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मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी

Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished804 pages

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का सम्पादक संस्कार विशेष कर्तव्य के रूप में उपदिष्ट है। इस श्रुतिवचन में जो सोलह
मनुष्यों की दीक्षा के विषय में उपदिष्ट किया है वे ही ऋत्विक् हैं। ये सोलह व्यक्ति
निम्नलिखित हैं—अध्वर्यु, प्रतिप्रस्थाता, नेष्टा, उन्नेता-ये चार अध्वर्यु हैं, ये यजुर्वेद
में कथित कर्मों का सम्पादन करते हैं। ब्रह्मा, ब्राह्मणाच्छंसी, अग्नीत् और पोता हैं।
उद्गाता, प्रस्तोता, प्रतिहर्त्ता और सुब्रह्मण्य ये चार उद्गाता है, ये चार सामवेद में
कथित सामगान आदि करते हैं। होता, मैत्रावरुण, अच्छावाक और ग्रावस्तुत ये
चार होता हैं, ये ऋग्वेद में कथित कर्म ऋङ् मन्त्र का पाठ करते हुए देवताओं का
आह्वान आदि करते हैं। इनमें चार अध्वर्यु, ब्रह्मा होता और उद्गाता ये प्रधान होते हैं
अतिरिक्त तीन इनके सहकारी होते हैं। यजुर्वेद में प्रधान रूप से ऋत्विजों के कर्म-
कलाप एवं उनके पाठ्य मन्त्र कहे गये हैं, ऋग्वेद में होता के विषय के मन्त्र एवं
क्रियाकलाप, सामवेद में उद्गाता विषयक मन्त्र, स्तोत्र एवं कर्मकलाप एवं अथर्ववेद में
ब्रह्मा नाम से प्रसिद्ध ऋत्विजों का मन्त्र और कर्मकलाप एवं उसके साथ शान्तिक
पौष्टिक आदि क्रियाओं का तथा मन्त्रराशि पठित हैं। इसलिए चार वेदों के यथाक्रम में
अध्वर्युवेद, होतृवेद, उद्गातृवेद एवं ब्रह्मवेद भी कहा जाता है। इनमें ब्राह्मणांश में
कर्म की विधि एवं मन्त्रांश में विहित कर्म का अर्थ या क्रम अथवा द्रव्यदेवता आदि के
स्वरूप प्रकाशित होते हैं, वे ही मन्त्र वहाँ पढ़े गये हैं। ब्राह्मणांश में प्रधान रूप से विधि
एवं साधारणतः उपनिषद् होने से मीमांसा एवं वेदान्तदर्शन में ब्राह्मणांश की ही
सर्वाधिक आवश्यकता होती है। यह ब्राह्मणांश यदि वेद नहीं रहता तो मीमांसा को
'वेदार्थविचार' एवं वेदान्त को 'श्रुतिशिर:' कथन व्याहतार्थक होगा।
अनेक विद्याओं से समन्वित यह वेद वृक्ष की सुशीतल छाया में तापदग्ध जीव
शान्ति लाभ करते हैं, इसका अर्थ विचार ही मीमांसा है, कर्म और ज्ञानरूप भेद की
दृष्टि से ही मीमांसा और उत्तरमीमांसा या कर्ममीमांसा और ज्ञानमीमांसा के रूप में
परवर्ती काल में दो भेद किया गया है। यह सत्य है कि उपासना काण्ड जो श्रद्धा और
आवेग पर प्रतिष्ठित है, उसने ज्ञानकाण्ड और कर्मकाण्ड के मध्य अपना अस्तित्व समाप्त
कर दिया है, किन्तु वैदिककाल की ओर दृष्टिपात करने पर उपासना में ही कर्म और
ज्ञान अपनी भेद भूमि को समाप्त कर उसके अङ्ग के रूप में अवस्थित थे। यह उपासना
गृही संन्यासी एवं किसी वर्ण विशेष से आबद्ध न थी। इतना सत्य है कि कर्म और
ज्ञान तीन वर्णों के साथ एवं आश्रम की दृष्टि से भिन्न थे। परम कल्याणमयी श्रुति
उषती जननी के समान धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चतुर्विध पुरुषार्थ स्वरूप स्तन्य धारा
के पान कराने में सतत उद्यत थी। पूर्व कर्म की बाध्यता के अनुसार सबके लिए सब
सुलभ न था, किन्तु इस जन्म के अधिकृत कर्मों के आचरण से भावी जन्म के सुधार
का मार्ग प्रशस्त था। इनमें तीन तो सर्वथा पूर्वमीमांसा ज्ञान सापेक्ष था और इसी
से अन्तःकरण की विशुद्धि से मोक्ष मार्ग भी प्रशस्त था। किन्तु यह मोक्ष जो मोचनार्थक