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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 627 of 1098

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Page 627

* अध्याय १५४ * <span style="float: right;">६१७</span>

संस्कृतहिन्दी अनुवाद
भवद्विधानां नियतममोघं दर्शनं मुने।<br>तवास्मान् प्रति चापल्यं व्यक्तं मम महामुने॥ २०१<br>भवद्भिरेव कृत्योऽहं निवासायात्मरूपिणाम्।<br>मुनीनां देवतानां च स्वयं कर्तापि कल्मषम्॥ २०२<br>तथापि वस्तुन्येकस्मिन्नाज्ञा मे सम्प्रदीयताम्।<br>इत्युक्तवति शैलेन्द्रे स तदा हर्षनिर्भरै॥ २०३<br>तथा च नारदो वाक्यं कृतं सर्वमिति प्रभो।<br>सुरकार्ये य एवार्थस्तवापि सुमहत्तरः॥ २०४<br>इत्युक्त्वा नारदः शीघ्रं जगाम त्रिदिवं प्रति।<br>स गत्वा शक्रभवनममरेशं ददर्श ह॥ २०५<br>ततोऽभिरूपे स मुनिरुपविष्टो महासने।<br>पृष्टः शक्रेण प्रोवाच हिमजासंश्रयां कथाम्॥ २०६मुने! आप-जैसे महर्षियोंका दर्शन निश्चय ही अमोघ होता है। महामुने! हमलोगोंके प्रति आपकी अस्थिरता तो मुझे स्पष्टरूपसे ज्ञात है। आप लोगोंद्वारा ही मैं आत्मस्वरूप मुनियों एवं देवताओंके निवास-योग्य बनाया गया हूँ। यद्यपि मैं स्वयं भी पाप करनेवाला हूँ, तथापि किसी एक वस्तुके लिये मुझे आज्ञा प्रदान कीजिये। उस समय हर्षसे भरे हुए शैलराजके इस प्रकार कहनेपर नारदजीने कहा—'प्रभो! तुमने सब कुछ कर लिया। (अब मुझे यही कहना है कि) देवताओंके कार्यका जो प्रयोजन है, वह तुम्हारे लिये भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होगा।' ऐसा कहकर नारदजी शीघ्र ही स्वर्गलोकको चले गये। वहाँ इन्द्रके भवनमें जाकर वे देवराज इन्द्रसे मिले। जब वे एक सुन्दर सिंहासनपर आसीन हो गये, तब इन्द्रने उनसे जिज्ञासा प्रकट की। फिर तो वे पार्वती-सम्बन्धी कथाका वर्णन करने लगे॥ १९७—२०६॥
नारद उवाच<br>समूह्य यत्तु कर्तव्यं तन्मया कृतमेव हि।<br>किंतु पञ्चशरस्यैव समयोऽयमुपस्थितः॥ २०७<br>इत्युक्तो देवराजस्तु मुनिना कार्यदर्शिना।<br>चूताङ्कुरास्त्रं सस्मार भगवान् पाकशासनः॥ २०८<br>संस्मृतस्तु तदा क्षिप्रं सहस्राक्षेण धीमता।<br>उपतस्थे रतियुतः सविलासो झषध्वजः।<br>प्रादुर्भूतं तु तं दृष्ट्वा शक्रः प्रोवाच सादरम्॥ २०९नारदजी बोले— देवराज! संगठित होकर सबके द्वारा जो काम किया जाना चाहिये, उसे तो मैंने अकेले ही कर दिया; किंतु इस अवसरपर अब कामदेवकी आवश्यकता आ पड़ी है। कार्यदर्शी नारद मुनिद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर देवराज भगवान् इन्द्रने आमके बौरके अङ्कुरको अस्त्ररूपमें धारण करनेवाले कामदेवका स्मरण किया। सहस्रनेत्रधारी बुद्धिमान् इन्द्रद्वारा स्मरण किये जानेपर झषकेतु कामदेव अपनी पत्नी रतिके साथ विलासपूर्वक शीघ्र ही उपस्थित हुआ। उसे उपस्थित देखकर इन्द्रने आदरपूर्वक उससे कहा॥ २०७—२०९॥
शक्र उवाच<br>उपदेशेन बहुना किं त्वां प्रति वदे प्रियम्।<br>मनोभवोऽसि तेन त्वं वेत्सि भूतमनोगतम्॥ २१०<br>तद्यथार्थकमेव त्वं कुरु नाकसदाम् प्रियम्।<br>शङ्करं योजय क्षिप्रं गिरिपुत्र्या मनोभव।<br>संयुतो मधुना चैव ऋतुराजेन दुर्जय॥ २११<br>इत्युक्तो मदनस्तेन शक्रेण स्वार्थसिद्धये।<br>प्रोवाच पञ्चबाणोऽथ वाक्यं भीतः शतक्रतुम्॥ २१२इन्द्र बोले— मनोभव! तुम तो अजेय हो और मनसे ही उत्पन्न होते हो, अतः सभी प्राणियोंके मनोगत भावोंको भलीभाँति जानते हो। ऐसी दशामें तुम्हारे प्रति अधिक उपदेश करनेसे क्या लाभ? मैं तुमसे एक प्रिय बात कह रहा हूँ। तुम स्वर्गवासियोंके उस प्रिय कार्यको अवश्य पूर्ण करो। (वह यह है कि) तुम चैत्रमास और ऋतुराज वसन्तको साथ लेकर शङ्करजीका गिरिराजकुमारी पार्वतीके साथ शीघ्र ही संयोग स्थापित करा दो। अपनी स्वार्थसिद्धिके निमित्त इन्द्रद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर पञ्चबाण कामदेव भयभीत होकर इन्द्रसे इस प्रकार बोला॥ २१०—२१२॥