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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

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DevanagariSanskritpublished488 pages

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( ३० )

आधार पर उन्हें भगवान् विष्णु का पृथ्वी-रक्षक अवतार माना जाय (जैसा कि भरतवाक्य में वर्णित है )।

(४) मुद्राराक्षस की शैली छठी अथवा उसके बाद की शताब्दी की शैली से मेल नहीं खाती है ।

(५) इस नाटक के सप्तम अङ्क के छठे ( "दुष्कालेऽपि "इत्यादि ) श्लोक में वर्णित चन्दनदास के शील-सौजन्य को बोधिसत्वों के शील-सौजन्य से बढ़ा-चढ़ा कर वर्णन किया जाना छठी अथवा उसके बाद की शताब्दी के भारत की धार्मिक भावनाओं के साथ संगत नहीं है ।

(६) मुद्राराक्षस के 'भरतवाक्य' में 'म्लेच्छ' शब्द से केवल हूणों का ही अर्थ लिया जाय, यह बात कुछ उचित प्रतीत नहीं होती है, जब कि नाटककार ने कुलूताधिपति चित्रवर्मा, मलयदेश के राजा सिंहनाद, कश्मीर-नरेश पुष्कराक्ष, सिन्धुदेश के राजा सिन्धुषेण और पारस के अधिपति मेघ को भी म्लेच्छ कहा है ( कौलूतश्चित्रवर्मा इत्यादि श्लोक १।२०।। ) । पर्वतेश्वर तथा उसका बेटा मलयकेतु भी म्लेच्छ ही थे । इसके अतिरिक्त नाटककार शक, यवन, किरात, कम्बोज दरद्वासी, परशियन तथा बाह्लीक लोगों से भी पूर्णतया परिचित है (द्वितीय अङ्क में विराघगुप्त के कथन में १३वें श्लोक से पूर्व) । ये सभी म्लेच्छ-राज पर्वतक की सेना के अङ्ग थे । ये सभी उस समय वीरता के लिये प्रसिद्ध थे । इन पर कोई साधारण राजा विजय प्राप्त नहीं कर सकता था । अतः नाटककार ने जिस राजा की महानता एव अप्रतिम शक्ति शालिता का वर्णन अपने नाटक में प्रस्तुत किया है वह राजा मौखरिवंशीय 'अवन्तिवर्मा' नहीं हो सकता है । अतः 'अवन्तिवर्मा' को विशाखदत्त का आश्रयदाता स्वीकार किया जाना संगत प्रतीत नहीं होता है ।

(४) पार्थिवश्चन्द्रगुप्त पाठ ही अधिक प्रामाणिक प्रतीत होता है, ऐसा कुछ विद्वानों तथा आलोचकों ने स्वीकार किया है । इस पाठ के स्वीकार कर लेने पर यह कठिनाई उपस्थित होती है कि भारत के अतीत में 'चन्द्रगुप्त' नामधारी तीन शासक हुये हैं—(१) मौर्य-साम्राज्य की स्थापना करने वाला 'चन्द्रगुप्त मौर्य' जो स्वयं ही नाटक का एक प्रमुख पात्र है । (२) मगध के गुप्त साम्राज्य की स्थापना से सम्बन्ध रखने वाला चन्द्रगुप्त प्रथम तथा (३) चन्द्रगुप्त