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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

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DevanagariSanskritpublished488 pages

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द्वितीय जिसे अपनी असीम शक्ति के कारण 'विक्रमादित्य' नामक उपाधि से अलङ्कृत किया गया था।

इन तीनो मे से प्रथम 'चन्द्रगुप्त मौर्य' तो हो नही सकता क्योकि नाटक की प्रस्तावना में इनके पितामह को सामन्त तथा पिता को महाराज शब्दों द्वारा कहा गया है। विशाखदत्त चन्द्रगुप्त मौर्य के न तो सामन्त ही थे न महाराज ही। यह बात नाटक के पढ़ने से स्वयं ही सिद्ध हो जाती है। दूसरी बात यह है कि नाटक के अन्दर लेखक का उसके प्रति केवल आदर का भाव ही व्यक्त नही हुआ है, घृणा की भी अभिव्यक्ति हुई है।

गुप्त सम्राट् चन्द्रगुप्त प्रथम भी विशाखदत्त के आश्रयदाता नही हो सकते क्योकि इतिहास मे ऐसा कहीं नही मिलता है कि इन्होने विदेशी म्लेच्छ आक्रमण-कारियो को पराजित किया हो।

अतः अब चन्द्रगुप्त द्वितीय ही शेष रह जाते है, जिनको विशाखदत्त का आश्रयदाता समझा जा सकता है। यह एक प्रतापी राजा था। इसका राज्य प्रायः समस्त भारत में फैला हुआ था। इसी ने शको को पराजित कर 'विक्रमादित्य' की उपाधि को प्राप्त किया था। इसी के द्वारा कुषाण के वंशजों तथा बाह्लीको और अन्य म्लेच्छों को दूर भगांकर पंजाब में इन लोगों से अधि-कृत प्रदेश को अपने अधिकार मे कर लिया गया था। इन्ही की राजधानी कुसुमपुर ( आधुनिक पटना ) थी जहाँ से सम्पूर्ण भारत का संचालन किया जाता था। विशाखदत्त ने अपने नाटक मुद्राराक्षस मे प्रकारान्तर से इसी चन्द्र-गुप्त द्वितीय का वर्णन किया है। यह चन्द्रगुप्त द्वितीय विष्णुभक्त भी था। अतः उसी को पृथ्वी का उद्धारक विष्णु का अवतार कहा जाना भी युक्तिसंगत प्रतीत होता है।

इस विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि विशाखदत्त के आश्रयदाता चन्द्रगुप्त द्वितीय ही रहे होगे। चन्द्रगुप्त द्वितीय का कार्य-काल ३७५ ई० से ४१३ ई० तक माना जाता है। अतः विशाखदत्त का स्थितिकाल चतुर्थ शताब्दी का उत्तरार्द्ध अथवा पंचम शताब्दी का पूर्वार्द्ध स्वीकार किया जा सकता है।

मुद्राराक्षस में चन्दनदास के शील एवं सौजन्य का जो चित्र उपस्थित किया