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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages
Page 484Permalink

सप्तमोऽङ्कः | ४१९

राक्षस—हे चाणक्य ! ( इसमें ) सन्देह क्यों ?

चाणक्य—अमात्य राक्षस ! बिना शस्त्र धारण किये आप चन्द्रगुप्त पर अनुग्रह कर रहे हैं, इसलिये सन्देह है। अतः यदि सचमुच ही चन्दनदास का जीवन चाहते हैं तो यह शस्त्र धारण कीजिए।

राक्षस—हे चाणक्य ! नही, ऐसा नही। इसके ग्रहण करने में हम अयोग्य हैं, विशेष करके आपके द्वारा ग्रहण किये हुए शस्त्र के (ग्रहण करने में)।

चाणक्य—अमात्य राक्षस ! मैं योग्य हूँ और आप अयोग्य हैं, यह कैसे ? देखिए—

मर्दीले शत्रु के गर्व को चूर करने वाले तथा अत्यन्त पराक्रमी आपके प्रभाव से पलान से रहित न होने वाले और निरन्तर लगाम के धारण करने से क्षीण घोड़ों के साथ नहाने, खाने, घूमने, पीने और सोने के यथेच्छ उपभोगों से वंचित तथा हौदे के सदा कसे रहने से सूजे हुए पृष्ठ भाग वाले इन हाथियों को देखिए ॥१५॥

टिप्पणी—अपि—यहाँ प्रश्नवाचक अव्यय है। अगृहीतशस्त्रेण—अगदत्तायुधेन। यह शस्त्र अमात्य-पद का प्रतीक है। अजस्र—न जस्यति मुञ्चतीति अजस्रम् नञ् √ जस् + र कर्तरि। अजस्रं दत्ता इति अजस्रदत्ता सुप्सुपा स०। स्नानाहारविहारपानशयन—इसमें द्वन्द्व समास है। परिकल्पना—हौदा। व्यतिकर—नित्य सम्पर्क या संलग्नता। वि—अति √ कृ + घ करणे वा अप् भावे = व्यतिकरः। प्रोच्छून—सूजी हुई ( पीठ की हड्डी )। प्र—उद् √ श्वि + क्त कर्तरि। इस श्लोक में तुल्ययोगिता अलंकार है और शार्दूल-विक्रीडित छन्द है। इस छन्द का लक्षण १, १२ में देखिए ॥१५॥

अथवा किमनेन न खलु भवतः शस्त्रग्रहणमन्तरेण चन्दनदासस्य जीवितमस्ति।

राक्षसः—[ स्वगतम् ]

नन्दस्नेहकणाः स्पृशन्ति हृदयं भृत्योऽस्मि तद्विद्विषां
ये सिक्ताः स्वयमेव पाणिपयसा च्छेद्यास्त एव द्रुमाः ? ।

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४१८ मुद्राराक्षसम्

चाणक्य— हे राजन् चन्द्रगुप्त ! फिर तुम्हारा क्या प्रिय उपकार करूँ ?

राजा— इससे बढकर क्या प्रिय है ?

राक्षस के साथ मित्रता ( करवा दी ), हमे राज्य में प्रतिष्ठित कर दिया और सभी नन्दो का विनाश कर दिया । इससे अधिक क्या ( प्रिय ) करना है ? ॥१७॥

टिप्पणी—प्रतिमानयितव्य— सम्माननीय, स्वीकर्तव्य इत्यर्थः । प्रति√मन् + णिच् वा √मान् ( चुरादि ) + तव्य कर्मणि । प्रणय— प्रार्थना । प्रणीयते अनेन इति प्र√नी + अच् करणे । पित्र्यम्— पितुरागत इति पितृ + यत् = पित्र्यः, तम् । यह 'विषयम्' का विशेषण है । विषयम्— देश, राज्य को । भो राजन् चन्द्रगुप्त— यही चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को राजा कहकर सम्बोधित किया है, नही तो इसके पूर्व सभी जगह 'वृषल' ही कहा है । इसका कारण यह है कि राक्षस के अमात्य बन जाने से चन्द्रगुप्त का राज्य स्थिर हो गया है, इसलिए अब यह वस्तुत राजा है । इससे पूर्व तो इसका राजपद डावाडोल था । इसी कारण चाणक्य ने राजा नहीं कहा । श्लोक १७ में सम नामक अलकार है और अनुष्टुप् छन्द है । अनुष्टुप् का लक्षण १, ३ में देखिए ॥१७॥

चाणक्य— विजये ! उच्यता दुगं rush/दुर्गपालो विजयपालश्च, अमात्यराक्षसपरिग्रहेण प्रीतो देवश्चन्द्रगुप्त समाज्ञापयति—विना हस्त्यश्व क्रियता सर्वबन्धनमोक्ष इति । अथवा अमात्यराक्षसे नेतरि किं हस्त्यश्वेन प्रयोजनम् ? तदिदानीम्—

सह वाहनहस्तिभ्या मुच्यता सर्वबन्धनम् ।
मया पूर्णप्रतिज्ञेन केवल बध्यते शिखा ॥१८॥

[ इति शिखा बध्नाति ]

प्रतीहारी— ज अज्जो आणवेदि । ( यदार्य आज्ञापयति । )

[ इति निष्क्रान्ता । ]

अन्वय— वाहनहस्तिभ्यां सह सर्वबन्धनम् मुच्यताम् । पूर्णप्रतिज्ञेन मया केवलं शिखा बध्यते ॥१८॥

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सप्तमोऽङ्कः ४१६

व्याख्या—वाहनहस्तिभ्यां—अश्वगजाभ्यां, सह—साकं, सर्वबन्धनम्—सर्वेषां समेषां बन्धनं संयमनं, मुच्यताम्—अपनीयताम्। पूर्णप्रतिज्ञेन—पूर्णा सफला प्रतिज्ञा प्रतिश्रुतिः यस्य तथाविधेन, मया—चाणक्येन, केवलं—मात्रं, शिखा—चूडा, बध्यते—संयम्यते ॥१८॥

हिन्दी अनुवाद—चाणक्य—विजये ! दुर्गपाल और विजयपाल कहो कि अमात्य राक्षस के मिल जाने से प्रसन्न महाराज चन्द्रगुप्त आज्ञा देते हैं कि हाथियों और घोड़ो को छोड़कर सब के बन्धन खोल दिये जायं। अथवा अमात्य राक्षस के मंत्री होने पर हाथी-घोड़े का क्या काम ? इसलिए अब—

हाथियों और घोड़ों के साथ सब का बन्धन खोल दिया जाय। पूर्ण प्रतिज्ञा वाला मैं केवल शिखा बांधता हूँ ॥१८॥

[ शिखा बाँधता है। ]

प्रतिहारी—जो आर्य की आज्ञा।

[ बाहर चली जाती है। ]

टिप्पणी—हस्त्यश्वम्—हस्तिनश्च अश्वाश्च इति हस्त्यश्वम् द्वन्द्वसमासे कृते 'द्वन्द्वश्च प्राणितूर्यसेनाङ्गानाम्' इति सूत्रेण एकवद्भावः। प्रयोजनम्—प्रयोज्यते अनेन इति प्र√युज्+णिच्+ल्युट् करणे = प्रयोजनम्। वाहन—उह्यते अनेन इति √वह्+ल्युट् करणे, निपातनात् वृद्धिः = वाहनम् = अश्वः। पूर्णप्रतिज्ञेन—जिसकी प्रतिज्ञा पूरी हो चुकी है। नन्दवंशोन्मूलन के बाद चाणक्य की प्रतिज्ञा थी कि राक्षस को चन्द्रगुप्त से मिलाकर मौर्य की लक्ष्मी को स्थिर करना। वह अब पूरी हो चुकी है। इसलिए वह अपने को पूर्णप्रतिज्ञ कहता है और शिखा भी बांध लेता है। इस श्लोक में एक ही शिखा में विरूप बन्धन और मोचन की संघटना होने से विषमालंकार है। इसमें भी अनुष्टुप् छन्द है ॥१८॥

चाणक्यः—अमात्यराक्षस ! तदुच्यतां, किं ते भूयः प्रियमुपकरोमि ?

राक्षसः—किमतः परमपि प्रियमस्ति ? यदि न परितोषस्तदिदमस्तु—

[ भरत-वाक्यम् ]

वाराहीमात्मयोनेस्तनुमतनुबलामास्थितस्यानुरूपां
यस्य प्राग्दन्तकोटिं प्रलयपरिगता शिश्रिये भूतधात्री।

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४२० सप्तमोऽङ्कः

म्लेच्छैरुद्वेज्यमाना भुजयुगमधुना संश्रिता राजमूर्ते
स श्रीमद्वन्धुभृत्यश्चिरमवतु मही पार्थिवश्चन्द्रगुप्त ॥ १९ ॥

[ इति निष्क्रान्ता सर्वे । ]
॥ इति मुद्राराक्षसे सप्तमोऽङ्कः ॥

अन्वयः—प्रलयपरिगता भूतधात्री प्राक् अतनुबलाम् अनुरुपा वाराहीं तनुम् आस्थितस्य यस्य आत्मयोनेः दन्तकोटिं शिश्रिये, अधुना म्लेच्छै उद्वेज्यमना (सती) राजमूर्ते (यस्य) भुजयुगम् संश्रिता स श्रीमद्वन्धुभृत्यः पार्थिवः चन्द्रगुप्तः महीं चिरम् अवतु ॥१९॥

व्याख्या—प्रलयपरिगता—प्रलयेन कल्पक्षयेण परिगता अभिभूता, भूतधात्री—पृथिवी, प्राक्—पूर्वम् कल्पादौ इति यावत्, अतनुबलाम्—प्रचुरबलवतीम्, अनुरूपा—योग्या, वाराहीं—शौकरी, तनु—शरीरम्, आस्थितस्य—अधितिष्ठतः, यस्य, आत्मयोने—स्वयम्भुवः श्रीविष्णो, दन्तकोटिं—दशनाग्र, शिश्रिये—आश्रिता, अधुना—सम्प्रति, म्लेच्छै—यवने, उद्वेज्यमाना—पीड्यमाना, (सती) राजमूर्ते—पार्थिवदेहस्य (यस्य आत्मयोनेः), भुजयुगम्—बाहुयुगलम्, संश्रिता—समवलम्बिता, स, श्रीमद्वन्धुभृत्य—श्रीमन्तः समृद्धा बान्धवाः स्वजना भृत्या सेवकाश्च यस्य तादृश, पार्थिव—राजा, चन्द्रगुप्त—मौर्य, महीं—पृथिवीम् चिरम्—दीर्घकाल यावत्, अवतु—रक्षतु ॥१९॥

हिन्दी अनुवाद—चाणक्य—अमात्य राक्षस ! तो कहिये, और क्या आपका प्रिय उपकार करूं ?

राक्षस—क्या इससे बढकर भी कोई प्रिय है ? यदि सन्तोष न होतो यह रहे—

[ भरत-वाक्य ]

प्रलय से व्याप्त (होती हुई) पृथिवी ने पहले (कल्प के आरम्भ में) प्रचुरबलशाली तथा (रक्षा करने में) समर्थ शूकर-शरीर को धारण किये हुए जिस स्वयम्भू विष्णु के दांतों के अग्रभाग का अवलम्ब किया था और इस समय म्लेच्छों से पीडित होती हुई (उसने जिस) राजमूर्ति (अर्थात् राजा का शरीर

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सप्तमोऽङ्कः

४२१

धारण किये हुए विष्णु ) की दोनों भुजाओं का आश्रय लिया है, वह श्री-सम्पन्न बन्धुओं एवम् अनुचरों वाला राजा चन्द्रगुप्त चिरकाल तक पृथिवी की रक्षा करे ॥१६॥

[ सभी ( पात्र रंगमंच से ) चले जाते हैं । ]

॥ मुद्राराक्षस ( नामक नाटक ) में सातवाँ अंक समाप्त ॥

टिप्पणी—भरतवाक्यम्—नाटक के अन्त में आशीर्वाद रूप में गाया जाने वाला पद्य । भूतधात्री—भूतानां प्राणिनां धात्री जननी = पृथिवी । वाराहीम्—वराहः शूकरः तस्य इयम् इति वराह + अण् + ङीप् = वाराही, ताम् । आत्मयोनेः—आत्मा स्वयमेव योनिः कारणमस्य इति आत्मयोनिः, तस्य । शिश्रिये—√श्रिधातुः उभयपदी । अत्र कर्त्रभिप्राये क्रियाफले आत्मनेपदम् । उद्वेज्यमाना—उद् √विज् + णिच् + शानच् कर्मणि । कई पुस्तकों में 'उद्विज्यमाना' पाठ है । वह अशुद्ध है; कारण विज् धातु अकर्मक है । उससे कर्म में शानच् कैसे हो सकता है ? अतएव णिजन्त से कर्म में शानच् करना चाहिए । राजमूर्तेः—पुरा वाराहीं तनुम् आस्थितस्य अधुना राजमूर्तेः । संश्रिता—सम् √श्रि + क्त कर्तरि वर्तमाने । 'ग्रन्थादौ ग्रन्थमध्ये ग्रन्थान्ते च मङ्गलमाचरेत्' इस शिष्टाचार के अनुसार इस ग्रन्थ के आदि में 'धन्या केयम्' श्लोक से, मध्य में 'आकाशं काशपुष्पम्' श्लोक से और अन्त में 'वाराहीम्' इस प्रकृत श्लोक से कवि ने मंगलाचरण किया है ॥१६॥

एषा मदीया सरला सुबोधा व्याख्या प्रिया मन्दधियामपि स्यात् ।
विभाव्य पूर्णेयमिति श्रमेण प्रीत्यै कृता प्रीतिमतोः स्वपित्रोः ॥ १ ॥

गृहीता पूर्वटीकाभ्यो बह्वीभ्यो हि सहायता ।
तासां कृतज्ञताञ्जलिं निर्मातॄणां करोम्यहम् ॥२॥

* श्रीसाम्बसदाशिवार्पणम् *