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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 628 of 1098

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Page 628

६१८ * मत्स्यपुराण *


काम उवाचकामदेवने कहा— जगन्नाथ! क्या आप यह नहीं जानते कि मुनियों और दानवोंको भयभीत करनेवाली इस देवसामग्रीसे देवाधिदेव शङ्करको वशमें कर लेना सहज नहीं है। उन महादेवकी इन्द्रियाँ विकाररहित हैं, इसका भी ज्ञान तो आपको है ही। साथ ही महापुरुषोंकी प्रसन्नता और क्रोध भी महान् होता है। इस समय आप जो सम्पूर्ण उपभोगोंकी सारभूता स्वर्गमें उत्पन्न होनेवाली सुन्दरी अप्सराओं तथा बिना चेष्टा किये ही प्राप्त होनेवाले सुखदायक पदार्थोंका उपभोग कर रहे हैं, वह शङ्करजीके प्रति प्रमाद करनेसे नष्ट हो जायगा। थोड़ा इसपर भी विचार कर लीजिये; क्योंकि सामान्य प्राणियोंको भी कार्यफलकी सम्भावना पहलेसे ही दीखने लगती है। इन्द्रदेव! जो लोग सामान्यको छोड़कर विशेषकी आकाङ्क्षा करते हैं, उनका सामान्यसे पतन हो जाना ही फल है। (विशेष तो अप्राप्त है ही।) कामदेवके इस कथनको सुनकर देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रने उससे कहा—॥ २१३—२१७॥
अनया देवसामग्र्या मुनिदानवभीमया।<br>दुःसाध्यः शङ्करो देवः किं न वेत्सि जगत्प्रभो ॥ २१३
तस्य देवस्य वेत्थ त्वं करणं तु यदव्ययम्।<br>प्रायः प्रसादः कोपोऽपि सर्वो हि महतां महान् ॥ २१४
सर्वोपभोगसारा हि सुन्दर्यः स्वर्गसम्भवाः।<br>अध्याश्रितं च यत्सौख्यं भवता नष्टचेष्टितम् ॥ २१५
प्रमादादथ विभ्रंश्येदीदृशं प्रतिविचिन्त्यताम्।<br>प्रागेव चेह दृश्यन्ते भूतानां कार्यसम्भवाः ॥ २१६
विशेषं काङ्क्षतां शक्र सामान्याद् भ्रंशनं फलम्।<br>श्रुत्वैतद्वचनं शक्रस्तमुवाचामरैर्वृतः ॥ २१७
शक्र उवाचइन्द्र बोले— रतिवल्लभ! तुम्हारे इस कथनके लिये हमलोग प्रमाण हैं। तुम्हारे कथनमें कोई संदेह नहीं है, किंतु (निर्मित वस्तुके) आकार-प्रकारके बिना लोहार अथवा कारीगरकी शक्तिका पता नहीं चलता तथा किसीकी भी शक्ति किसी विशेष विषयमें ही सफलरूपसे देखी जाती है, सर्वत्र नहीं। इन्द्रद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर रतिसहित कामदेव सहायकरूपमें अपने मित्र मधुमास (अथवा वसन्त)-को साथ लेकर प्रस्थित हुआ और शीघ्र ही हिमाचलके शिखरपर जा पहुँचा। वहाँ जाकर वह कार्यकी सिद्धिके लिये उपायपूर्वक चिन्ता करने लगा। उसने सोचा कि जो लोग महान् लक्ष्यसे युक्त और अटल निश्चयवाले हैं, उनके मनको जीतना अत्यन्त कठिन है। अतः सर्वप्रथम उसीको ही संक्षुब्ध कर निश्चयरूपसे विजय प्राप्त की जा सकती है; क्योंकि पूर्वकालमें मनको शुद्ध करके ही लोगोंने उत्तम सिद्धि प्राप्त की है। (किंतु कठिनाई तो यह है कि) क्रूरतर प्राणियोंके सङ्गसे अनेकों प्रकारके भावोंद्वारा द्वेषका अनुगमन किये बिना क्रोध कैसे उत्पन्न हो सकता है? इसके लिये मैं भयंकर ईर्ष्या नामकी महासखीको चपलताके मस्तकपर स्थापित करूँगा, तत्पश्चात् धैर्यके प्रवाहको विध्वस्त करनेवाली, महान् बलवती मनकी उस उत्कृष्ट विकृतिको शङ्करजीपर विनियुक्त करूँगा।
वयं प्रमाणस्ते ह्यत्र रतिकान्त न संशयः।<br>संदर्शेन विना शक्तिरयस्कारस्य नेष्यते।<br>कस्यचिच्च क्वचिद् दृष्टं सामर्थ्यं न तु सर्वतः ॥ २१८
इत्युक्तः प्रययौ कामः सखायं मधुमाश्रितः।<br>रतियुक्तो जगामाशु प्रस्थं तु हिमभूभृतः ॥ २१९
स तु तत्राकरोचिन्तां कार्यस्योपायपूर्वकम्।<br>महार्था ये हि निष्कम्पा मनस्तेषां सुदुर्जयम् ॥ २२०
तदादावेव संक्षोभ्य नियतं सुजयो भवेत्।<br>संसिद्धिं प्राप्नुयुश्चैव पूर्वे संशोध्य मानसम् ॥ २२१
कथं च विविधैर्भावैर्द्वेषानुगमनं विना।<br>क्रोधः क्रूरतरासङ्गाद् भीषणेष्यों महासखीम् ॥ २२२
चापल्यमूर्ध्नि विध्वस्तधैर्यधारां महाबलाम्।<br>तामस्य विनियोक्ष्यामि मनसो विकृतिं पराम् ॥ २२३