मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
by महाकवि विशाखदत्त
Page 13 of 488
Read in context( ८ )
सन्धियों का सृजन हुआ करता है। ये हैं—(१) मुख सन्धि, (२) प्रतिमुख सन्धि, (३) गर्भ सन्धि, (४) अवमर्श अथवा विमर्श सन्धि तथा (५) निर्वहण (उपसंहार) सन्धि।
(१) मुख सन्धि—बीज तथा आरम्भ को मिलाने वाली सन्धि का नाम ही मुख सन्धि है। इसमें रगो की कल्पना होती है।
(२) प्रतिमुख सन्धि—विन्दु तथा यत्न को मिलाने वाली सन्धि का नाम प्रतिमुख सन्धि है। इसमे मुख सन्धि मे अंकुरित बीज कभी लक्षित होता है और कभी अलक्षित।
(३) गर्भ सन्धि—जिस सन्धि मे उपाय कभी दब जाय और उसकी खोज करने के लिये बीज का और भी विकास हो, उसे गर्भ सन्धि कहते हैं। इसमे प्राप्त्याशा तथा पताका का योग होता है। इसमे पताका की सर्वत्र आवश्यकता नहीं पड़ा करती है। कही पर वह विद्यमान रहती है और कही पर नहीं। किन्तु प्राप्त्याशा का तो होना निश्चित है। इसमे फल अन्तर्निहित रहा करता है। इसी कारण इसका नाम गर्भ सन्धि है।
(४) विमर्श सन्धि—जहाँ पर फल का उपाय तो पहुचने की अपेक्षा अधिक विकसित होता है किंतु विघ्नो के उपस्थित हो जाने से उसमे आघात पहुँचा करता है वहाँ विमर्श सन्धि हुआ करती है। इसमे फल-प्राप्ति की पर्यालोचना की जाती है। इसमे नियताप्ति तथा प्रकरी का योग होता है। किन्तु प्रकरी की स्थिति वैकल्पिक रहा करती है।
(५) निर्वहण सन्धि—जहाँ कार्य और फलागम मिलते हैं अर्थात् प्रयोजन की पूर्ण सिद्धि हो जाती है वहाँ निर्वहण सन्धि होती है।
सन्धियो के उपर्युक्त विवेचन द्वारा स्पष्ट हो जाता है कि मुख से कार्य का प्रारम्भ होता है, प्रतिमुख मे वह वृद्धि को प्राप्त करता है, गर्भ में वह उत्कर्ष को प्राप्त करता है, विमर्श में फल की ओर झुकता है तथा निर्वहण मे वह पूर्ण सिद्धि को प्राप्त कर लेता है।
नेता (नायक)
सभी प्रकार के काव्यों में जो प्रधान पात्र होता है वही नेता अथवा