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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

Page 320 of 488

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Page 320

चतुर्थोऽङ्कः

२३५

रचयन्—प्रणयन् तस्य—कार्यस्य ( पक्षान्तरे ) बीजस्य, विस्तारं—प्रचयम्, इच्छन्—अभिलषन्, गर्भितानां—सञ्जातगर्भाणां फलप्रसवोन्मुखानामित्यर्थः ( पक्षान्तरे ) दृष्टनष्टानां, बीजानां—प्रसरतां प्रयोगानामित्यर्थः ( पक्षान्तरे ) फलप्रधानहेतूनामित्यर्थः, अतिगहनं—दुरनुमेयं, फलं—परिणतिम्, गूढं—गुप्तं यथा स्यात् तथा, उद्भेदयंश्च—प्रकटयंश्च, बुद्ध्या—मत्या, विमर्शं—कर्त्तव्याकर्त्तव्यविवेकं ( पक्षान्तरे ) अनुसन्धानं, कुर्वन्—विदधत्, प्रसृतमपि—विस्तृतमपि, कार्यजातं—कृत्यवर्गं ( पक्षान्तरे ) नाटकीयं वस्तु, पुनः—भूयः, संहरन्—संगृह्णंश्च ( पक्षान्तरे ) समापयन् अपि, नाटकानां—रूपकाणां, कर्ता वा—रचयिता च, अस्मद्विधो वा—मादृशश्च राजनीतिप्रयोक्ता जनः, इमं क्लेशं—प्रजागरदुःखम्, अनुभवति—भजते ॥३॥

हिन्दी अनुवाद—और भी—प्रारंभ मे थोड़े भी कार्य के उपाय को ( पक्षान्तर में—बीजन्यास को ) करता हुआ, उस ( कार्य, पक्षान्तर में—बीज ) का विस्तार चाहता हुआ, फलोन्मुख ( पक्षान्तर में—दृष्टनष्ट ) बीजों ( प्रयोगों, पक्षान्तर में—फल के प्रधान हेतुओं ) के अत्यंत गहन परिणाम को गुप्त रूप से प्रकट करता हुआ, बुद्धि से ( कर्तव्य और अकर्तव्य का ) विवेक ( पक्षान्तर में—अनुसन्धान ) करता हुआ और फैले हुए भी कार्य-समूह ( पक्षान्तर में—नाटकीय कथावस्तु ) को पुनः इकट्ठा ( पक्षान्तर में—समाप्त ) करता हुआ नाटककार और मेरे जैसा ( नीति-प्रयोग-कर्ता ) व्यक्ति इस ( जागरण-रूप ) क्लेश का अनुभव करते हैं ॥३॥

टिप्पणी—आदौ—प्रारंभ मे, मुख-सन्धि मे। 'यत्र बीजसमुत्पत्तिर्नानार्थरससम्भवा। प्रारम्भेण समायुक्ता तन्मुखं परिकीर्तितम्।' कार्योपक्षेपम्—शत्रुपराजय्यरूप साम आदि उपाय को। बीजन्यास को। उपक्षिप्यते प्रस्तूयते अनेन इति उप√क्षिप् + घञ् करणे = उपक्षेपः। कार्यस्य उपक्षेपः, तम्। 'काव्यार्थस्य समुत्पत्तिरुपक्षेप इति स्मृतः'। इस नाटक में चाणक्य के कार्योपक्षेप को प्रथम अंक में 'तन्मर्यापि तावत्' इत्यादि से किया गया है। तस्य विस्तारम्—कार्य, बीज के विस्तार को। बीज का लक्षण यह है—'स्तोकोद्दिष्टं कार्यहेतुर्वीजं विस्तार्यनेकधा'। गर्भितानाम्—फलोन्मुख, दृष्टनष्ट। गर्भः सञ्जातः एषाम् इति गर्भ + इतच् = गर्भितानि, तेषाम्। 'गर्भस्तु दृष्टनष्टस्य बीजस्यान्वेषणं मुहुः'। यहाँ चाणक्य का कार्योपक्षेप गर्भित है, राक्षस का नहीं। द्वितीय अंक में