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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

Page 263 of 488

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Page 263

१७६ मुद्राराक्षसम्

के पक जाने पर नम्र बनाती हुई और मयूरों के विष के समान असह्य मद का अपहरण करती हुई शरद् ऋतु ने मानो सम्पूर्ण संसार को यह विनय सिखाया है॥ ८ ॥

टिप्पणी—उद्वृत्तानाम्—तट या मर्यादा को लाँघे हुए। उद्+√वृत्+क्त कर्तरि=उद्वृत्ता। उत्क्रान्ता वृत्तम् इति उद्वृत्ता 'अत्यादयः क्रान्ताद्यर्थे द्वितीया' इत्यनेन प्रादिसमासः। स्थितिपदम्—ठहरने का स्थान। स्थितेः पदम्। उपदिशन्त्या—उप+√दिश्+शतृ+ङीप्=उपदिशन्ती, तया। यह 'शरदा' का विधेयात्मक विशेषण है। यहाँ स्पष्टार्थ यह है कि वर्षा ऋतु में नदियों का जल तट को लाँघकर बहने लगता है, किन्तु शरद् ऋतु में वह अपने स्वाभाविक स्थान पर पहुँच जाता है, अतएव शरद् ऋतु मानो जल को विनीत होने का उपदेश देती हुई कह रही है कि अपनी मर्यादा को न छोड़ो। इसी तरह आगे साठी धान को झुकाती हुई और मयूरों का मद दूर करती हुई उन्हें भी मानो विनीत होने की शिक्षा दे रही है। यहाँ समासोक्ति अलंकार द्वारा तीन बातों की ओर संकेत किया गया है—( १ ) अत्यन्त उद्धत मलयकेतु के भावी निग्रह की ओर, ( २ ) राक्षस के विष के समान अत्यन्त उग्र पराक्रम और नीतिविषयक गर्व के दूर होने की ओर और ( ३ )-साम्राज्य-रूपी फल से युक्त परम उन्नतिशील चन्द्रगुप्त के विनय की ओर। इस श्लोक में पूर्णोपमा अलंकार, वाच्योत्प्रेक्षा अलंकार और काव्यलिंग अलंकार का योग है। इसमें वैदर्भी रीति है, प्रसादगुण है और शिखरिणी छन्द है॥ ८ ॥

अपि च—

भर्तुस्तथा कलुषिता बहुवल्लभस्य
मार्गे कथञ्चिदवतार्य तनूभवन्तीम् ।
सर्वात्मना रतिकथाचतुरैव दूती
गङ्गां शरन्नयति सिन्धुपतिं प्रसन्नाम् ॥९॥

अन्वय —तथा कलुषिता तनूभवन्ती सर्वात्मना प्रसन्ना गङ्गा रतिकथा-चतुरा दूती इव शरत् बहुवल्लभस्य भर्तुर्मार्गे कथञ्चित् अवतार्य सिन्धुपतिं नयति ॥९॥