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मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी

Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished804 pages

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१ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः १५
भाग ही साक्षात् सम्बन्ध से पुरुषार्थ के उपायों का निर्देश करता है, अतः क्रिया
प्रतिपादन करनेवाले वेद के अंशों का ही प्रामाण्य सिद्ध होता है। उपक्रम, उपसंहार
और अभ्यास भी क्रियाप्रतिपादक वेद अंशों का प्रामाण्य सिद्ध करता है। "चोदना-
लक्षणोऽर्थे धर्मः" इससे उपक्रम कर "तस्य ज्ञानमुपदेशः" इस मध्यस्थ वचन से इसी
अर्थ का अभ्यास किया है और "तद्भूतानां क्रियार्थेन समाम्नायः" इस वाक्य से
उपसंहार किया है, अतः वेद के विधि अंश का ही प्रामाण्य अवगत होता है। वेद के
जिन अंशों से क्रिया का प्रतिपादन नहीं है, वे अंश अनर्थक हैं, उनके प्रामाण्य मानने
का कोई भी उचित तर्क या हेतु नहीं है।
"आम्नायस्य" = आम्नाय (वेद) के "क्रियार्थत्वात्" विधि और निषेध रूप
क्रिया के प्रतिपादन साधन होने से "अतदर्थानाम्" अतदर्थ अर्थात् क्रिया प्रतिपादन का
साधन न होने से "आनर्थक्यम्" वे अंश निष्प्रयोजन हैं, "तस्मात्" इसलिए आनर्थ-
क्यम् वे अंश निष्प्रयोजन हैं अर्थात् पौरुषेय वाक्यों के समान ही वे वेदवाक्य निष्प्र-
योजन हैं "उच्यते" (यह) कहा गया है, क्योंकि, क्रियात्मक यागादिरूप धर्म का
प्रतिपादन करना ही वेद का प्रयोजन है, इसलिए, वेद जिन अंशों से क्रिया का
प्रतिपादन नहीं कर रहा है, उन वेदांशो को अनर्थक अर्थात् प्रयोजनशून्य मानना पड़ेगा
और इसी कारण से वे वेदांश अनित्य अर्थात् पौरुषेय वाक्यों के समान अप्रामाणिक हैं।
मन्त्र, नामधेय और अर्थवाद में अर्थवाद की आलोचना में प्रथमाध्याय का
प्रथमपाद परिसमाप्त हो जाता है एवं अर्थवाद वाक्यों की विधिजन्य प्रवृत्ति के विषय
में विशेष रूप से अपेक्षा होने से इस पाद में उसी का विचार आवश्यक है। सोऽरो-
दीत् तद्रजतस्य रजतत्वम्" (तै० सं० १।५।१) वे रोएँ थे इसलिए वही रजत का
रजतत्व है। "प्रजापतिरात्मनोवपामुदखिदत्" (तै० सं० २।१।१) प्रजापति ने अपनी
वपा को (अपने हृदय से) बाहर किया। "देवा वै देवयजनमध्यवसाय दिशो न
प्रजानन्" (तै० सं० ६।१।५) देवताओं ने देवयजन (देवपूजा, यज्ञ) का आरम्भ कर
दिशा के निर्णय में समर्थ नहीं हुए, इत्यादि वेदवाक्य किसी प्रकार से क्रिया के
प्रतिपादक नहीं हैं, अतः, इनको अनर्थक अर्थात् अप्रमाण मानना होगा। क्योंकि,
इन वाक्यों का—रुद्र ने रोदन किया है, अतः, तुम लोग भी रोदन करो अथवा
प्रजापति ने अपनी वपा अर्थात् हृदय का भेदन किया था। अतः, संसार के सभी
वही करें। देवों का यज्ञ का अनुष्ठान करते हुए दिङ्मोह हो गया था, अतः संसार में
भी वैसा होना उचित है—इत्यादि अर्थ नहीं हो सकते हैं। अतः, इस तरह के वाक्य
अनित्य हैं। यद्यपि वेद अनादि हैं, वेदान्तर्गत सभी वाक्यों की स्वरूपतः अनित्यता
नहीं हो सकती है तथापि ये वेद-वाक्य नित्य या सर्वकालीन धर्म और अधर्म के
तत्त्वों का ज्ञापन नहीं करते हैं, अतः, ये पुरुषार्थ के साधन नहीं है, इसलिए लौकिक
काव्यविद् के समान इन वाक्यों का प्रामाण्य नहीं है।