मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी
Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)
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Read in context१४ मीमांसादर्शनम् [ सू०
व्याख्यानान्तरमाह—अथ वेति। एतच्च विभवार्थम्, न निर्द्धारण इति षष्ठीसमास-
निषेधात्सम्बन्धमात्रषष्ठ्यां च मध्यशब्दानुपपत्तेः। कर्मधारयेऽप्येकदेशशब्दस्योपसर्ज-
नत्वेन पूर्वनिपातापातादवयववाचित्वेन च कतिपयार्थत्वाभावात्। नन्वित्यादिवृत्ति-
कारान्तराभिप्रायविवरणार्थं भाष्यम्। तस्योत्तरं—नैवेत्यादि। तस्यार्थः न तावत्सर्वो
विध्युद्देशोऽर्थवादापेक्षः, शुद्धस्यापि वसन्ताय कपिञ्जलानालभत इत्यादेर्दर्शनात्कश्चिदेव तु
वायव्यं श्वेतमालभेतेत्यादिस्तदपेक्षः, तस्यापि विधिविधेयसम्बन्धरूपावान्तरवाक्यार्थे-
ऽर्थवादपदनिरपेक्षस्य स्तुतिस्तुत्यसम्बन्धात्मके महावाक्यार्थरूपेऽर्थान्तर एव तदपेक्षा।
ततश्चैकदेशाक्षेपरूप एव तेषामाक्षेपः। अर्थवादाप्रामाण्येन महावाक्यार्थाविवक्षायामप्य-
वान्तरवाक्यार्थविवक्षा दुर्निवारेति भावः ! तत्र कश्चिदिति काक्वा सूचितमर्थं दर्शयति—
तत्रेति। भाष्यार्थं व्याचष्टे—यान्यपीति। विधिप्रत्ययशून्येषु तर्हि—समस्ताक्षेपः स्यादित्या-
शङ्क्य सिद्धसाध्यतामाह--यानि त्विति।
यद्वा ऽनेनावृत्त्या खण्डशो भाष्यं व्याख्यायते-कश्चित्पदसमूहो नैव भवति नाप्रमाणत्वेन
शङ्क्यो भवतीत्यर्थः। कश्चित्वर्थवादपदैः संयुज्यार्थान्तरे वर्त्तते, तत्र तान्यर्थवादपदानि
केवलान्याक्षिप्यन्ते। पुनस्तानीत्यादि शुद्धार्थवादविषयत्वेनैव व्याख्यातम्। यानि केवला-
न्यर्थवादपदानि तच्छब्दान्निर्दिष्टानि, तानि समस्तान्याक्षिप्यन्त इति ॥ १ ॥
भावप्रकाशिका
वेद में इष्ट फल के साधन के रूप में उपदिष्ट क्रिया ही धर्म है। अर्थात् वेदविहित
याग, दान, होम आदि क्रिया ही धर्मं है, कारण इसी के द्वारा पुरुष अभिलषित श्रेय
का लाभ कर सकता है।
प्रथम पाद में इष्ट-फल-साधन वेद-विधि का प्रामाण्य प्रतिष्ठापित होने पर समग्र
वेद का प्रामाण्य सूचित होता है। प्रथमाध्याय के द्वितीय पाद में केवल विधिवोधक
वेदवाक्य का ही प्रामाण्य है, समग्र वेदवाक्य का नहीं—इस आशय से पूर्वपक्षी के
मत का उत्थापन करते हुए महर्षि जैमिनि ने छः सूत्रों से पूर्वपक्ष का प्रतिपादन किया
है। अनन्तर सिद्धान्ती ने “विधिना त्वेकवाक्यत्वात्” इत्यादि बारहसूत्रों से पूर्वोक्त
पूर्वपक्ष का परिहार और सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है।
पूर्वपक्षी ने “अथातो धर्मजिज्ञासा” इस सूत्र के द्वारा वेदार्थरूप धर्म का विचार
करना कर्तव्य है—यह कहा है। इस सूत्र के विषयीभूत “स्वाध्यायोऽध्येतव्यः”
इस वेदवाक्य से अवगत होता है कि सम्पूर्ण वेद में पुरुषार्थ की प्राप्ति का साधन सूचित
किया गया है। धर्म और अधर्म का स्वरूप अवगत कर अधर्म का परित्याग-पूर्वक
धर्म का अनुष्ठान करने पर पुरुषार्थ की प्राप्ति हो सकती है। इसलिए विधि एवं निषेध
ही पुरुषार्थ का साधन है, अतः विधि और निषेध क्रियास्वरूप है, अतः वेद के जिस
अंश से क्रिया का प्रतिपादन नहीं है उन वेदांशों को अप्रामाणिक ही मानना उचित है।
विधि, मन्त्र, नामधेय और अर्थवाद इन चार भागों में वेद विभक्त है। वेद का विधि