मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
by महाकवि विशाखदत्त
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ये दोनों बाते देखने को मिलती हैं। उद्भेद्यन्—प्रकट करता हुआ। यहाँ फल का प्राकट्य चौथे और पाँचवे अंक में वर्णित हुआ है। विमर्शम्—विवेक, विमर्शनमस्ति। वि $\sqrt{}$मृश् + घञ् भावे = विमर्श। 'यत्र मुख्यफलोपाय, उद्भिन्नो गर्भतोऽधिक । शापाद्यं सान्तरायञ्च स विमर्श इति स्मृत ॥' यहाँ हम इसको तीसरे अंक के २३वें श्लोक में देख सकते हैं। प्रसृतमपि कार्यजातम् पुन संहरन्—फैले हुए भी कार्य-समूह का उपसंहार करता हुआ। निर्वहणसन्धि में नाटकीय वस्तु का उपसंहार किया जाता है—'बीजवन्तो मुखाद्यर्था विप्रकीर्णा यथायथम्। ऐकार्थ्यमुपनीयन्ते यत्र निर्वहणं हि तत्॥' यहाँ चाणक्य के कार्य-समूह का उपसंहार सप्तम अंक के 'भृत्या भद्रभटादय'—इत्यादि श्लोक में देखा जा सकता है। नाटकानाम्—दृश्य काव्य या रूपक को नाटक कहते हैं। इसका लक्षण यह है—'नाटकं ख्यातवृत्तं स्यात् पञ्चसन्धिसमन्वितम्'। इमं क्लेशम्—इस (जागरण रूप) कष्ट का। यहाँ नाटककार ने राजनीतिक नाटक की रचना करने में होने वाले कष्ट को राक्षस के कथन के द्वारा व्यक्त किया है। जैसे राजनीतिक दाव-पेंच खेलने वाले को कभी-कभी रात-रात भर जागना पड़ जाता है उसी तरह इस नाटककार को भी प्राय जागना पड़ा है, ऐसा इस श्लोक से ध्वनित होता है। इस श्लोक में श्लेषालंकार और दीपकालंकार में अङ्गाङ्गि-भाव से सांकर्य है। इसमें वैदर्भी रीति है और स्रग्धरा छन्द है। इस छन्द का लक्षण १, १ में देखिए ॥३॥
तदपि नाम दुरात्मा चाणक्यवटु, —'
[ उपसृत्य ]
दौवारिक—जेदु जेदु—' ( जयतु जयतु—' )
राक्षस—'अभिमन्यातु शक्यं स्यात्।
दौवारिक—अमच्चो। ( अमात्य )।
राक्षस—[ वामाक्षिस्पन्दं सूचयित्वात्मगतम् ] 'दुरात्मा चाणक्यवटु-जयति, अभिमन्यातु शक्यं स्यादमात्य' इति वागीश्वरी वामाक्षिस्पन्दनेन प्रस्तावगता प्रतिपादयति। तथापि नोद्यमस्त्याज्यः। [ प्रकाशम् ] भद्र! किमसि वक्तुकामः?
दौवारिक—अमच्च! एसो क्खु करहओ पाडलिपुत्तादो आदो,