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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

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( ५८ )

इसके पश्चात् संपेरा आकर अपना परिचय देकर कुसुमपुर के सम्पूर्ण समाचारों से राक्षस को अवगत कराता हुआ कहता है —

पाटलिपुत्र के चारो ओर से घिर जाने पर सर्वार्थसिद्धि सुरंग के मार्ग से निकलकर भाग गये। आप भी नन्द-साम्राज्य की पुन स्थापना हेतु सुरंग के माग से ही बाहर आ गये। विषकन्या द्वारा पर्वतक की मृत्यु कर दी गयी और तदनन्तर कुमार मलयकेतु भी पाटलिपुत्र छोड कर चले गये। ऐसे निष्कण्टक समय के आ जाने पर चाणक्य न राजभवन मे चन्द्रगुप्त के प्रवेश करने की तिथि की घोषणा कर दी। शिल्पियो द्वारा सूचित किया गया कि चन्द्रगुप्त के राज-भवन मे प्रवेश के उपलक्ष्य मे दारुवर्मा ने पूर्वीय द्वार की साज सज्जा कर दी है। चाणक्य उसकी चाल को समझ गया। निश्चित समय पर अर्धरात्रि के समय पर्वतक के भाई वैरोचक को चन्द्रगुप्त के साथ एक ही आसन पर बिठाकर राज्या-भिषेक कर दिया। तदनन्तर चन्द्रगुप्त के राजभवन में प्रवेश करते समय चन्द्रगुप्त की हथिनी चन्द्रलेखा के ऊपर वैरोचक को बैठा दिया। इस स्थिति मे चन्द्रगुप्त की भ्रान्ति में वैरोचक पर ही यन्त्र-तोरण गिराने के लिये दारुवर्मा ने तैयारी की। दूसरी ओर आप द्वारा नियुक्त महावत बर्बरक वैरोचक को ही चन्द्रगुप्त जानकर अपनी सोने की छड़ी से कटार निकालने लगा। हथिनी न यह समझा कि अब यह छड़ी मेरे ऊपर पड़ने ही वाली है, अतः अपनी चाल तेज कर दी। परिणामस्वरूप यत्र तोरण के गिरने के समय न तो चन्द्रगुप्त ही मारा जा सका और न वैरोचक ही। बेचारा बर्बरक ही मार दिया गया। ऐसा होने पर दारुवर्मा ने अपनी मृत्यु को निश्चित समझकर यन्त्र की कील से चन्द्रगुप्त के भ्रम मे वैरोचक को मार दिया। वैरोचक के पीछे चलने वाले लोगो ने ढेलों को मार-मारकर दारुवर्मा को मार दिया। अभयदत्त नामक वैद्य को भी, जिसने चन्द्रगुप्त को मार देने के निमित्त विष-मिश्रित ओषधि तैयार की थी, उसी ओषधि को पिलाकर मार दिया गया। शयन-कक्ष का अधिकारी प्रमोदक भी असंगत उत्तर देने के उपलक्ष्य में मार दिया गया। बीभत्सकादि जो दीवाल की सुरंग में चन्द्रगुप्त को मार देने के निमित्त रह रहे थे, को भी उस सुरंग में आग लगवाकर मार दिया गया। क्षपणक जीवसिद्धि को विषकन्या द्वारा पर्वतेश्वर की हत्या कराये जाने के अपराध मे देश-निकाला दे दिया गया। शकटदास पर यह