मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
by महाकवि विशाखदत्त
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Read in context४२० सप्तमोऽङ्कः
म्लेच्छैरुद्वेज्यमाना भुजयुगमधुना संश्रिता राजमूर्ते
स श्रीमद्वन्धुभृत्यश्चिरमवतु मही पार्थिवश्चन्द्रगुप्त ॥ १९ ॥
[ इति निष्क्रान्ता सर्वे । ]
॥ इति मुद्राराक्षसे सप्तमोऽङ्कः ॥
अन्वयः—प्रलयपरिगता भूतधात्री प्राक् अतनुबलाम् अनुरुपा वाराहीं तनुम् आस्थितस्य यस्य आत्मयोनेः दन्तकोटिं शिश्रिये, अधुना म्लेच्छै उद्वेज्यमना (सती) राजमूर्ते (यस्य) भुजयुगम् संश्रिता स श्रीमद्वन्धुभृत्यः पार्थिवः चन्द्रगुप्तः महीं चिरम् अवतु ॥१९॥
व्याख्या—प्रलयपरिगता—प्रलयेन कल्पक्षयेण परिगता अभिभूता, भूतधात्री—पृथिवी, प्राक्—पूर्वम् कल्पादौ इति यावत्, अतनुबलाम्—प्रचुरबलवतीम्, अनुरूपा—योग्या, वाराहीं—शौकरी, तनु—शरीरम्, आस्थितस्य—अधितिष्ठतः, यस्य, आत्मयोने—स्वयम्भुवः श्रीविष्णो, दन्तकोटिं—दशनाग्र, शिश्रिये—आश्रिता, अधुना—सम्प्रति, म्लेच्छै—यवने, उद्वेज्यमाना—पीड्यमाना, (सती) राजमूर्ते—पार्थिवदेहस्य (यस्य आत्मयोनेः), भुजयुगम्—बाहुयुगलम्, संश्रिता—समवलम्बिता, स, श्रीमद्वन्धुभृत्य—श्रीमन्तः समृद्धा बान्धवाः स्वजना भृत्या सेवकाश्च यस्य तादृश, पार्थिव—राजा, चन्द्रगुप्त—मौर्य, महीं—पृथिवीम् चिरम्—दीर्घकाल यावत्, अवतु—रक्षतु ॥१९॥
हिन्दी अनुवाद—चाणक्य—अमात्य राक्षस ! तो कहिये, और क्या आपका प्रिय उपकार करूं ?
राक्षस—क्या इससे बढकर भी कोई प्रिय है ? यदि सन्तोष न होतो यह रहे—
[ भरत-वाक्य ]
प्रलय से व्याप्त (होती हुई) पृथिवी ने पहले (कल्प के आरम्भ में) प्रचुरबलशाली तथा (रक्षा करने में) समर्थ शूकर-शरीर को धारण किये हुए जिस स्वयम्भू विष्णु के दांतों के अग्रभाग का अवलम्ब किया था और इस समय म्लेच्छों से पीडित होती हुई (उसने जिस) राजमूर्ति (अर्थात् राजा का शरीर