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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 679 of 1098

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Page 679
* अध्याय १६१ *६६९

| ततः शमदमाभ्यां च ब्रह्मचर्येण चैव हि।<br>ब्रह्मा प्रीतोऽभवत्तस्य तपसा नियमेन च॥ ४<br>ततः स्वयम्भूभगवान् स्वयमागम्य तत्र ह।<br>विमानेनार्कवर्णेन हंसयुक्तेन भास्वता॥ ५<br>आदित्यैर्वसुभिः साध्यैर्मरुद्भिर्दैवतैस्तथा।<br>रुद्रैर्विश्वैस्सहायैश्च यक्षराक्षसपन्नगैः॥ ६<br>दिग्भिश्चैव विदग्भिश्च नदीभिः सागरैस्तथा।<br>नक्षत्रैश्च मुहूर्तैश्च खेचरैश्च महाग्रहैः॥ ७<br>देवैर्ब्रह्मर्षिभिः सार्धं सिद्धैः सप्तर्षिभिस्तथा।<br>राजर्षिभिः पुण्यकृद्भिर्गन्धर्वाप्सरसां गणैः॥ ८<br>चराचरगुरुः श्रीमान् वृतः सर्वैर्दिवौकसैः।<br>ब्रह्मा ब्रह्मविदां श्रेष्ठो दैत्यं वचनमब्रवीत्॥ ९<br>प्रीतोऽस्मि तव भक्तस्य तपसानेन सुव्रत।<br>वरं वरय भद्रं ते यथेष्टं काममाप्नुहि॥ १० | तब उसके मनःसंयम, इन्द्रियनिग्रह, ब्रह्मचर्य, तपस्या और नियमपालनसे ब्रह्मा प्रसन्न हो गये। तत्पश्चात् स्वयं भगवान् ब्रह्मा सूर्यके समान तेजस्वी एवं चमकीले विमानपर, जिसमें हंस जुते हुए थे, सवार होकर आदित्यों, वसुओं, साध्यों, मरुद्गणों, देवताओं, रुद्रों, विश्वेदेवों, यक्षों, राक्षसों, नागों, दिशाओं, विदिशाओं, नदियों, सागरों, नक्षत्रों, मुहूर्तों, आकाशचारी महान् ग्रहों, देवगणों, ब्रह्मर्षियों, सिद्धों, सप्तर्षियों, पुण्यकर्मा राजर्षियों, गन्धर्वों और अप्सराओंके गणोंके साथ वहाँ आये। तदुपरान्त सम्पूर्ण देवताओंसे घिरे हुए ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ चराचरगुरु श्रीमान् ब्रह्मा उस दैत्यसे इस प्रकार बोले—'सुव्रत! तुम-जैसे भक्तकी इस तपस्यासे मैं प्रसन्न हूँ। तुम्हारा कल्याण हो। अब तुम यथेष्ट वर माँग लो और अपना मनोरथ सिद्ध करो'॥ २—१०॥ |
| हिरण्यकशिपुरुवाच | हिरण्यकशिपु बोला— |
| न देवासुरगन्धर्वा न यक्षोरगराक्षसाः।<br>न मानुषाः पिशाचा वा हन्युर्मां देवसत्तम॥ ११<br>ऋषयो वा न मां शापैः शपेयुः प्रपितामह।<br>यदि मे भगवान् प्रीतो वर एष वृतो मया॥ १२<br>न चास्त्रेण न शस्त्रेण गिरिणा पादपेन च।<br>न शुष्केण न चार्द्रेण न दिवा न निशाथ वा॥ १३<br>भवेयमहमेवार्कः सोमो वायुर्हुताशनः।<br>सलिलं चान्तरिक्षं च नक्षत्राणि दिशो दश॥ १४<br>अहं क्रोधश्च कामश्च वरुणो वासवो यमः।<br>धनदश्च धनाध्यक्षो यक्षः किंपुरुषाधिपः॥ १५ | देवसत्तम! देवता, असुर गन्धर्व, यक्ष, नाग, राक्षस, मनुष्य अथवा पिशाच—ये कोई भी मुझे न मार सकें। प्रपितामह! ऋषिगण अपने शापोंद्वारा मुझे अभिशप्त न कर सकें। न अस्त्रसे, न शस्त्रसे, न पर्वतसे, न वृक्षसे, न शुष्क पदार्थसे, न गीले पदार्थसे, न दिनमें, न रातमें—अर्थात् कभी भी अथवा किसीसे भी मेरी मृत्यु न हो। मैं ही सूर्य, चन्द्रमा, वायु, अग्नि, जल, आकाश, नक्षत्र, दसों दिशाएँ, क्रोध, काम, वरुण, इन्द्र, यम, धनाध्यक्ष कुबेर और किम्पुरुषोंका अधीश्वर यक्ष हो जाऊँ। यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मैं यही वर माँग रहा हूँ॥ ११—१५॥ |
| ब्रह्मोवाच | ब्रह्माने कहा— |
| एते दिव्या परास्तात मया दत्तास्तवाद्भुताः।<br>सर्वान्कामान्सदा वत्स प्राप्स्यसे त्वं न संशयः॥ १६<br>एवमुक्त्वा स भगवाञ्जगामाकाश एव हि।<br>वैराजं ब्रह्मसदनं ब्रह्मर्षिगणसेवितम्॥ १७<br>ततो देवाश्च नागाश्च गन्धर्वा ऋषिभिः सह।<br>वरप्रदानं श्रुत्वैव पितामहमुपस्थिताः॥ १८ | तात! मैंने तुम्हें इन दिव्य एवं अद्भुत वरदानोंको प्रदान कर दिया। वत्स! तुम सदा सभी मनोरथोंको प्राप्त करते रहोगे, इसमें संशय नहीं है। ऐसा कहकर भगवान् ब्रह्मा आकाशमार्गसे ब्रह्मर्षियोंद्वारा सेवित अपने वैराज नामक निवासस्थानको चले गये। तदनन्तर ऋषियोंसहित देवता, नाग और गन्धर्व इस प्रकारके वरप्रदानकी बात सुनते ही पितामहके पास पहुँचे (और बोले) ॥ १६—१८॥ |