मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
by महाकवि विशाखदत्त
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अपराध लगाकर कि उसी ने दारुवर्मा आदि शिल्पियों की नियुक्ति की थी, फांसी के दण्ड से दण्डित किया गया। इसी भांति चन्दनदास को आपके परिवार को छिपाकर अपने घर में रखने के आरोप में स्त्री-पुत्रादि सहित कारागार में डाल दिया गया।
इसी बीच शकटदास को लेकर सिद्धार्थक वहाँ आ जाता है। शकटदास बतलाता है कि प्रिय मित्र सिद्धार्थक की ही कृपा से मेरे प्राण बच सके। इस उपकार के बदले राक्षस मलयकेतु द्वारा प्रेषित आभूषण को अपने शरीर से उतारकर सिद्धार्थक को दे देता है। सिद्धार्थक राक्षस से प्रार्थना करता है कि मैं इस स्थान पर अपरिचित हूँ। अतएव अभी आप इसे अपने पास रख लें—जब मुझे आवश्यकता पड़ेगी, आपसे ले लूंगा। अब सिद्धार्थक राक्षस का विश्वासपात्र बनकर उसी के पास रहने लगता है।
इसके अनन्तर विराधगुप्त राक्षस को पुनः सूचना देता है कि मलयकेतु के भाग आने के पश्चात् चन्द्रगुप्त और चाणक्य में फूट उत्पन्न हो गई है। इसी कारण अब चन्द्रगुप्त चाणक्य के आदेशों को पूर्ववत् नहीं मानता है।
तत्पश्चात् राक्षस उसी वेश में विराधगुप्त को 'स्तनकलश' से सन्देश कहने के लिये कुसुमपुर भेजता है। सन्देश यह है कि तुम अपनी स्तुतियों द्वारा चन्द्रगुप्त को चाणक्य के विरोध में भड़काने का प्रयत्न करना तथा यदि कोई गुप्त सूचना हो तो करभक द्वारा मेरे पास भेजना।
इसके पश्चात् तीन आभूषण खरीदे जाते हैं। तदनन्तर राक्षस करभक को कुछ आदेश देकर कुसुमपुर भेज देता है।
तृतीय अङ्क—पाटलिपुत्र में कंचुकी द्वारा घोषणा की जाती है कि महाराज चन्द्रगुप्त की आज्ञा है कि कौमुदी-महोत्सव के अवसर पर कुसुमपुर (पाटलिपुत्र) को भली भांति से सजाया जावे।
तदनन्तर वह सुगांग नामक महल की छत से नगर की शोभा का निरीक्षण करता है, किन्तु उसे नगर में कोई चहल-पहल दृष्टिगोचर नहीं होती है। कौमुदी-महोत्सव मनाये जाने का कोई चिह्न तक नहीं दिखलायी पड़ता है। कंचुकी द्वारा यह ज्ञात होने पर, कि आर्य चाणक्य ने कौमुदी-महोत्सव मनाये जाने का विरोध कर दिया है, वह आर्य चाणक्य को बुलवाता है।
चाणक्य के निवास स्थान पर पहुँचकर कंचुकी उसे चिन्तित अवस्था में पाता है। चाणक्य सोच रहा है कि राक्षस को किस भांति वश में किया जाय।