पूर्णामृतार्कात्' इसमें अकार का प्रश्लेष मानने से अमृत संज्ञा होती है अर्थात्
शुभप्रद है। कुछ प्राचीन आचार्यों ने ऐसा ही कहा है। जैसे-आदित्यभौमयो-
र्नन्दा भद्रा शुक्रशशांकयोः । जया सौम्ये गुरौ रिक्ता पूर्णाऽऽर्कावमृता शुभाः ।
आर्का = शनौ ।
तिथिवारमृत्युयोगचक्र

रविसोममंगलबुधबृहस्पतिशुक्रशनैश्चर
१२१३४२५
६७६८९७१०
१११२१११३१४१२१५
सूर्यादि वारों में क्रम से भरणी, चित्रा, उत्तराषाढ़, धनिष्ठा, उत्तरा-
फाल्गुनी, ज्येष्ठा और रेवती ये नक्षत्र दग्धसंज्ञक हैं, अर्थात् रविवार को
भरणी, सोमवार को चित्रा, मंगल को उत्तराषाढ़, बुधवार को धनिष्ठा,
बृहस्पति को उत्तराफाल्गुनी, शुक्र को ज्येष्ठा और शनैश्चर को रेवती दग्ध-
संज्ञक हैं। इनमें कोई शुभ कार्य न करना चाहिए ॥ ५ ॥
नक्षत्रवारदग्धयोगचक्र
रविसोममंगलबुधबृहस्पतिशुक्रशनैश्चर
:-::-::-::-::-::-::-:
भरणीचित्राउत्तराषाढ़धनिष्ठाउत्तराफाल्गुनीज्येष्ठारेवती
अधम तिथियाँ और दँतून करने का निषेध
षष्ठ्यादितिथयो मन्दाद्विलोमं प्रतिपद्बुधे ।
सप्तम्यर्केऽधमाः षष्ठ्याद्यामाश्च रदधावने ॥ ६ ॥
अन्वयः—मन्दात् विलोमं षष्ठ्यादितिथयः, बुधे प्रतिपत्, अर्के सप्तमी, (अधमाः)
च (पुनः) रदधावने षष्ठ्याद्यामाः अधमाः ॥ ६ ॥
शनैश्चर से लेकर उलटे क्रम से रविवार तक षष्ठी सप्तमी आदि सीधे क्रम
से अधम संज्ञक होती हैं, अर्थात् शनैश्चर को षष्ठी, शुक्रवार को सप्तमी,
बृहस्पति को अष्टमी, बुधवार को नवमी, मंगल को दशमी, सोमवार को एका-
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शुभाशुभप्रकरण ५
दशी, रविवार को द्वादशी ये अधम संज्ञक हैं। इसे क्रकच योग कहते हैं।
और बुधवार को प्रतिपदा तथा रविवार को सप्तमी भी अधम हैं। इसे संवर्तक
योग कहते हैं। इनमें कोई शुभ कार्य नहीं करना चाहिए।
अधम तिथियों का चक्र

शनैश्चरशुक्रबृहस्पतिबुधवारमंगलसोमवाररविवारदिन
६१२
६७८११०११७तिथि
षष्ठी, प्रतिपदा और अमावस ये तिथियाँ दँतून करने में निषिद्ध हैं
अर्थात् इनमें दँतून न करना चाहिए ॥ ६ ॥
तैल आदि का निषेध
षष्ठ्यष्टमीभूतविधुक्षयेषु नो सेवेत ना तैलपले क्षुरं रतम् ।
नाभ्यञ्जनं विश्वदशाद्विके तिथौ धात्रीफलैः स्नानममाद्रिगोष्वसत् ॥ ७ ॥
अन्वयः—षष्ठ्यष्टमीभूतविधुक्षयेषु (क्रमेण) ना (पुरुषः) तैलपले, क्षुरं, रत नो
सेवेत । विश्वदशाद्विके तिथौ अभ्यञ्जनं (तथा) अमाद्रिगोषु धात्रीफलैः स्नानं
असत् ॥ ७ ॥
छठि, अष्टमी, चतुर्दशी, अमावस—इन तिथियों में क्रम से पुरुष तेल,
मांस, क्षौर, रति इन कर्मों को न करे, अर्थात् छठि को तेल न लगावे,
अष्टमी को मांसभक्षण न करे, चतुर्दशी को बाल न बनवावे और अमावस
को मैथुन¹ न करे । त्रयोदशी, दशमी, दुइज—इन तिथियों में उबटन न लगावे ।
अमावस, सप्तमी, नवमी—इन तिथियों में आँवला के फलसहित स्नान
न करे ॥ ७ ॥
दग्ध, विषाख्य, हुताशन और यमघंट योग
सूर्ये शपञ्चाग्निरसाष्टनन्दा वेदाङ्गसप्ताश्विगजाङ्कशैलाः ।
सूर्याङ्गसप्तोरगगोदिगीशा दग्धा विषाख्याश्च हुताशनाश्च ॥ ८ ॥
सूर्यादिवारे तिथयो भवन्ति मघाविशाखाशिवमूलवह्निः ।
ब्राह्मं करोर्काद्यमघण्टकाश्च शुभे विवर्ज्यागमने त्ववश्यम् ॥ ९ ॥
१—अमावास्यां पौर्णमास्यां च दारां न गच्छेद्यदि गच्छेत्तर्हि निरिन्द्रियो भवेत् ।
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६ मुहूर्तचिन्तामणि
अन्वयः—सूर्यादिवारे (क्रमेण) सूर्येशपञ्चाग्निरसाष्टनन्दाः, वेदाङ्गसप्ताश्वि-
गजाङ्कशैलाः, सूर्याङ्गसप्तोरगगोदिगीशाः तिथयः (क्रमात्) दग्धाः, विषाख्याः, हुताशनाः
भवन्ति च (तथा) अर्कात् (क्रमेण) मघाविशाखाशिवमूलवह्निः ब्राह्मांकरः यमघण्टकाः
भवन्ति । (इमे) शुभे विवर्ज्याः गमने तु अवश्यं (विवर्ज्याः) ।। ८-६ ।।
रविवार को द्वादशी, सोमवार को एकादशी, मंगल को पञ्चमी, बुधवार
को तीज, बृहस्पति को छठि, शुक्रवार को अष्टमी, शनैश्चर को नवमी
हो तो दग्धयोग होता है तथा रविवार को चौथि, सोमवार को छठि,
मंगल को सप्तमी, 'बुधवार को दुइज, बृहस्पति को अष्टमी, शुक्रवार को
नवमी, शनैश्चर को सप्तमी हो तो विषाख्ययोग होता है और रविवार को
द्वादशी, सोमवार को छठि, मंगल को सप्तमी, बुधवार को अष्टमी, बृहस्पति
को नवमी, शुक्रवार को दशमी और शनैश्चर को एकादशी हो तो हुताशन-
योग होता है ।। ८ ।।
सूर्यादि वारों में मघा, विशाखा, आर्द्रा, मूल, कृत्तिका, रोहिणी और
हस्त ये नक्षत्र हों, अर्थात् रविवार को मघा, सोमवार को विशाखा, मंगल
को आर्द्रा, बुधवार को मूल, बृहस्पति को कृत्तिका, शुक्रवार को रोहिणी
और शनैश्चर को हस्त हो तो यमघण्टयोग होता है । यह योग शुभ कार्यों
में वर्जनीय है । परन्तु यात्रा में तो अवश्य ही वर्जित है ।। ९ ।।
दग्ध, विषाख्य हुताशन चक्र
| रवि | सोम | मंगल | बुध | बृहस्पति | शुक्र | शनैश्चर | वार |
| १२ | ११ | ५ | ३ | ६ | ८ | ९ | दग्ध |
| ४ | ६ | ७ | २ | ८ | ९ | ७ | विषाख्य |
| १२ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | हुताशन |
यमघण्टचक्र
| रवि | सोम | मंगल | बुध | बृहस्पति | शुक्र | शनैश्चर |
| मघा | विशाखा | आर्द्रा | मूल | कृत्तिका | रोहिणी | हस्त |
शून्य तिथियाँ
भाद्रे चन्द्रदृशौ नभस्यनलनेत्रे माधवे द्वादशी
पौषे वेदशरा इषे दशशिवा मार्गेऽद्रिनागा मधौ ।

१. शुभाशुभ प्रकरण, तिथि, वार, नक्षत्र, योग एवं करण विचार

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शुभाशुभप्रकरण ७
गोऽष्टौ चोभयपक्षगाश्च तिथयः शून्या बुधैः कीर्तिता
ऊर्जाषाढतपस्यशुक्रतपसां कृष्णे शराङ्गाब्धयः ॥ १०॥
शक्राः पञ्च सिते शक्राद्र्यग्निविश्वरसाः क्रमात् ॥
अन्वयः—भाद्रे चन्द्रदृशौ, नभसि अनलनेत्रे, माधवे द्वादशी, पौषे वेदशराः, इषे
दशशिवाः, मार्गे अद्रिनागाः, मधौ गोऽष्टौ, उभयपक्षगाः तिथयः बुधैः शून्याः कीर्तिताः ।
(तथा) ऊर्जाषाढतपस्यशुक्रतपसां कृष्णे क्रमात् शराङ्गाब्धयः शक्राः, पञ्च तथा सिते
(शुक्ले) शक्राद्र्यग्निविश्वरसाः (तिथयः) शून्याः कीर्तिताः ॥१०॥
भादों महीने में प्रतिपदा और दुइज, श्रावण में दुइज और तीज, वैशाख
में द्वादशी, पौष में चौथि और पञ्चमी, कुआर में दशमी और एकादशी,
अगहन में सप्तमी और अष्टमी, चैत्र में अष्टमी और नवमी ये शुक्ल-कृष्ण
दोनों पक्षों की तिथियाँ पण्डितों ने शून्य कही हैं। कार्त्तिक, आषाढ़,
फाल्गुन, ज्येष्ठ, माघ, इन महीनों में कृष्णपक्ष की पञ्चमी, छठि, चौथि,
चतुर्दशी, पञ्चमी अर्थात् कात्तिककृष्ण पञ्चमी, आषाढ़कृष्ण छठि, फाल्गुन-
कृष्ण चौथि, ज्येष्ठकृष्ण चतुर्दशी, माघकृष्ण पञ्चमी भी शून्य हैं और
इन्हीं महीनों के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी, सप्तमी, तीज, त्रयोदशी और छठि
ये तिथियाँ क्रम से शून्य हैं ॥ १० ॥
शून्यतिथिचक्र

भादोंश्रावणवैशाखपौषकुआरअगहनचैतकार्त्तिकआषाढ़फाल्गुनज्येष्ठमाघमास
१२४१०७८
१२५६४१४५कृष्ण
२३५११८९तिथि
१२४१०७८
१२१४७३१३६शुक्ल
२३५११८९तिथि

निन्द्य तिथि और निन्द्य नक्षत्र
तथा निन्द्यं शुभे सार्पं द्वादश्यां वैश्वमादिमे ॥ ११॥
अनुराधा द्वितीयायां पञ्चम्यां पितृभं तथा ।
त्र्युत्तराश्च तृतीयायामेकादश्यां च रोहिणी ॥ १२॥
स्वातीचित्रे त्रयोदश्यां सप्तम्यां हस्तराक्षसे ।
नवम्यां कृत्तिकाऽष्टम्यां पूभा षष्ठ्यां च रोहिणी ॥ १३ ॥

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अन्वयः —तथा शुभे (शुभकार्ये) द्वादश्यां सार्पं निन्द्यं, आदिमे वैश्वम् निन्द्यम्,
द्वितीयायां अनुराधा (निन्द्या), पञ्चम्यां पित्र्यभम् निन्द्यम् तथा तृतीयायां व्युत्तराः
(निन्द्याः), एकादश्यां रोहिणी (निन्द्या), त्रयोदश्यां स्वातीचित्रे (निन्द्ये), सप्तम्यां हस्त-
राक्षसे (निन्द्ये), नवम्यां कृत्तिका (निन्द्या), अष्टम्यां पूभा (निन्द्या), षष्ठयां रोहिणी
(निन्द्या) ॥ ११-१३ ॥
द्वादशी तिथि में आश्लेषा, प्रतिपदा में उत्तराषाढ़, द्वितीया में अनुराधा,
पञ्चमी में मघा, तृतीया में तीनों उत्तरा अर्थात् उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़,
उत्तराभाद्रपद, एकादशी में रोहिणी, त्रयोदशी में स्वाती और चित्रा, सप्तमी
में हस्त और मूल, नवमी में कृत्तिका, अष्टमी में पूर्वभाद्रपद और षष्ठि
में रोहिणी निंद्य हैं। इन तिथियों में ये नक्षत्र हों तो शुभ कार्य न
करे ॥ ११-१३ ॥
चैत्रादि मासों में शून्य नक्षत्र
कदास्त्रभे त्वाष्ट्रवायू विश्वेज्यौ भगवासवौ ।
वैश्वश्रुती पाशिपौष्णे अजपादग्निपितृभे ॥ १४ ॥
चित्राद्रीशौ शिवाश्व्यर्काः श्रुतिमूले यमेन्द्रभे ।
चैत्रादिमासे शून्याख्यास्तारा वित्तविनाशकाः ॥ १५ ॥
अन्वयः—चैत्रादिमासे (क्रमेण) कदास्रभे, त्वाष्ट्रवायू, विश्वेज्यौ, भगवासवौ,
वैश्वश्रुती, पाशिपौष्णे, अजपात्, अग्निपितृभे, चित्राद्रीशौ, शिवाश्व्यर्काः, श्रुतिमूले,
यमेन्द्रभे (एताः) वित्तविनाशकाः शून्याख्याः ताराः (ज्ञेयाः) ॥ १४-१५ ॥
चैत्र में रोहिणी और अश्विनी, वैशाख में चित्रा और स्वाती, ज्येष्ठ में
उत्तराषाढ़ और पुष्य, आषाढ़ में पूर्वाफाल्गुनी और धनिष्ठा, श्रावण में
उत्तराषाढ़ और श्रवण, भादौं में शतभिष और रेवती, कुआर में पूर्वभाद्रपद,
कार्त्तिक में कृत्तिका और मघा, अगहन में चित्रा और विशाखा, पौष में आर्द्रा,
अश्विनी और हस्त, माघ में श्रवण और मूल, फाल्गुन में भरणी और
ज्येष्ठा नक्षत्र शून्य हैं। इनमें शुभ कार्य करने से धन का नाश होता
है ॥ १४-१५ ॥
चैत्रादि मासों में शून्य राशियाँ
घटो झषो गौर्मिथुनं मेषकन्याऽलितौलिनः ।
धनुः कर्को मृगः सिंहश्चैत्रादौ शून्यराशय ॥ १६ ॥

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शुभाशुभप्रकरण ९
अन्वयः—चैत्रादौ (क्रमेण) घटः, झषः, गौः, मिथुनं, मेषकन्यालितौलिनः, धनुः,
कर्कः, मृगः, सिंहः (एते) शून्यराशयः (ज्ञेयाः) ॥ १६ ॥
चैत्र में कुम्भ, वैशाख में मीन, ज्येष्ठ में वृष, आषाढ़ में मिथुन, श्रावण
में मेष, भादौं में कन्या, कुवार में वृश्चिक, कार्त्तिक में तुला, अगहन में धनु,
पौष में कर्क, माघ में मकर और फाल्गुन में सिंह शून्य है। इन लग्नों में शुभ
कार्य न करना चाहिए ॥ १६ ॥
प्रतिपदादि विषम तिथियों में दग्ध लग्नें
पक्षादितस्त्वोजतिथौ घटैणौ मृगेन्द्रनक्रौ मिथुनाङ्गने च ।
चापेन्दुभे कर्कहरी ह्यान्त्यौ गोन्त्यौ च नेष्ठे तिथिशून्यलग्ने ॥ १७ ॥
अन्वयः—पक्षादितः ओजतिथौ (क्रमेण) घटैणौ, मृगेन्द्रनक्रौ, मिथुनाङ्गने,
चापेन्दुभे, कर्कहरी, ह्यान्त्यौ, गोन्त्यौ (एते) तिथिशून्यलग्ने, नेष्टे ॥ १७ ॥
शुक्ल और कृष्ण पक्ष की विषम तिथियों में ये लग्ने दग्धसंज्ञक हैं।
प्रतिपदा में तुला और मकर, तृतीया में सिंह और मकर, पञ्चमी में मिथुन
और कन्या, सप्तमी में कर्क और धनु, नवमी में कर्क और सिंह, एकादशी में
धनु और मीन, त्रयोदशी में वृष और मीन शून्य हैं। इसलिये इनमें कोई
शुभ कार्य न करे ॥ १७ ॥
पूर्वोक्त दुष्ट योगों का परिहार
तिथयो मासशून्याश्च शून्यलग्नानि यान्यपि ।
मध्यदेशे विवर्ज्यानि न दूष्याणीतरेषु तु ॥ १८ ॥
पङ्ग्वन्धकाणलग्नानि मासशून्याश्च राशयः ।
गौडमालवयोस्त्याज्या अन्यदेशे न गर्हिताः ॥ १९ ॥
अन्वयः—मासशून्याः तिथयः अपि च (पुनः) यानि शून्यलग्नानि (तानि)
मध्यदेशे विवर्ज्यानि, इतरेषु (देवेषु) तु न दूष्याणि ॥ १८ ॥ पङ्ग्वन्धकाणलग्नानि,
मासशून्याः राशयश्च गौडमालवयोः (देशयोः) त्याज्याः, अन्यदेशें न गर्हिताः ॥ १९ ॥
मासों की शून्य तिथियाँ और शून्य लग्नें मध्यदेश में ही वर्जित हैं, अन्य
देशों में नहीं। पंगु, अन्ध और काण लग्नें तथा मासों की शून्य राशियाँ गौड़
और मालव देश में त्याज्य हैं, अन्य देशों में निन्दित नहीं हैं ॥ १८-१९ ॥
शुभ कर्मों में निषिद्ध योग।
वर्जयेत्सर्वकार्येषु हस्तार्कं पञ्चमीतिथौ ।
भौमाश्विनौ च सप्तम्यां षष्ठ्यां चन्द्रैन्दवं तथा ॥ २० ॥

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१० मुहूर्तचिन्तामणि
बुधानुराधामष्टम्यां दशम्यां भृगुरेवतीम् ।
नवम्यां गुरुपुष्यं चैकादश्यां शनिरोहिणीम् ॥ २१ ॥
अन्वयः—पञ्चमीतिथौ हस्तार्कं, सप्तम्यां भौमाश्विनीं, षष्ठयां चन्द्रैन्दवं,
अष्टम्यां बुधानुराधां, दशम्यां भृगुरेवतीं, नवम्यां गुरुपुष्यं, एकादश्यां शनिरोहिणीं च
सर्वकार्येषु वर्जयेत् ॥ २०-२१ ॥
पञ्चमी तिथि में हस्त नक्षत्र और रविवार, सप्तमी में अश्विनी नक्षत्र
और मङ्गलवार, छठि में मृगशिरा नक्षत्र और सोमवार, अष्टमी में अनुराधा
नक्षत्र और बुधवार, दशमी में रेवती नक्षत्र और शुक्रवार, नवमी में पुष्य
नक्षत्र और बृहस्पतिवार, एकादशी में रोहिणी नक्षत्र और शनिवार हो तो
शुभ कर्मों में त्याग देना चाहिए ॥ २०-२१ ॥
गृहप्रवेश, यात्रा और विवाह में क्रम से
वर्जनीय वार तथा नक्षत्र
गृहप्रवेशे यात्रायां विवाहे च यथाक्रमम् ।
भौमेऽश्विनीं शनौ ब्राह्मं गुरौ पुष्यं विवर्जयेत् ॥ २२ ॥
अन्वयः—गृहप्रवेशे, यात्रायां, च (पुनः) विवाहे, यथाक्रमं भौमेऽश्विनीं, शनौ
ब्राह्मं, गुरौ पुष्यं, विवर्जयेत् ॥ २२ ॥
गृहप्रवेश, यात्रा और विवाह में क्रम से मङ्गल के दिन अश्विनी, शनैश्चर
के दिन रोहिणी और बृहस्पति के दिन पुष्य नक्षत्र वर्जित है। अर्थात्
मङ्गल के दिन अश्विनी नक्षत्र हो तो गृहप्रवेश, शनैश्चर के दिन रोहिणी
नक्षत्र हो तो यात्रा और बृहस्पति के दिन पुष्य नक्षत्र हो तो विवाह न
करना चाहिए ॥ २२ ॥
आनन्दादि अट्ठाइस योग
आनन्दाख्यः कालदण्डश्च धूम्रो धातासौम्यौ ध्वाङ्क्षकेतू क्रमेण ।
श्रीवत्साख्यो वज्रकं मुद्गरश्च छत्रं मित्रं मानसं पद्मलुम्बौ ॥ २३ ॥
उत्पातमृत्यू किल काणसिद्धी शुभोऽमृताख्यो मुसलं गदश्च ।
मातङ्गरक्षश्चरसुस्थिराख्यप्रवर्द्धमानाः फलदाः स्वनाम्ना ॥ २४ ॥
अन्वयः—आनन्दाख्यः, कालदण्डः, च (पुनः) धूम्रः, धाता, सौम्यः, ध्वांक्षकेतू,
श्रीवत्साख्यः, वज्रकं च मुद्गर, छत्रं, मित्रं, मानसं, पद्मलुम्बौ, उत्पातमृत्यू, किल

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शुभाशुभप्रकरण ११
(निश्चयेन) काणसिद्धी, शुभः, अमृताख्यः, मुसलं, गदः च मातङ्गरक्षश्चरसुस्थिराख्य-
प्रवर्धमानाः क्रमेण (एते अष्टाविंशतियोगाः) स्वनाम्ना फलदाः (भवन्ति) ॥ २३-२४ ॥
आनन्द, कालदण्ड, धूम्र, धाता, सौम्य, ध्वांक्ष, केतु, श्रीवत्स, वज्र,
मुद्गर, छत्र, मित्र, मानस, पद्म, लुम्ब, उत्पात, मृत्यु, काण, सिद्धि, शुभ,
अमृत, मुसल, गद, मातंग, रक्ष, चर, सुस्थिर और प्रवर्द्धमानं, ये अट्ठाइस
योग अपने नाम के सदृश फल देनेवाले हैं ॥ २३-२४ ॥
इन योगों के जानने का उपाय
दास्रादर्कै मृगादिन्दौ सार्पाद्भौमे कराद्बुधे ।
मैत्राद्गुरौ भृगौ वैश्वाद्गण्या मन्दे च वारुणात् ॥ २५ ॥
अन्वयः—अर्कै दास्रात्, इन्दौ मृगात्, भौमे सार्पात्, बुधे करात्, गुरौ मैत्रात्,
भृगौ वैश्वात्, मन्दे वारुणात् (आनन्दादयो योगाः क्रमेण) गण्याः ॥ २५ ॥
रविवार को अश्विनी से, सोमवार को मृगशिरा से, मंगल को आश्लेषा
से, बुध को हस्त से, बृहस्पति को अनुराधा से, शुक्र को उत्तराषाढ़ से,
शनैश्चर को शतभिष से, अभिजित् के सहित इष्ट दिन नक्षत्र तक गणना
करने से जितनी संख्या हो आनन्दादि गणना से उतनी ही संख्यावाला योग
इष्ट दिन में जानना चाहिए । जैसे रविवार के दिन यदि श्रवण नक्षत्र हो तो
अश्विनी से अभिजित् सहित गिनने पर श्रवण तेइसवाँ हुआ और आनन्दादिकों
की गणना करने पर गदयोग तेइसवाँ हुआ । यही योग उस रविवार को
होगा । इसी रीति से और भी जानना चाहिए ॥ २५ ॥
—:०:—