मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
by महाकवि विशाखदत्त
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नायक कहलाता है। नेता शब्द 'नी' धातु से बनता है, जिसका अर्थ ले चलना है। जो पात्र कथानक को फल की ओर ले चलता है उसी को 'नेता' कहते हैं। फल का भोक्ता अथवा प्राप्त करने वाला भी यही होता है।
नेता के चार प्रकार— नाट्यशास्त्र की दृष्टि से नेता चार प्रकार का माना गया है—(१) धीरललित, (२) धीरशान्त (३) धीरोदात्त (४) धीरोद्धत। भरतमुनि के अनुसार देवगण धीरोद्धत की श्रेणी में आते हैं। राजा धीरललित, सेनापति एव अमात्य धीरोदात्त तथा ब्राह्मण और वैश्य धीरशान्त श्रेणी के अन्तर्गत आते हैं :—
" देवा धीरोद्धता ज्ञेयाः स्युर्धीरललिता नृपाः ।
सेनापतिरमात्यश्च धीरोदात्तौ प्रकीर्तितौ ॥
धीरप्रशान्ता विज्ञेया ब्राह्मणा वणिजस्तथा ॥"॥ नाट्यशास्त्र २४,१८-१९॥
(१) धीरललित नेता का लक्षण— धीरललित नायक राज्य-सम्बन्धी तथा अन्य प्रकार की भी चिन्ताओं से मुक्त होता है क्योंकि उसके योगक्षेम की चिन्ता उसके मन्त्री आदि के द्वारा की जाती है। इसी कारण वह संगीत, नृत्य, चित्र आदि कलाओं का प्रेमी तथा सांसारिक भोग-विलासादि में निरन्तर संलग्न और रसिकवृत्ति का होता है। उसमे शृंगार रस की प्रधानता हुआ करती है। अतः वह सुकोमल स्वभाव एव आचरण से युक्त होता है। इस प्रकार के नायक प्रायः राजा ही हुआ करते हैं :—
"निश्चिन्तो धीरललितः कलासक्त सुखी मृदुः ॥" दशरूपक २।३ ॥
कालिदास द्वारा रचित 'मालविकाग्निमित्र' नामक नाटक का नायक अग्निमित्र इसी श्रेणी का नायक है।
(२) धीरशान्त नेता का लक्षण— विनय इत्यादि सामान्य गुणों से युक्त ब्राह्मण, वैश्य अथवा मन्त्रिपुत्र आदि धीरशान्त नेता कहे जाते हैं। (भवभूति के 'मालतीमाधव' नामक रूपक का नायक 'माधव' इसी कोटि का नायक है) :—
"सामान्यगुणयुक्तस्तु धीरशान्तो द्विजादिकः ॥" दशरूपक २।४ ॥