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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

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४१८ मुद्राराक्षसम्

चाणक्य— हे राजन् चन्द्रगुप्त ! फिर तुम्हारा क्या प्रिय उपकार करूँ ?

राजा— इससे बढकर क्या प्रिय है ?

राक्षस के साथ मित्रता ( करवा दी ), हमे राज्य में प्रतिष्ठित कर दिया और सभी नन्दो का विनाश कर दिया । इससे अधिक क्या ( प्रिय ) करना है ? ॥१७॥

टिप्पणी—प्रतिमानयितव्य— सम्माननीय, स्वीकर्तव्य इत्यर्थः । प्रति√मन् + णिच् वा √मान् ( चुरादि ) + तव्य कर्मणि । प्रणय— प्रार्थना । प्रणीयते अनेन इति प्र√नी + अच् करणे । पित्र्यम्— पितुरागत इति पितृ + यत् = पित्र्यः, तम् । यह 'विषयम्' का विशेषण है । विषयम्— देश, राज्य को । भो राजन् चन्द्रगुप्त— यही चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को राजा कहकर सम्बोधित किया है, नही तो इसके पूर्व सभी जगह 'वृषल' ही कहा है । इसका कारण यह है कि राक्षस के अमात्य बन जाने से चन्द्रगुप्त का राज्य स्थिर हो गया है, इसलिए अब यह वस्तुत राजा है । इससे पूर्व तो इसका राजपद डावाडोल था । इसी कारण चाणक्य ने राजा नहीं कहा । श्लोक १७ में सम नामक अलकार है और अनुष्टुप् छन्द है । अनुष्टुप् का लक्षण १, ३ में देखिए ॥१७॥

चाणक्य— विजये ! उच्यता दुगं rush/दुर्गपालो विजयपालश्च, अमात्यराक्षसपरिग्रहेण प्रीतो देवश्चन्द्रगुप्त समाज्ञापयति—विना हस्त्यश्व क्रियता सर्वबन्धनमोक्ष इति । अथवा अमात्यराक्षसे नेतरि किं हस्त्यश्वेन प्रयोजनम् ? तदिदानीम्—

सह वाहनहस्तिभ्या मुच्यता सर्वबन्धनम् ।
मया पूर्णप्रतिज्ञेन केवल बध्यते शिखा ॥१८॥

[ इति शिखा बध्नाति ]

प्रतीहारी— ज अज्जो आणवेदि । ( यदार्य आज्ञापयति । )

[ इति निष्क्रान्ता । ]

अन्वय— वाहनहस्तिभ्यां सह सर्वबन्धनम् मुच्यताम् । पूर्णप्रतिज्ञेन मया केवलं शिखा बध्यते ॥१८॥