मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी
Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)
Page 69 of 804
Read in context१ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः १७
वस्तु है, इस सिद्ध वस्तु का बोधक वाक्य सर्वत्र फलवत् अर्थ का ही बोधक होगा—
यह कोई आवश्यक नहीं है, कारण, कभी वह फलवत् अर्थ का बोधक हो सकता है
और किसी स्थल में नहीं भी हो सकता है। जैसे—'नदी के तट पर फल हैं' यह
शब्द सुनकर जो व्यक्ति फल का संग्रह करता है उसके लिए यह वाक्य फलवत् होगा
और प्रमाण भी होगा, किन्तु, जो व्यक्ति उसका संग्रह नहीं करना चाहता है उसके
लिए यह शब्द अर्थबोधक होने पर भी फलवत् नहीं होने से प्रमाण नहीं होगा।
इसलिए सिद्ध वस्तु ब्रह्मबोधक वाक्य अर्थबोधक होने पर भी फलवत् नहीं हो सकते
हैं, अतः, अप्रमाण भी हो सकते हैं। यह भी कहा जा सकता है कि रूपादिविहीन
सिद्धवस्तु ब्रह्म के बोधक वाक्य से अवगत ब्रह्म यदि अन्य प्रमाण से गम्य होगा तो
वेदान्तशास्त्रप्रमाणक ब्रह्म नहीं हो सकता है। यदि वह ब्रह्म अन्य प्रमाण से गम्य
नहीं होता है तभी वह वेदान्त प्रमाण गम्य हो सकता है। यह सिद्ध ब्रह्म अन्य प्रमाण
से वेद्य है या नहीं—यह जब तक निर्णीत नहीं हो जाता है, तब तक सिद्ध ब्रह्मबोधक
वाक्य प्रमाण है या नहीं यह संशय उपस्थित रहेगा।
इसी प्रसङ्ग में आचार्य शङ्कर ने शङ्का की कि ब्रह्म शास्त्रप्रमाणगम्य कैसे हो
सकता है, क्योंकि वेद क्रिया अर्थ का ही बोधक है और अन्य अर्थ बोधक वेद वाक्य
का अप्रामाण्य ही सिद्ध होता है। अतः, वेद ब्रह्म के प्रति प्रमाण कैसे हो सकता है ?
फलतः ब्रह्म शास्त्रप्रमाणगम्य कैसे हो सकता है ?
आचार्य वाचस्पति ने कहा है—जो शुद्ध-बुद्ध अर्थात् ज्ञानस्वरूप उदासीन स्वभाव
अर्थात् निष्क्रिय है, वह उपेक्षणीय होता है, ब्रह्म भी ऐसा ही है, अतः, वह भी उपेक्ष-
णीय है। यदि सिद्धवस्तु ब्रह्म वेदान्त से प्रतिपाद्य है तो वेदान्त किसी पुरुषार्थ का
उपदेशक नहीं रहेगा। कारण, पुरुषार्थ से आशय है सुख साधन या दुःखनिवृत्ति
साधन कर्म, किन्तु, वेदान्त ऐसे किसी पुरुषार्थ का उपदेश नहीं करता है, अतः,
वेदान्त का क्या प्रयोजन है अर्थात् निष्प्रयोजन ही है। ब्रह्म सिद्धवस्तु है, अतः, प्रत्यक्ष
आदि भी उसमें प्रमाण हो सकता है, अर्थात् प्रत्यक्ष आदि प्रमाण के द्वारा भी उसके
स्वरूप की अवगति हो सकती है। ऐसी स्थिति में प्रत्यक्ष आदि प्रमाण से अवगत
विषय में जैसे लौकिकवाक्य प्रमाण नहीं होता है, अपि तु, वह उसका अनुवादक ही
होता है, फलतः, .वह अप्रमाण ही होगा, इस स्थिति में ब्रह्म प्रतिपादक शास्त्र भी
अप्रमाण क्यों नहीं होंगे ? शास्त्र के द्वारा प्रतिपादित ब्रह्म सिद्ध वस्तु है, अतः, वह
प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से ही गम्य वस्तु होगा। इसलिए सिद्धवस्तु का प्रमाण शास्त्र है
यह कथन सङ्गत नहीं है। लौकिक वाक्य अन्य प्रमाणों से अवगत विषय का बोधक
होने पर वह स्वतः प्रमाण नहीं होता है—यह सभी मानते हैं। वेदान्त की भी यही
२