Skip to content
SarvaKosh
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 677 of 1098

Read in context
Page 677
* अध्याय १६० *६६७

| कुपितं तु यमालोक्य कालनेमिपुरोगमाः।<br>सर्वे दैत्येश्वरा जघ्नुः कुमारं रणदारुणम्॥ १३<br>स तैः प्रहारैरस्पृष्टो वृथाक्लेशो महाद्युतिः।<br>रणशौण्डास्तु दैत्येन्द्राः पुनः प्रासैः शिलीमुखैः॥ १४<br>कुमारं सामरं जघ्नुर्बलिनो देवकण्टकाः।<br>कुमारस्य व्यथा नाभूद् दैत्यास्त्रनिहतस्य तु॥ १५<br>प्राणान्तकरणो जातो देवानां दानवाहवः।<br>देवान्निपीडितान् दृष्ट्वा कुमारः कोपमाविशत्॥ १६<br>ततोऽस्त्रैर्वारयामास दानवानामनीकिनीम्।<br>ततस्तन्निष्प्रतीकारैस्ताडिताः सुरकण्टकाः॥ १७<br>कालनेमिमुखाः सर्वे रणादासन् पराङ्मुखाः। | तदनन्तर रणमें भीषण कार्य करनेवाले उन कुमारको क्रुद्ध देखकर कालनेमि आदि सभी दैत्येश्वर उनपर प्रहार करने लगे, परंतु उन प्रहारोंका परम कान्तिमान् कुमारपर कुछ भी प्रभाव न पड़ा। उनका शस्त्रास्त्र छोड़नेका श्रम व्यर्थ हो गया। पुनः युद्धनिपुण, देवकण्टक महाबली दैत्येन्द्र देवताओंसहित कुमारपर भाले और बाणोंसे प्रहार करने लगे। इस प्रकार दैत्यास्त्रोंद्वारा प्रहार करनेपर भी कुमारको कुछ भी पीड़ा न हुई। पर दानवोंका वह युद्ध जब देवताओंके लिये प्राणघातक-सा दीखने लगा, तब देवताओंको अत्यन्त पीड़ित देख कुमार क्रुद्ध हो उठे। फिर तो उन्होंने अपने अस्त्रोंके प्रहारसे दानवोंकी सेनाको खदेड़ दिया। उन अनिवार्य अस्त्रोंकी चोटसे कालनेमि आदि सभी देवकण्टक दानव घायल हो गये, तब वे युद्धसे विमुख हो भाग खड़े हुए॥९—१७ १/२॥ |
| विद्रुतेष्वथ दैत्येषु हतेषु च समंततः॥ १८<br>ततः क्रुद्धो महादैत्यस्तारकोऽसुरनायकः।<br>जग्राह च गदां दिव्यां हेमजालपरिष्कृताम्॥ १९<br>जघ्ने कुमारं गदया निष्प्रभकनकाङ्गदः।<br>शरैर्मयूरं चित्रैश्च चकार विमुखान् सुरान्॥ २०<br>तथा परैर्महाभल्लैर्मयूरं गुहवाहनम्।<br>विभेद तारकः क्रुद्धः स सैन्येऽसुरनायकः॥ २१<br>दृष्ट्वा पराङ्मुखान् देवान् मुक्तरक्तं स्ववाहनम्।<br>जग्राह शक्तिं विमलां रणे कनकभूषणाम्॥ २२<br>बाहुना हेमकेयूररुचिरेण षडाननः।<br>ततो जवान्महासेनस्तारकं दानवाधिपम्॥ २३<br>तिष्ठ तिष्ठ सुदुर्बुद्धे जीवलोकं विलोकय।<br>हतोऽस्यद्य मया शक्त्या स्मर शस्त्रं सुशिक्षितम्॥ २४<br>इत्युक्त्वा च ततः शक्तिं मुमोच दितिजं प्रति।<br>सा कुमारभुजोत्सृष्टा तत्केयूररवानुगा।<br>बिभेद दैत्यहृदयं वज्रशैलेन्द्रकर्कशम्॥ २५<br>गतासुः स पपातोर्व्यां प्रलये भूधरो यथा।<br>विकीर्णमुकुटोष्णीषो विस्रस्ताखिलभूषणः॥ २६ | तदनन्तर चारों ओर दैत्योंके इस प्रकार मारे जाने एवं पलायन कर जानेपर असुरनायक महादैत्य तारक क्रोधमें भर गया। तब तपाये हुए स्वर्णके बने हुए बाजूबंदको धारण करनेवाले उस दैत्यने स्वर्णसमूहसे विभूषित अपनी दिव्य गदा हाथमें ली और उस गदासे कुमारपर प्रहार किया। फिर मोर-पंखसे सुशोभित बाणोंके आघातसे देवताओंको युद्ध-विमुख कर दिया। तदुपरान्त क्रोधसे भरे हुए असुरनायक तारकने उस सेनामें दूसरे भल्ल नामक विशाल बाणोंसे गुहके वाहन मयूरको विदीर्ण कर दिया। इस प्रकार रणभूमिमें देवताओंको युद्धविमुख और अपने वाहन मयूरको खून उगलते देखकर षडाननने वेगपूर्वक अपने स्वर्णनिर्मित केयूरसे विभूषित हाथमें स्वर्णजटित निर्मल शक्ति ग्रहण की। तत्पश्चात् देव-सेनानायक कुमार दानवेश्वर तारकको ललकारते हुए बोले—'सुदुर्बुद्धे! खड़ा रह, खड़ा रह और जीवलोककी ओर दृष्टिपात कर ले। अपने भलीभाँति सीखे हुए शस्त्रका स्मरण कर ले। अब तू मेरी शक्तिद्वारा मारा जा चुका।' ऐसा कहकर उन्होंने उस दैत्यपर अपनी शक्ति छोड़ दी। कुमारके हाथसे छूटी हुई उस शक्तिने उनके केयूरके शब्दका अनुगमन करती हुई आगे बढ़कर उस दैत्यके हृदयको, जो वज्र और पर्वतके समान अत्यन्त कठोर था, विदीर्ण कर दिया। फिर तो वह प्राणरहित हो भूतलपर उसी प्रकार गिर पड़ा, जैसे प्रलयकालमें पर्वत धराशायी हो जाते हैं। उसकी पगड़ी और मुकुट छिन्न-भिन्न हो गये और सारे आभूषण पृथ्वीपर बिखर गये॥१८—२६॥ |