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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

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DevanagariSanskritpublished488 pages

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(३) **धीरोदात्त नेता का लक्षण—**यह नायक अतिशय शक्ति-सम्पन्न हुआ करता है । उसका अन्तःकरण क्रोध, शोक आदि विकारों में अभिभूत नहीं होता है । वह अत्यन्त गम्भीर, सहनशील, अविकत्थन (आत्मप्रशंसक न होना) स्थिरचित्त (चंचलता रहित मन वाला), स्वाभिमानी होने पर भी विनम्रता द्वारा दबे हुये अभिमान वाला, दृढ़व्रत (अर्थात् जिस बात को करने का प्रण कर लेता है उसे अन्त तक निभाने वाला) होता है । नाटक का नायक इसी प्रकृति का होना आवश्यक है —

"महासत्त्वोऽतिगम्भीर क्षमावानविकत्थन ।
स्थिरो निगूढहंकारो धीरोदात्तो दृढव्रत ॥" दशरूपक २।४-५ ॥

'अभिज्ञान शाकुन्तल' नामक नाटक का नायक 'दुष्यन्त' इसी श्रेणी के अन्तर्गत आता है ।

(४) **धीरोद्धत नेता का लक्षण—**यह नायक घमण्डी, ईर्ष्यालु, माया (अर्थात् मन्त्रबल से असत्य वस्तुओं को प्रस्त करना) और कपट में परिपूर्ण, अभिमानी, चंचल मन वाला, क्रोधी तथा आत्मप्रशंसक होता है । उसे अपने शौर्य आदि का अभिमान होता है । उसका मन अस्थिर हुआ करता है । इसके अतिरिक्त वह स्वयं ही अपनी डींग मारने वाला होता है —

"दर्पमात्सर्यभूयिष्ठो मायाछद्मपरायण ।
धीरोद्धतस्त्वहं कारी चलश्चण्डो विकत्थन ॥" दशरूपक २।५-६ ॥

परशुराम तथा भीमसेन को इसी श्रेणी का नायक कहा जा सकता है ।

इन चारों प्रकार के नायकों में से 'धीरोदात्त' नायक को ही संस्कृत नाटककारों ने सर्वाधिक स्थान प्रदान किया है (क्योंकि समाज के लिए यही आदर्श होने योग्य है) । यत्र-तत्र धीरशान्त अथवा धीरललित नायक भी दृष्टिगोचर होते हैं, किन्तु धीरोद्धत नायक का प्रयोग तो संस्कृत नाटककारों ने प्रायः प्रतिनायक के रूप में ही किया है ।

नायिका

नाटक इत्यादि रूपकों में नायिका का भी उतना ही महत्त्व है जितना नायक