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सर्वकोश
मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I

पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा

DevanagariHindipublished100 पृष्ठ

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पृष्ठ 13

भूमिका
संस्कृत काव्य
संस्कृत साहित्य के प्रायः सभी आलंकारिकों ने काव्य के स्वरूप के
विषय में अपने-अपने विचार व्यक्त किए हैं। भामह, रुद्रट, वामन, विद्यानाथ
आदि आचार्य शब्दार्थयुगल को काव्य मानते हुए शब्द और अर्थ दोनों पर
समान बल देते हैं। इन आचार्यों की काव्य-परिभाषाएँ इस प्रकार हैं—
'शब्दार्थौ सहितौ काव्यम्।' —भामह
'शब्दार्थौ काव्यम्।' —रुद्रट
'काव्यशब्दोऽयं गुणालंकारसंस्कृतयोः शब्दार्थयोर्वर्तते।' —वामन
गुणालंकारसहितौ शब्दार्थौ दोषवर्जितौ (काव्यम्) —विद्यानाथ
जयदेव ने 'चन्द्रालोक' में काव्य-परिभाषा में दोष, लक्षण, रीति, गुण,
अलंकार, रस, वृत्ति—इन सभी का समावेश किया है—
निर्दोषा लक्षणवती सरीतिर्गुणभूषणा ।
सालंकाररसानेकवृत्तिर्वाक् काव्यनामभाक् ॥ (१.७)
आनन्दवर्धनाचार्य शब्द और अर्थ दोनों पर बल देते हैं परन्तु
'काव्यस्यात्मा ध्वनिः' कहकर ध्वनि (व्यंग्य) को काव्य की आत्मा
मानते हैं।
पण्डितराज जगन्नाथ के अनुसार रमणीय अर्थ का प्रतिपादन कराने
वाला शब्द ही काव्य है—
'रमणीयार्थप्रतिपादकः शब्दः काव्यम्।'
दण्डी ने अपने काव्य अथवा काव्य-शरीर की परिभाषा में स्पष्टतः
अर्थ की अपेक्षा शब्द पर अधिक बल दिया है क्योंकि उनके अनुसार शब्द-
समूह काव्य या काव्य-शरीर है। अर्थ की इष्टता उस शब्द-समूह के
काव्यत्व की शर्त मात्र है—
'शरीरं तावदिष्टार्थव्यवच्छिन्ना पदावली।'
विश्वनाथ कविराज रसात्मक वाक्य को ही काव्य मानते हैं—
'वाक्यं रसात्मकं काव्यम्।'