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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 619 of 1098

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Page 619
* अध्याय १५४ *६०९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
उद्वहन् कनकोन्नद्धजीवकक्षामहोरगाम्।<br>मणिदीपगणज्योतिर्महालोकप्रकाशिते ॥ ८८<br><br>प्रकीर्णबहुसिद्धार्थे मनोजपरिवारके।<br>शुचि न्यंशुकसंछन्नभूशय्यास्तरणोज्ज्वले ॥ ८९<br><br>धूपाभोदमनोरम्ये सर्जग्रन्थोपयोगिके।<br>ततः क्रमेण दिवसे गते दूरं विभावरी ॥ ९०<br><br>व्यजृम्भत सुखोदर्के ततो मेनामहागृहे।<br>प्रसुप्तप्रायपुरुषे निद्राभूतोपचारिके ॥ ९१<br><br>स्फुटालोके शशभृति भ्रान्तिरात्रिविहङ्गमे।<br>रजनीचरभूतानां सङ्घैरावृतचत्वरे ॥ ९२<br><br>गाढकण्ठग्रहालग्नसुभगेष्टजने ततः।<br>किंचिदाकुलतांप्राप्ते मेनानेत्राम्बुजद्वये ॥ ९३<br><br>आविवेश मुखे रात्रिः सुचिरस्फुटसंगमा।<br>जन्मदाया जगन्मातुः क्रमेण जठरान्तरे ॥ ९४<br><br>आविवेशान्तरं जन्म मन्यमाना क्षपा तु वै।<br>अरञ्जयच्छविं देव्या गुहारण्ये विभावरी ॥ ९५रक्षाके निमित्त एक स्वर्णनिर्मित विशाल सर्पके-से आकारवाली माला लटक रही थी, जिसमें महौषधियोंके समूह और अभिमन्त्रित मन्त्रराज बँधे हुए थे। उनका वह महल मणिनिर्मित दीपसमूहोंकी ज्योतिके उत्कट प्रकाशसे उद्भासित था। वहाँ प्रयोजन-सिद्धिके लिये बहुत-से पदार्थ रखे हुए थे, जिससे वह कामदेवके परिवार-जैसा लग रहा था। वहाँ भूतलपर शय्या बिछी थी, जिसपर शुद्ध एवं श्वेत रेशमी चद्दर बिछी हुई थी तथा सर्जकी गन्धके समान मनको लुभानेवाले धूपकी सुगन्ध फैल रही थी। तदनन्तर क्रमशः दिनके व्यतीत होनेपर विभावरी मेनाके उस सुखमय विशाल गृहमें अपना प्रसार करने लगी। तत्पश्चात् जब शयनके लिये बिछी हुई शय्याओंपर पुरुषगण प्रायः कुछ निद्रामग्न-से होने लगे, चाँदनी स्पष्टरूपसे बिखर गयी, रात्रिमें विचरनेवाले पक्षी निर्भय होकर इधर-उधर घूमने लगे, चबूतरों (चौराहों)-पर राक्षसों और भूत-प्रेतोंका जमघट लग गया, पति-पत्नी गाढ़रूपसे गले लगकर नींदके वशीभूत हो गये, तब मेनाके भी दोनों नेत्रकमल नींदसे कुछ व्याकुल हो गये। ऐसा अवसर पाकर चिरकालसे स्पष्टरूपसे संगमकी इच्छा रखनेवाली रात्रि देवी जगन्माता पार्वतीकी जन्मदायिनी मेनाके मुखमें प्रवेश कर गयी और उसने क्रमशः सारे उदरपर अधिकार जमा लिया। अपने प्रवेशके अनन्तर देवीका जन्म मानती हुई विभावरी रात्रिने जंगली गुफाकी तरह उस उदरमें देवीकी कान्तिको अपने रंगसे रँग दिया॥ ८५–९५ ॥
ततो जगत्परित्राणहेतुर्हिमगिरिप्रिया।<br>ब्राह्मे मुहूर्ते सुभगे व्यसूत गुहारणिम् ॥ ९६<br><br>तस्यां तु जायमानायां जन्तवः स्थाणुजङ्गमाः।<br>अभवन् सुखिनः सर्वे सर्वलोकनिवासिनः ॥ ९७<br><br>नारकाणामपि तदा सुखं स्वर्गसमं महत्।<br>अभवत् क्रूरसत्त्वानां चेतः शान्तं च देहिनाम् ॥ ९८<br><br>ज्योतिषामपि तेजस्त्वमभवत् सुरतोन्नता।<br>वनाश्रिताश्चौषधयः स्वादुवन्ति फलानि च ॥ ९९<br><br>गन्धवन्ति च माल्यानि विमलं च नभोऽभवत्।<br>मारुतश्च सुखस्पर्शो दिशश्च सुमनोहराः ॥ १००<br><br>तेन चोद्भूतफलितपरिपाकगुणोज्ज्वलाः।<br>अभवत् पृथिवी देवी शालिमालाकुलापि च ॥ १०१तदनन्तर जगत्के परिरक्षणकी हेतुभूता हिमाचलप्रिया मेनाने सुन्दर ब्राह्ममुहूर्तमें स्कन्दकी माता पार्वतीको जन्म दिया। पार्वतीके उत्पन्न होनेपर सम्पूर्ण लोकोंके निवासी एवं सभी स्थावर-जङ्गम प्राणी सुखी हो गये। उस समय नरक-निवासियोंको भी स्वर्गके समान महान् सुखका अनुभव हुआ। क्रूर स्वभाववाले प्राणियोंका चित्त शान्त हो गया। ज्योतिर्गणोंका तेज बढ़ गया। देवसमूहोंकी उन्नति हुई। जंगली ओषधियाँ विकसित हो गयीं और फल स्वादिष्ट हो गये। पुष्पोंमें सुगन्ध बढ़ गयी और आकाश निर्मल हो गया। सुखस्पर्श शीतल, मंद, सुगन्ध वायु चलने लगी। दिशाएँ अत्यन्त मनोहारिणी हो गयीं। वे कुछ उत्पन्न हुए, कुछ फले हुए और कुछ पके हुए पदार्थोंके गुणोंसे युक्त होनेके कारण चमक रही थीं। पृथ्विदेवी भी धान्यसमूहोंसे व्याप्त हो गयी।