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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

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DevanagariSanskritpublished488 pages

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( २६ )

नाटक का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि समुद्रगुप्त के पश्चात् उनके पुत्र रामगुप्त सम्राट् बने थे। इस कायर राजा ने अपने समकालीन शक-नरेश के आक्रमण के भय से सन्धि के रूप में अपनी अति सुन्दर रानी ध्रुवदेवी को उसे दे देने का वचन दे दिया था। किन्तु उसके छोटे भाई कुमार चन्द्रगुप्त (सम्राट् चन्द्रगुप्त द्वितीय) ने रानी का वेश धारण कर एक अप्रत्याशित कूटनीतिक चाल द्वारा शक-नरेश को मार डाला। तदनन्तर चन्द्रगुप्त ने अपने बड़े भाई रामगुप्त को भी मारकर गुप्त-साम्राज्य को हथिया लिया तथा ध्रुवदेवी से, जो उनके अनुपम साहस के कारण उन पर अनुरक्त थी, विवाह कर लिया। इससे कुमार-गुप्त की उत्पत्ति हुई। यह संभव प्रतीत नहीं होता कि विशाखदत्त ने एक ऐसे नाटक की, कि जिसमें चन्द्रगुप्त ने अपने अग्रज रामगुप्त का हननकर उसकी रानी से विवाह कर लिया हो, रचना चन्द्रगुप्त अथवा कुमारगुप्त के शासनकाल में की हो। अतः 'देवीचन्द्रगुप्त' नामक नाटक की रचना राजा अवन्तिवर्मा के काल में ही विशाखदत्त द्वारा की गई होगी। इस भाँति उक्त आधार पर भी विशाखदत्त का समय छठी शताब्दी का उत्तरार्द्ध ही बनता है।

इस 'अवन्तिवर्मा' से सम्बन्धित मत में भी अनेक आपत्तियाँ उठाई जाती हैं जो निम्नलिखित हैं :--

(१) यदि विशाखदत्त द्वारा कन्नौज के महाराज 'अवन्तिवर्मा' की प्रशस्ति अपने नाटक "मुद्राराक्षस" के 'भरतवाक्य' के द्वारा की गई और स्थाण्वीश्वर के महाराज प्रभाकरवर्धन की यशोगाथा का गान महाकवि बाण द्वारा किया गया तो यह बड़े आश्चर्य की बात है। समसामयिक होते हुये भी दोनों (बाण तथा विशाखदत्त) एक दूसरे से अपरिचित क्यों रहे ? क्योंकि दोनों में से किसी ने भी एक दूसरे के बारे में अपनी कृतियों में संकेतमात्र तक नहीं किया है।

(२) राजा अवन्तिवर्मा समग्र भारत अथवा अधिकांश भारत का एकच्छत्र सम्राट् कभी नहीं रहा कि जिसका वर्णन मुद्राराक्षस के तृतीय अङ्क के उन्नीसवें (आशैलेन्द्रात्...इत्यादि) तथा चौबीसवें श्लोक में चाणक्य के कथनों में उपलब्ध होता है।

(३) इन्होंने ऐसा कोई उल्लेखनीय कार्य भी नहीं किया है कि जिसके