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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

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वह सोचता है कि मेरे गुप्तचरो से मलयकेतु घिरा हुआ है । अब मैं चन्द्रगुप्त के साथ कृत्रिम-कलह उत्पन्न करक राक्षस को मलयकेतु से अलग कर दूँगा । इसी बीच कंचुकी चन्द्रगुप्त का सन्देश चाणक्य से कह देता है । चाणक्य कंचुकी से पूछता है कि क्या चन्द्रगुप्त को कौमुदी-महोत्सव के न मनाये जाने सम्बन्धी मेरे आदेश का पता लग गया है ? कंचुकी द्वारा 'हा' कह दिये जाने पर वह क्रोधा-वेश में चन्द्रगुप्त के समीप चल देता है ।

चाणक्य के आ जाने पर चन्द्रगुप्त उन्हे प्रणाम कर उचित आसन पर बैठाता है । चाणक्य उसे सार्वभौम सम्राट होने सम्बन्धी आशीर्वाद देता है । चन्द्रगुप्त द्वारा कौमुदी-महोत्सव के निषेध का कारण पूछे जाने पर चाणक्य उत्तर देता है—यह बात मन्त्री से सम्बद्ध है । तुम सचिवायत्त सिद्धि हो, अत तुमको कारण जानने से क्या प्रयोजन ? इसी मध्य दो वैतालिक राजा की स्तुति करते हुये श्लोक पाठ करते हैं । इनमे प्रथम राजा का अपना व्यक्ति है तथा दूसरा राक्षस का आदमी है—स्तनकलश । यह दूसरा वैतालिक स्तुति के बहाने से चन्द्रगुप्त को चाणक्य से फोड़ने की बात कहता है । चाणक्य इसे समझ लेता है । चन्द्रगुप्त दोनो को प्रभूत धनराशि पारितोषिक रूप में देने का आदेश दे देता है । चाणक्य इसका निषेध करता है । इस पर चन्द्रगुप्त कहता है "आप पग-पग पर मेरे कार्यों में हस्तक्षेप करते हैं । अतएव यह राज्य मेरे लिये राज्य न होकर, एक प्रकार का बन्धन ही बन गया है ।" चाणक्य उत्तेजना के साथ कहता है—तो तुम अपना कार्य स्वय ही देखो, मैं भी अपने श्रोत्रिय सम्बन्धी कार्य मे सलग्न हो जाऊगा । राजा पुनः कौमुदी-महोत्सव के निषेध का कारण पूछता है । चाणक्य कहता है—हमारे भद्रभट आदि सेनाध्यक्ष मलयकेतु से जाकर मिल गये हैं तथा आक्रमण की तैयारी मे व्यस्त हैं । उक्त स्थिति मे हमारे लिये सैन्य-सज्जा करना उचित है अथवा कौमुदी-महोत्सव का मनाना ? चन्द्रगुप्त पुन प्रश्न करता है कि आपने मलयकेतु एव राक्षस को भाग जाने का अवसर क्यो दिया ? इसका भी चाणक्य द्वारा उत्तर दिया जाता है किन्तु उससे चन्द्रगुप्त को सन्तोष नही होता है और वह कहता है—मैं आपसे तर्क-वितर्क नही करना चाहता हूँ, मैं तो आपसे अधिक राक्षस को ही प्रशंसनीय समझता हूँ क्योकि उसने पाटलिपुत्र में रहते हुये हमारे व्यक्तियो को फोड लिया और हम कुछ न