Skip to content
SarvaKosh
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

Page 322 of 488

Read in context
Page 322

चतुर्थोऽङ्कः २३७

इच्छदि अमच्चं पेक्खिदु । (अमात्य ! एष खलु करभकः पाटलिपुत्रा- दागतः, इच्छति अमात्यं प्रेक्षितुम् ।)

**राक्षसः—**अवारित प्रवेशयैनम् ।

**दौवारिकः—**जं अमच्चो आणवेदि । [ इति निष्क्रम्य पुरुषमुपसृत्य ] भद्द ! एसो क्खु अमच्चो चिट्ठदि, ता उपसप्प णं । (यदमात्य आज्ञा- पयति । भद्र ! एष खलु अमात्यस्तिष्ठति, तदुपसर्प एनम् ।)

[ इति निष्क्रान्तो दौवारिकः । ]

**हिन्दी अनुवाद—**तो भी दुष्टात्मा वटुक चाणक्य,'—

[ पास जाकर ]

**द्वारपाल—**जय हो जय हो—'

**राक्षस—**प्रतारणा करने योग्य होता ।

**द्वारपाल—**अमात्य ।

राक्षस—[ बायीं आँख का फड़कना देखकर मन मे ] 'दुष्टात्मा वटुक चाणक्य विजयी हो, अमात्य प्रतारणा करने योग्य होता'—यह दैवी वाणी प्रकरण-प्राप्त होती हुई बायी आँख के फडकने के द्वारा सूचित कर रही है । तो भी उद्यम नहीं छोड़ना चाहिए । [ प्रकट ] भद्र ! क्या कहना चाहते हो ?

**द्वारपाल—**अमात्य ! यह करभक पाटलिपुत्र से आया है और आप से मिलना चाहता है ।

**राक्षस—**बिना रोक-टोक के उसे प्रविष्ट कराओ ।

**द्वारपाल—**जैसी अमात्य की आज्ञा । [ बाहर जाकर ( उस ) पुरुष के पास पहुँचकर ] भद्र ! ये अमात्य विराज रहे हैं, इसलिए उनके पास जाओ ।

[ द्वारपाल चला जाता है । ]

**टिप्पणी—तदपि—**यहाँ तात्पर्य यह है कि अमात्य के उस प्रकार क्ले- शानुभव करते रहने पर भी दुष्ट चाणक्य उद्यम नही छोड़ता है । **उपसृत्य—**समीप जाकर । यह तीसरा पताकास्थान है । साहित्यदर्पण में कहा गया है—

'अर्थोपक्षेपकं यत्तु लीनं सविनयं भवेत् । श्लिष्टप्रत्युत्तरोपेतं तृतीयमिदमुच्यते ।।'