मत्स्य महापुराण

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६६८ * मत्स्यपुराण *
| तस्मिन् विनिहते दैत्ये त्रिदशानां महोत्सवे।<br>नाभूत्कश्चित्तदा दुःखी नरकेष्वपि पापकृत्॥ २७<br>स्तुवन्तः षण्मुखं देवाः क्रीडन्तश्चाङ्गनायुताः।<br>जग्मुः स्वानेव भवनान् भूरिधामान उत्सुकाः ॥ २८<br>ददुश्चापि वरं सर्वे देवाः स्कन्दमुखं प्रति।<br>तुष्टाः सम्प्राप्तसर्वेच्छाः सह सिद्धैस्तपोधनैः ॥ २९ | इस प्रकार उस दैत्यके मारे जानेपर देवताओंके उस महोत्सवके अवसरपर नरकोंमें भी कोई पापकर्मा प्राणी दुःखी नहीं था। परम तेजस्वी देवगण षडाननकी स्तुति करके अपनी-अपनी स्त्रियोंसहित क्रीडा करते हुए उत्सुकतापूर्वक अपने-अपने गृहोंको चले गये। सभी इच्छाओंकी पूर्ति हो जानेके कारण सभी देवता परम संतुष्ट थे। वे जाते समय तपोधन सिद्धोंके साथ स्कन्दको वर देते हुए बोले ॥ २७-२९॥ |
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| देवा ऊचुः<br>यः पठेत् स्कन्दसम्बद्धां कथां मर्त्यो महामतिः।<br>शृणुयाच्छावयेद्वापि स भवेत् कीर्तिमान्नरः ॥ ३०<br>बह्वायुः सुभगः श्रीमान् कान्तिमाञ्छुभदर्शनः।<br>भूतेभ्यो निर्भयश्चापि सर्वदुःखविवर्जितः ॥ ३१<br>संध्यामुपास्य यः पूर्वा स्कन्दस्य चरितं पठेत्।<br>स मुक्तः किल्बिषैः सर्वैर्महाधनपतिर्भवेत् ॥ ३२<br>बालानां व्याधिजुष्टानां राजद्वारं च सेवताम्।<br>इदं तत्परमं दिव्यं सर्वदा सर्वकामदम्।<br>तनुक्षये च सायुज्यं षण्मुखस्य व्रजेन्नरः॥ ३३ | देवताओंने कहा—जो महाबुद्धिमान् मरणधर्मा मनुष्य स्कन्दसे सम्बन्ध रखनेवाली इस कथाको पढ़ेगा, सुनेगा अथवा दूसरेको सुनायेगा, वह कीर्तिमान्, दीर्घायु, सौभाग्यशाली, श्रीसम्पन्न, कान्तिमान्, शुभदर्शन, सभी प्राणियोंसे निर्भय और सम्पूर्ण दुःखोंसे रहित हो जायगा। जो मनुष्य प्रातःकालिक संध्याकी उपासना करनेके बाद स्कन्दके चरित्रका पाठ करेगा वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर महान् धनराशिका स्वामी होगा। यह परम दिव्य स्कन्द-चरित बालकों, रोगियों और राजद्वारपर सेवा करनेवाले पुरुषोंके लिये सर्वदा सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। इसका पाठ करनेवाला मनुष्य शरीरान्त होनेपर षडाननकी सायुज्यताको प्राप्त हो जायगा ॥ ३०-३३॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे तारकवधो नाम षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १६०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें तारकवध नामक एक सौ साठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १६०॥
एक सौ एकसठवाँ अध्याय
हिरण्यकशिपुकी तपस्या, ब्रह्माद्वारा उसे वरप्राप्ति, हिरण्यकशिपुका अत्याचार, विष्णुद्वारा देवताओंको अभयदान, भगवान् विष्णुका नृसिंहरूप धारण करके हिरण्यकशिपुकी विचित्र सभामें प्रवेश
| ऋषय ऊचुः<br>इदानीं श्रोतुमिच्छामो हिरण्यकशिपोर्वधम्।<br>नरसिंहस्य माहात्म्यं तथा पापविनाशनम्॥ १ | ऋषियोंने पूछा—सूतजी ! अब हमलोग दानवराज हिरण्यकशिपुका वध तथा भगवान् नरसिंहके पापविनाशक माहात्म्यको सुनना चाहते हैं (आप उसे हमें सुनाइये) ॥ १॥ |
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| सूत उवाच<br>पुरा कृतयुगे विप्रा हिरण्यकशिपुः प्रभुः।<br>दैत्यानामादिपुरुषश्चकार स महत्तपः ॥ २<br>दश वर्षसहस्राणि दश वर्षशतानि च।<br>जलवासी समभवत् स्नानमौनधृतव्रतः ॥ ३ | सूतजी कहते हैं—विप्रवरो ! पूर्वकालमें कृतयुगमें दैत्योंके आदि पुरुष सामर्थ्यशाली हिरण्यकशिपुने महान् तप किया। उसने स्नान और मौनका व्रत धारण करके ग्यारह हजार वर्षोंतक जलमें निवास किया। |