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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 629 of 1098

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Page 629

* अध्याय १५४ * ६१९

पिधाय धैर्यद्वाराणि संतोषमपकृष्य च।<br>अवगन्तुं हि मां तत्र न कश्चिदतिपण्डितः ॥ २२४<br><br>विकल्पमात्रावस्थाने वैरूप्यं मनसो भवेत्।<br>पश्चान्मूलक्रियारम्भगम्भीरावर्तदुस्तरः ॥ २२५<br><br>हरिष्यामि हरस्याहं तपस्तस्य स्थिरात्मनः।<br>इन्द्रियग्राममावृत्य रम्यसाधनसंविधिः ॥ २२६वहाँ धैर्यके द्वारोंको बंद कर तथा संतोषको दूर हटाकर कोई भी ऐसा उत्कृष्ट विद्वान् नहीं है, जो मुझे जाननेमें समर्थ हो सके। किसी भी कार्यके आरम्भमें विकल्पमात्रका विचार करनेसे मनकी विरूपता उत्पन्न हो जाती है, जिससे आगे चलकर मूल कार्यके आरम्भ होनेपर गम्भीर आपत्तियोंकी लहरें उठने लगती हैं और कार्य दुस्तर हो जाता है। अतः अब मैं रमणीय साधनोंके संविधानसे उन स्थिरात्मा शङ्करजीके इन्द्रियसमूहको ढककर उनकी तपस्याको भङ्ग करूँगा॥ २२४-२२६॥
चिन्तयित्वेति मदनो भूतभर्तुस्तदाश्रमम्।<br>जगाम जगतीसारं सरलद्रुमवेदिकम् ॥ २२७<br><br>शान्तसत्त्वसमाकीर्णमचलप्राणिसंकुलम् ।<br>नानापुष्पलताजालं गगनस्थगणेश्वरम् ॥ २२८<br><br>निर्व्यग्रवृषभाध्युष्टनीलशाद्वलसानुकम् ।<br>तत्रापश्यत् त्रिनेत्रस्य रम्यं कञ्चिद् द्वितीयकम् ॥ २२९<br><br>वीरकं लोकवीरेशमीशानसदृशद्युतिम्।<br>यक्षकुङ्कुमकिञ्जल्कपुञ्जपिङ्गजटासटम् ॥ २३०<br><br>वेत्रपाणिनमव्यग्रमुग्रभोगीन्द्रभूषणम् ।<br>ततो निमीलितोन्निद्रपद्मपत्रामलोचनम् ॥ २३१<br><br>प्रेक्षमाणमृजुस्थानं नासिकाग्रं सुलोचनैः।<br>स्रवस्तरससिंहैन्द्रचर्मलम्बोत्तरीयकम् ॥ २३२<br><br>श्रवणाहीफलन्मुक्तं निःश्वासानलपिङ्गलम्।<br>प्रेङ्खत्कपालपर्यन्ततुम्बिलम्बिजटाचयम् ॥ २३३<br><br>कृतवासुकिपर्यङ्कनाभिमूलनिवेशितम् ।<br>ब्रह्माञ्जलिस्थपुच्छाग्रनिबद्धोरगभूषणम् ॥ २३४<br><br>ददर्श शङ्करं कामः क्रमप्राप्तान्तिकं शनैः।<br>ततो भ्रमरझङ्कारमालम्बिद्रुमसानुकम् ॥ २३५<br><br>प्रविष्टः कर्णरन्ध्रेण भवस्य मदनो मनः।इस प्रकार सोच-विचारकर कामदेव प्राणियोंके पालक शङ्करजीके उस आश्रमपर गया, जो पृथ्वीका सारभूत था। वहाँ आमके वृक्ष उगे हुए थे, जिनकी छायामें वेदिकाएँ बनी थीं। वह शान्त स्वभाववाले जीवोंसे व्याप्त तथा पर्वतीय जीवोंसे भरा हुआ था। वहाँ नाना प्रकारके पुष्पोंकी लताएँ फैली हुई थीं। ऊपर आकाशमण्डलमें गणेश्वर विराजमान थे। वहीं एक ओर नीली घासके ऊपर वृषभराज नन्दीश्वर निश्चिन्तभावसे बैठे हुए थे। वहाँ कामदेवने त्रिनेत्रधारी शङ्करजीके निकट किसी दूसरे सुन्दर पुरुषको देखा। उसका नाम वीरक था। वह जगत्के वीरोंमें प्रधान था। उसकी शरीर-कान्ति शङ्करजीके समान थी। उसकी जटाएँ यक्षकुङ्कुम* और पद्मकेसरके पुञ्जके समान पीली थीं। उसके हाथमें बेंत शोभा पा रहा था। वह विषैले सर्पोंके आभूषणोंसे विभूषित हो निश्चिन्त भावसे बैठा हुआ था।<br>तदनन्तर कामदेवकी दृष्टि क्रमशः धीरे-धीरे निकट प्राप्त हुए शङ्करजीपर पड़ी, जिनके कमल-दलके सदृश नेत्र अधखुले थे। जो अपने सुन्दर नेत्रोंद्वारा सीधे नासिकाके अग्रभागको देख रहे थे। उनके कंधेपर सिंहके चमड़ेका ऐसा लम्बा उत्तरीय लटक रहा था, जिससे रक्त टपक रहा था। कानोंमें कुण्डलरूपमें पहने हुए सर्पोंके मुखसे निकलती हुई निःश्वासाग्निसे उनका शरीर पीला दीख रहा था। उनकी लम्बी जटाएँ खप्पर और तुम्बीतक हिलती हुई शोभा पा रही थीं। वे वासुकि नागकी शय्या बनाकर उसके नाभिमूलपर बैठे हुए थे। उनकी ब्रह्माञ्जलिमें भूषणरूपसे धारण किये गये सर्पकी पूँछका अग्रभाग स्थित था। तत्पश्चात् शङ्करजी जिस वृक्षके नीचे बैठे हुए थे, उसकी चोटीपर भ्रमरोंकी गुंजार गूँज उठी। उसी समय कामदेव शङ्करजीके श्रोत्रमार्गसे मनमें प्रविष्ट हुआ ॥ २२७-२३५ १/२॥

* कपूर, अगर, कस्तूरी और कंकोलके सम्मिश्रणसे बने हुए अङ्गराग या चन्दनको यक्षकुङ्कुम कहते हैं।

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