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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

Page 199 of 488

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Page 199

१०४ मुद्राराक्षसम्

अथवा—

नेदं विस्मृतभक्तिना न विषयव्यासङ्गमूढात्मना
प्राणप्रच्युतिभीरुणा न च मया नात्मप्रतिष्ठार्थिना ।
अत्यर्थं परदास्यमेत्य निपुणं नीतौ मनो दीयते
देवः स्वर्गगतोऽपि शात्रववधेनाराधितः स्यादिति ॥५॥

अन्वय —मया परदास्यमेत्य अत्यर्थं निपुण नीतौ मनो दीयते, इद विस्मृत-भक्तिना न, विषयव्यासङ्गमूढात्मना न, प्राणप्रच्युतिभीरुणा न, आत्मप्रतिष्ठार्थिना न, स्वर्गगत अपि देव शात्रववधेन आराधित स्यात् इति ॥५॥

व्याख्या—मया—राक्षसेन, परदास्यम्—परम्य स्वेतरस्य मलयकेतोरित्यर्थः दास्य मेवाम्, एत्य—अङ्गीकृत्य, अत्यर्थम्—अतीव, निपुण—प्रयत्नेन, नीतौ—नीतिप्रयोगे, मन —चित्त, दीयते—व्याप्रियते, इद—नीतौ मनोदान, विस्मृत-भक्तिना—विस्मृत भक्ति स्वामिभक्ति नन्दानुराग इत्यर्थ येन तादृशेन सता, न—नहि, विषयव्यासङ्गमूढात्मना—विषयेषु भोगेषु यो व्यासङ्ग आसक्ति तेन मूढ अप आत्मा अन्त करण यस्य तादृशेन सता, न, प्राणप्रच्युतिभीरुणा—प्राणस्य जीवस्य प्रच्युति नाश ततो भीरुणा भययुक्तेन, न, आत्मप्रतिष्ठार्थिना—आत्मन निजस्य या प्रतिष्ठा ख्याति ता य अर्थयते कामयते तादृशेन सता, न, ( किन्तु ) स्वर्गगत अपि—लोकान्तरितोऽपि, देव —महाराज (नन्द ), शात्रववधेन—अरिविनाशेन, आराधित —सन्तोषिता , स्यात्—भवेत्, इति हेतो मनो दीयते इत्यर्थ ॥५॥

हिन्दी अनुवाद—अथवा—मैं दूसरे ( अर्थात् मलयकेतु ) की सेवा स्वीकार कर ( जो ) राजनीति में अत्यन्त प्रयत्नपूर्वक मनोयोग दे रहा हूँ, सो स्वामि—भक्ति को भुलाकर नहीं ( दे रहा हूँ ), सुख-भोग की आसक्ति से विवेकहीन अन्त करण वाला होकर नहीं ( दे रहा हूँ ), प्राण-नाश से डरकर नहीं ( दे रहा हूँ ) और अपनी प्रतिष्ठा की कामना से भी नहीं ( दे रहा हूँ ) किन्तु स्वर्ग चले जाने पर महाराज ( नन्द ) शत्रु के वध से सन्तुष्ट हों ( इसलिए दे रहा हूँ ) ॥५॥

टिप्पणी—विस्मृतभक्तिना न—जिसने भक्ति को भुला दिया हो ऐसा होकर नहीं। विस्मृत भक्ति येन स विस्मृतभक्ति बहुव्रीहि स०, ‘सामान्ये नपुंसकम्’