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मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी

Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished804 pages

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भी प्रासङ्गिक व्याख्या प्रस्तुत की है । इनके मत में कर्मकाण्ड की मीमांसा भिन्न रूप की
नहीं है । जैमिनि के सूत्रों से वेद के उभय मत की व्याख्या होती है । उनके द्वारा प्रणीत
बृहती ग्रन्थ में भी निष्प्रपञ्च आत्मस्वरूप को माना है, किन्तु निष्प्रपञ्च आत्मस्वरूप का
परिज्ञान कर्म मीमांसा में अपेक्षित न होने से इस विषय की विशेष आलोचना नहीं की
है, किन्तु कर्मकाण्ड का परिपन्थी इसे नहीं माना है । इस प्रसङ्ग में प्रभाकर मिश्र का
जो गुरु नाम से प्रख्यात है। शाबरभाष्य की व्याख्या बृहती में लिखा है—अहं (मैं)
यह कहने पर आत्मा का कर्तृत्व और स्वामित्व रूप में ज्ञान होने पर मम (मेरा) यह
कहने पर आत्मा किसी पदार्थ का स्वामी है—यह अवगत होता है—इसी के आधार पर
आत्मा का कर्तृत्व और भोक्तृत्व सिद्ध होता है । आत्मा के कर्तृत्व और भोक्तृत्व के
आधार पर ही वेद के कर्मकाण्ड का विचार प्रस्तुत होता है । अहं बुद्धि और मम बुद्धि
अर्थात् अहङ्कार और ममकार यदि अनात्मा में आत्माभिमान मात्र माना जाय तो
आत्मा का कर्तृत्व और भोक्तृत्व सिद्ध नहीं हो सकता है । कर्तृत्व और भोक्तृत्व की
सिद्धि के बिना कर्मकाण्ड और पूर्वमीमांसा का विचार व्यर्थ होगा । किन्तु अध्यात्म
शास्त्र में आत्मा को अकर्ता और अभोक्ता ही माना है— यह आशङ्का कर, उत्तर दिया
है, अहङ्कार और ममकार अनात्मा में आत्माभिमान है, यह मैं जानता हूँ, किन्तु, यह
वैराग्य सम्पन्न व्यक्तियों के लिए कहा है—वे ही इसके अधिकारी हैं, किन्तु, जो कर्म-
तत्पर हैं, उनके लिए यह विषय नहीं है । भगवान् द्वैपायन ने भी कहा है कर्मसङ्गी
अज्ञों के लिए यह बुद्धि भेद नहीं देना चाहिए, वेदान्ताधिकारी के लिए अर्थात् वेद-
रहस्यवेत्ता ही इसके अधिकारी हैं । यही कारण है कि शबर स्वामी ने उस आत्मस्वरूप
का विवेचन नहीं किया है¹ ।
शालिकनाथ ने भी पञ्चिका टीका में इसी रूप में विवेचन किया है । 'येषां
काषायो रागः, मृदितः तेषामेवैतत्कथयन्ति' (पृ० १।१।५) छान्दोग्योपनिषद् में भी कहा
है—भगवान् सनत्कुमार ने मृदितकषाय नारद को अज्ञान के परे वस्तु का प्रदर्शन
किया था । 'तस्मै मृदितकषायाय तमसः पारं दर्शयति सनत्कुमारः' सिद्धान्तबिन्दु की
टीका न्यायरत्नावली में गौडब्रह्मानन्द ने भी स्पष्ट किया है कि भट्टपाद और प्रभाकर
वेदान्तदर्शन के विरोधी नहीं है । 'प्रभाकरभट्टयोस्तु वेदान्तदर्शने विद्वेषाभावः...........
आत्मा निष्प्रपञ्चब्रह्मैव । तथापि कर्मप्रसङ्गे न तथा वाच्यम्, उक्तं हि कृष्णेन न बुद्धिभेदं
जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् (न्यार० पृ० ३५४) ।
१. यदुक्तं अहङ्कारममकारावनात्मन्यात्माभिमानौ इति मृदितकषायाणामेवैतत् कथनीयम,
न कर्मसङ्गिनामभ्युपरम्यते, आहु च भगवान् द्वैपायनः न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां
कर्मसङ्गिनाम् इति रहस्याधिकारे । तस्मान्न विवृतमत्र भाष्यकारेण भगवता वचनानु-
रोधात्, नाज्ञानादिति । (मीमांसासूत्रभाष्यटीका बृहती १।१।५) ।