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मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी

Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished804 pages

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मुञ्च्लृ धातु से निष्पन्न है या अवातातार्थक निर्वाण ये सापेक्ष शब्द है । किसका त्याग एवं
किससे निर्वाण ? इस जिज्ञासा में पूर्व प्रकृत से ही मोक्ष या निर्वाण यह सहज अवगत होता
है । ऐसी स्थिति में खण्ड सत्य के आधार पर शरीर एवं तत्सम्बद्ध वस्तु को ही सत्य
मान कर निकृष्ट स्वार्थ से उठकर सम्पूर्ण विश्व को भगवद्रूप या आत्म रूप मानकर मन
वाणी और कर्म को समन्वित रूप में सकल जनहित की प्रवृत्ति की भूमि की प्रशस्ति के
अनुरूप ज्ञानधारा का प्रवाह ही खण्ड सत्य का त्याग ही मुक्ति है । इस कर्म से अनादि काल
सञ्चित पापपङ्क का प्रक्षालन पूर्वक चित्त का नैर्मल्य सम्पादित होता है, और विश्व
कल्याण कामना रूपी निष्काम भाव से शास्त्रीय कर्म का यथाविधि अनुष्ठान सम्भव होता
है; जिससे ब्रह्माद्वैत ज्ञान सम्भव होता है । चित्तविशुद्ध के लिए सर्वज्ञात्म मुनि ने कहा है-
एक ही से अदृष्टविविधविहितानेककर्मानुभावध्वस्तस्वान्तोपरोधाः कथमपि पुरुषाश्चिद्वि-
दृक्षां लभन्ते ॥ (संक्षेप० १।६४) इसी लिए तैत्तिरीयोपनिषद् में धर्म से पाप नष्ट होता है
'धर्मेण पापमपनुदति' (तैत्तिरीयारण्यक १०।६३।६) अनाशक यज्ञ दान तप से चित्त
की विशुद्धि होती है तब सार्वभौम अखण्ड दीप्तिरूप तेज की अभिव्यक्ति होती है ।
'विविदिषन्त यज्ञेन दानेन तपसा अनाशकेन' (बृ० उ० ।४।२२) ।
यदि धर्म उपासना का सार्वभौम अखण्ड सत्यज्ञान की प्राप्ति में उपयोग न होता तो
वर्णाश्रम व्यवस्था एवं मन्दिर आदि की सुव्यवस्था, बदरिकाश्रम आदि में देवोपासना
तथा स्वयं श्रीसाधना में लोक की प्रवृत्ति के लिए मठों की स्थापना की आवश्यकता
नहीं होती, वरन् शङ्कराचार्य की स्थिति कर्ममार्ग के लोप, धर्म के ध्वंस, वर्णाश्रम धर्म
के उच्छेद या विपर्यय के साधन के लिए ही माननी पड़ती, किन्तु उनके आचार एवं कर्म
मार्ग के प्रवर्तन वर्णाश्रम धर्म की प्रतिष्ठा से यही सिद्ध होता है कि सकल लोक के उपकार
के लिए इसी धर्म की जागृति चाहिए । 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' (१।१।१) सूत्र के भाष्य में
अधिकारी के लिए शास्त्रीय कर्मकलापों का श्रद्धाभक्तिपूर्वक अनुष्ठान की आवश्यकता
को अनिवार्य माना है । देहात्म बुद्धि एवं तत्प्रयुक्त कर्म जिस प्रकार प्रमाण के रूप में
कल्पित है, वैसे ही आत्मनिश्चय या आत्मसाक्षात्कार जब तक नहीं होता है, तब तक
लौकिक पदार्थ प्रामाणिक, ग्राह्य एवं व्यवहारणीय है ।
देहात्मप्रत्ययो यद्वत् प्रमाणत्वेन कल्पितः ।
लौकिकं तद्वदेवेदं प्रमाणं त्वात्मनिश्चयात् ॥
विहित कर्मों के अनुष्ठान के बिना आध्यात्मिक उत्कर्ष सम्भव ही नहीं है । कर्म की
सार्थकता होने से पूर्वमीमांसा ज्ञान अनिवार्य रूप से अपेक्षित है ।
मीमांसा में तीन प्रस्थान प्रसिद्ध है—प्रभाकर, कुमारिल और मुरारि मिश्र । इनमें
प्रभाकर ने जिस मीमांसा सिद्धान्त का समर्थन किया है, वह अतिशय प्राचीन है । इस
सिद्धान्त की प्राचीनता प्रभाकर मिश्र की प्राचीनता की साधक नहीं है । यह भी सत्य है
कि प्रभाकर ने कर्म प्रतिपादक वेद भाग की ही मीमांसा की है, किन्तु ज्ञान काण्ड की