मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)
Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I
by पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार)
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नटी—(हर्ष के साथ) ऐसी बात है ! (तो) आर्यसभिकों का प्रसाद
मिल गया।
सूत्रधार—हाँ, मिल गया।
नटी—यदि ऐसा है तो तुमको अच्छा वृत्तान्त सुनाने का पारितोषिक
क्या दूं ?
सूत्रधार—पारितोषिक की पुनरावृत्ति न करो। देखो—
तुम्हारे, फूटे हुए रोमाञ्च से युक्त कपोल वाले, प्रकट हुए किरणों
से युक्त मन्दहास वाले, तिरछी भौंहों वाले, दुष्प्राप्य मुख को प्राप्त करके
और फिर क्या माँगना है ॥२॥
नटी—तो अब आप कौन सा नाटक प्रदर्शित करेंगे ?
सूत्रधार—अभी तुमने ही तो कहा कि मत्तविलास प्रहसन।
नटी—इस विषय में भी मेरा क्रोध पक्षपाती है, जिससे (मैं) अभि-
प्रायवश कहने के लिए विवश की गई हूँ। आर्य ! फिर वह कौन सा कवि
है जो इस कृति के द्वारा प्रसिद्ध किया जा रहा है।
सूत्रधार—आर्ये ! सुनिए ! पल्लववंशरूपी पृथ्वीमण्डल के कुलपर्वत,
सब प्रकार की नीति से सम्पूर्ण सामन्तों के समूह को जीतने वाले, इन्द्र के
तुल्य पराक्रमरूपी सम्पत्ति वाले, विशाल सम्पत्ति के अनुरूप दान के उत्कर्ष
से कुबेर को भी तिरस्कृत करने वाले, श्रीसिंहविष्णुवर्मा के पुत्र श्री महेन्द्र-
विक्रमवर्मा नाम के राजा हैं, जो षड्वर्गरूपी (अन्तः) शत्रुओं को नियंत्रित
करने वाले, पञ्चमहाभूतों के समान केवल परोपकार में लगे हुए हैं।
और भी,
विवेक, उदारता, सहानुभूति, मर्यादा, स्थैर्य (संतोष), दीप्ति, (शिल्प,
ललित) कला, समृद्धि, सत्य, पराक्रम, निष्कपटता, नम्रता-आदि ये गुण
कलियुग में (कोई अन्य) स्थान न पाकर एक साथ जिस एक (राजा) की
शरण में उसी प्रकार चले गए, जैसे प्रलय के अन्त में समस्त सृष्टियाँ संसार
के आदि (विराजमान) आदिपुरुष की (शरण में चली जाती हैं ) ॥३॥
और,