Skip to content
SarvaKosh
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

Page 201 of 488

Read in context
Page 201

१०६ | मुद्राराक्षसम्


मुरागर्भसम्भवे चन्द्रगुप्ते, किं रक्तासि—अनुरक्तासि ? गन्धगजस्य—गन्धालपहस्तिनः, नाशे—मरणे सति, दानाम्बुराजिः—दानाम्बुनः मदजलस्य राजिः रेखा, इव—तद्वत्, तत्रैव—नन्दे एव, किं—कथं, न—नहि, प्रलयम्—तिरोधानं, गतासि—प्राप्तासि ? ॥ ६ ॥

हिन्दी अनुवाद— [ आकाश की ओर देखता हुआ आँसुओं के साथ ] हे ऐश्वर्यशालिनी लक्ष्मी ! तुम गुणों को बिलकुल नहीं पहचानती हो । क्योकि—

अपने १ बताओ कि आनन्द के कारण ( होते हुए ) भी महाराज नन्द को छोड़कर शत्रु चन्द्रगुप्त में तुम कैसे आसक्त हो गईं । गन्धगज के मर जाने पर ( उसके ) मदजल की धारा के समान वहाँ ( नन्द में ) विलीन क्यों नहीं हो गई ?

टिप्पणी— साश्रम्— अस्रेण = नेत्रजलेन सह वर्तमानम् इति साश्रम् । यह क्रियाविशेषण है । भगवति— भगम् = ऐश्वर्यं विद्यते अस्या इति भग + मतुप् वत्व + ङीप् = भगवती । तत्सम्बोधने हे भगवति इति । कमलालये— कमलानि आलयः निवासस्थानम् अस्या इति कमला turn कमलालया = लक्ष्मी । तत्सम्बोधने हे कमलालये इति । अगुणज्ञा— गुणों को न जानने वाली । गुणान् जानाति इति गुण √ज्ञा + क कर्तरि = गुणज्ञा । न गुणज्ञा अगुणज्ञा नञ्त० । आनन्दहेतुम्— आनन्दस्य हेतुः षष्ठीतत्०, तम् । मौर्यपुत्रे— शूद्रा के पुत्र अर्थात् चन्द्रगुप्त । मुरायाः अपत्यम् इति मौर्यः मुरा + ण्य अपत्ये । स चासौ पुत्रश्च कर्मधारय स०, तस्मिन् । गन्धगज— श्रेष्ठ महाबली हाथी, जिसके कुंभ में मद भरता हो । इसका लक्षण यह है—

'यस्य गन्धं समाघ्राय न तिष्ठन्ति प्रतिद्विपिः ।
स वै गन्धगजो नाम नृपतेर्विजयावहः ॥'

गन्धप्रधानो गजः गन्धगजः मध्यमपदलोपी स० । दानाम्बुराजिरिव— मदजल की रेखा या धारा की तरह । यहाँ तात्पर्य यह है कि जैसे गन्धगज के मर जाने पर उसके साथ उसकी मदधारा मर जाया करती है वैसे ही महाराज नन्द के साथ तुम्हें भी मर मिटना चाहिए था न कि दुष्कुलीन पुरुष की आश्रिता होकर रहना चाहिए था । इस पद्य में उपमा अलंकार परिकर अलंकार से संसृष्ट है । इसमें वैदर्भी रीति है, प्रसाद गुण है और वसन्ततिलका छन्द है । इस छन्द का लक्षण १, ८ में देखिए ॥ ६ ॥