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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

Page 264 of 488

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Page 264

तृतीयोऽङ्कः । १७७

व्याख्या—तथा—तेन प्रकारेण, कलुषितां—प्रावृषि पङ्काधिक्यात् निर्मलां (पक्षान्तरे भर्तुरनेकभार्यत्वेन दोषोत्वात्सेर्ष्यामित्यर्थः), तनूभवन्तीं—वर्षापगमेना-
तिक्षीणां (पक्षान्तरे प्रियवियोगेन कृशशरीराम्) सर्वात्मना—सर्वप्रकारेण, प्रसन्नां—स्वच्छसलिलां (पक्षान्तरे प्रसन्नहृदयां), गङ्गां—भागीरथीं (पक्षान्तरे रमणी), रतिकथाचतुरा—रतिकथायां सरसालापे चतुरा दक्षा, दूती इव—सञ्चारिकेव, शरत्, बहुवल्लभस्य—अनेकभार्यस्य, भर्तुः—स्वामिनः, मार्गे—तत्प्रापरार्थे, कथञ्चित्—क्लेशतः, अवतार्य—नीत्वा, सिन्धुपति—सागरं (पक्षान्तरे सिन्धुरिव पतिस्तं सिन्धुसदृशगाम्भीर्यशालिनं पतिमित्यर्थः), नयति—प्रापयति ॥६॥

हिन्दी अनुवाद—उस प्रकार से (वर्षा ऋतु के कीचड़ के कारण) गँदली (नायिका-पक्ष मे ईर्ष्यायुक्त), शरद् ऋतु में वर्षा के बीत जाने से अत्यन्त क्षीण (प्रवाह वाली) (नायिका-पक्ष में वियोग के कारण कृश) होती हुई तथा पूर्ण रूप से निर्मल (नायिका-पक्ष में प्रसन्न चित्त वाली) गङ्गा को प्रेम की कथाओं में दक्ष दूती के समान् शरद् ऋतु अनेक (नदी रूपी) पत्नियो वाले स्वामी (समुद्र) के मार्ग में किसी तरह उतारकर सागर (नायिका-पक्ष में सिन्धु सदृश गाम्भीर्यशाली पति) के पास ले जा रही है ॥६॥

टिप्पणी—तनूभवन्तीम्—अतनुः तनुः भवन्ती इति तनु+च्वि, दीर्घ √भू+शतृ स्त्रियाम् ङीप् । सिन्धुपतिम्—सिन्धूनां नदीना पतिः=समुद्रः । 'देशे नदविशेषेऽब्धौ सिन्धुर्ना सरिति स्त्रियाम्' इत्यमरः । अथवा सिन्धुरिव पतिः उपमित स० । अथवा सिन्धुनामा पतिः सिन्धुपतिः मध्यमपदलोपी स०, तम् । इस श्लोक मे भी ध्वन्यर्थ यह है कि चतुर दूती के समान अत्यंत गंभीर चाणक्य की नीति राक्षस की बुद्धि की वशीभूत होने के कारण कलुषित नन्दकुल की लक्ष्मी को समुद्र के समान अत्यन्त गंभीर हृदय वाले चन्द्रगुप्त के पास सब प्रकार से पहुँचा रही है। इस पद्य मे अर्थश्लेष से अनुप्रमाणित पूर्णोपमा अलंकार है और वसन्ततिलका छन्द है। इस छन्द का लक्षण १, ८ में देखिए ॥६॥

[समन्तान्नाट्येनावलोक्य] अये ! कथमप्रवृत्तकौमुदीमहोत्सवं कुसुमपुरम् ? आर्य ! वैहीनरे ! अथोस्मद्वचनादाघोषितः कुसुमपुरे कौमुदी-महोत्सवः ?

मु० रा०—१२