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मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी

Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished804 pages

Page 68 of 804

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१६ मीमांसादर्शनम् [ सू०
आचार्य शङ्कर और वाचस्पति के अनुसार इस सूत्र का तात्पर्य
आचार्य शङ्कर ने भी इस सूत्र को पूर्व पक्ष के रूप में उपस्थापित कर "तत्तु
समन्वयात्" (ब्र० सू० १-१-४) इस सूत्र में सिद्धान्त का प्रदर्शन किया है। कर्म
मीमांसकों ने शङ्का की है कि शास्त्र प्रमाण के द्वारा ब्रह्म का प्रतिपादन होता है,
किन्तु, यह किसी भी तरह सङ्गत नहीं है, क्योंकि, शास्त्र के द्वारा ब्रह्म का प्रतिपादन
नहीं हो सकता है, कारण, महर्षि जैमिनि ने कहा है कि वेद कर्तव्य कर्मों का ही
प्रतिपादन करता है, वेद के जिन अंशों से किसी भी तरह कर्तव्य कर्म का प्रतिपादन
नहीं हो रहा है, वे अंश निरर्थक हैं अर्थात् उन अंशों का प्रयोजन = सार्थक्य सिद्ध
नहीं किया जा सकता है, वेद के वे अंश अप्रामाणिक हैं। इन सूत्रों के द्वारा आचार्य
जैमिनि ने यही सिद्ध किया है कि समग्र वेदशास्त्र किसी रूप में कर्तव्य कर्मों का ही
प्रतिपादन करते हैं, कर्तव्य कर्मों का प्रतिपादन करना ही वेद का स्वभाव है।
वेदान्त शास्त्र अर्थात् उपनिषद् हम लोगों के लिए किसी कर्तव्य कर्म का उपदेश
नहीं करती है, अतः, उपनिषद् की कोई सार्थकता नहीं है, ये निरर्थक हैं। इसलिए,
उपनिषद् के प्रामाण्य पर अवगत ब्रह्मतत्त्व भी निरर्थक हैं। फलतः, "अथातो
ब्रह्मजिज्ञासा" (ब्र० सू० १।१।१) आदि सिद्ध ब्रह्मतत्त्व के प्रतिपादन के लिए
निरर्थक है।
महर्षि जैमिनि वेद के उपनिषद् भाग को सर्वथा निरर्थक नहीं मान सकते हैं,
क्योंकि मीमांसा दर्शन के "अथातो धर्मजिज्ञासा" (जै० सू० १।१।१) इस प्रथम सूत्र
के आधार पर समग्र वेद का अध्ययन प्रतिपादित कर वेदार्थज्ञान उसका फल सिद्ध
किया है। "स्वाध्यायोऽध्येतव्यः" (तै० आ० २।१५।१) (वेद का अध्ययन अवश्य
करना चाहिए) इस वेदवचन के द्वारा समग्र वेद का अध्ययन ही विहित है, उपनिषद्
भाग से अतिरिक्त वेद भाग का ही अध्ययन करना चाहिए, कर्मकाण्ड ही सार्थक है,
उपनिषद् भाग या ज्ञानकाण्ड क्रियार्थक नहीं है, इसमें क्रिया या कर्तव्य का प्रतिपादन
नहीं है, अतः निरर्थक या निष्प्रयोजन है—यह प्रतिपादन नहीं है; वेद के अध्ययन से
वेदार्थ का ज्ञान होता है, यही यदि 'स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' इस वाक्य का अर्थ जैमिनि
को अभिमत है, तो उपनिषद् अंश परित्याग कर वेद का अध्ययन करना चाहिए—
यह अर्थ किस प्रकार अवगत होगा ?
आशय यह है कि ब्रह्मसूत्र के तृतीय सूत्र "शास्त्रयोनित्वात्" (१।१।३) की
व्याख्या के अनुसार इतना ही सिद्ध होता है कि शास्त्र ब्रह्म में प्रमाण है = शास्त्र-
प्रमाण ब्रह्म है। ब्रह्म के शास्त्रप्रमाणकत्व की प्रतिज्ञामात्र इस वचन से की गई है,
किन्तु, शास्त्रप्रमाणकत्व के लिए किसी हेतु का प्रदर्शन नहीं किया है। शब्द को
ब्रह्म विषय में ज्ञापक मानने पर शब्द का प्रामाण्य ही नहीं हो सकता है, कारण,
फलवत् अर्थ का प्रतिपादक होने पर ही शब्द का प्रामाण्य रहता है। 'ब्रह्म' सिद्ध