मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
by महाकवि विशाखदत्त
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Read in context| द्वितीयोऽङ्कः | १०५ |
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इत्यनेन विग्रहवाक्ये नपुंसकत्वम् । ‘विस्मृता भक्तिः’ इति विग्रहे तु ‘विस्मृत-भक्तिना’ इति प्रयोगः स्यात् । इसका तात्पर्य यह है कि मैंने मलयकेतु का आश्रय लिया है, यह सही है किन्तु नन्द में मेरी दृढ भक्ति है। विषयव्यासङ्गमूढात्मना न—विषय-भोग की आसक्ति से मोहित आत्मा वाला होकर नही। स्वामि-भक्त होते हुए भी राक्षस ने विषयासक्ति के कारण मलयकेतु का आश्रय लिया है—ऐसी धारणा कोई न बना ले, एतदर्थ यह कहा गया है । प्राणप्रच्युतिभीरुणा न—प्राणों के विनाश से डरने वाला होकर नहीं । यदि तुम स्वामिभक्त हो और अनासक्त भी हो तो स्वामी के मर जाने पर तुम्हे उसका अनुसरण करना चाहिए न कि प्राणनाश से डरना चाहिए—इस आक्षेप का निवारण करने के लिए ऐसा कहा है । आत्मप्रतिष्ठाथिना न—अपनी प्रतिष्ठा की चाह करने वाला होकर नही । यदि ऐसी बात है तो तुम नीति से चाणक्य को जीतकर संसार में अपना यश फैलाने की कामना से मलयकेतु की सेवा कर रहे हो—इस भ्रान्त धारणा की निवृत्ति के लिए यह कहना पड़ा है । प्रतिष्ठा = गौरव । ‘प्रतिष्ठा गौरवे स्थितौ’ इति हैमः । प्रतितिष्ठति अनया इति प्रति √स्था + अङ् करणे । शात्रववधेन—शत्रु के नाश से । शत्रुः एव शात्रवः शत्रु + अण् स्वार्थे प्रज्ञादित्वात् । तस्य वधः, तेन । तब दूसरे का आश्रय लेने का तुम्हारा क्या प्रयोजन—इस प्रश्न का उत्तर इससे दिया है । स्यात्—अत्र शक्ति लिङ् । इस श्लोक में परिसंख्या अलंकार है । इसमें प्रसाद गुण है, पाञ्चाली रीति है और शार्दूलविक्रीडित छन्द है ॥५॥
[ आकाशमवलोकयन् सास्रम् ] भगवति कमलालये ! भृशमगुणज्ञासि । कुतः—
आनन्दहेतुमपि देवपमास्य नन्दं
सक्तासि किं कथय वैरिणि मौर्यपुत्रे ।
दानाम्बुराजिरिव गन्धगजस्य नाशे
तत्रैव किं न चपले प्रलयं गतासि ॥ ६ ॥
अन्वयः—चपले ! कथय आनन्दहेतुमपि देवं नन्दम् अपास्य वैरिणि मौर्यपुत्रे किं सक्तासि, गन्धगजस्य नाशे दानाम्बुराजिरिव तत्रैव किं न प्रलयं गतासि ॥ ६ ॥
व्याख्या—चपले—हे चञ्चले ! कथय—ब्रूहि, आनन्दहेतुमपि—सुखकारणमपि, देवं—महाराजं, नन्दम्, अपास्य—त्यक्त्वा, वैरिणि—शत्रौ, मौर्यपुत्रे—