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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 620 of 1098

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Page 620

६१० * मत्स्यपुराण *


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तपांसि दीर्घचीर्णानि मुनीनां भावितात्मनाम्।<br>तस्मिन् गतानि साफल्यं काले निर्मलचेतसाम्॥ १०२<br>विस्मृतानि च शस्त्राणि प्रादुर्भावं प्रपेदिरे।<br>प्रभावस्तीर्थमुख्यानां तदा पुण्यतमोऽभवत्॥ १०३<br>अन्तरिक्षे सुराश्चासन् विमानेषु सहस्रशः।<br>समहेन्द्रहरिब्रह्मवायुवह्निपुरोगमाः ॥ १०४<br>पुष्पवृष्टिं प्रमुमुचुस्तस्मिंस्तु हिमभूधरे।<br>जगुर्गन्धर्वमुख्याश्च ननृतुश्चाप्सरोगणाः॥ १०५निर्मल-चित्त एवं शुद्धात्मा मुनियोंकी दीर्घकालसे चली आती हुई तपस्याएँ उस समय सफल हो गयीं। भूले हुए शस्त्र पुनः प्रकट होने लगे। प्रधान-प्रधान तीर्थोंका प्रभाव परम पुण्यमय हो गया। उस समय महेन्द्र, विष्णु, ब्रह्मा, वायु, अग्नि आदि हजारों देवता विमानोंपर चढ़कर आकाशमें उपस्थित थे। वे उस हिमाचलपर पुष्पोंकी वर्षा करने लगे, प्रधान-प्रधान गन्धर्व गाने लगे और अप्सराएँ नृत्य करने लगीं॥ ९६—१०५॥
मेरुप्रभृतयश्चापि मूर्तिमन्तो महाबलाः।<br>तस्मिन्महोत्सवे प्राप्ते दिव्यप्रभृतपाणयः॥ १०६<br>सरितः सागराश्चैव समाजग्मुश्च सर्वशः।<br>हिमशैलोऽभवल्लोके तथा सर्वैश्चराचरैः॥ १०७<br>सेव्यश्चाप्यभिगम्यश्च स श्रेयांश्चाचलोत्तमः।<br>अनुभूयोत्सवं देवा जग्मुः स्वानालयान्मुदा ॥ १०८<br>देवगन्धर्वनागेन्द्रशैलशीलावनीगुणैः ।<br>हिमशैलसुता देवी स्वयंपूर्विकया ततः॥ १०९<br>क्रमेण वृद्धिमानीता लक्ष्मीवानलसैर्बुधैः।<br>क्रमेण रूपसौभाग्यप्रबोधैर्भुवनत्रयम् ॥ ११०<br>अजयद् भूषयच्चापि निःसाधारणैरात्मजा।<br>एतस्मिन्नन्तरे शक्रो नारदं देवसम्मतम्॥ १११<br>देवर्षिमथ सस्मार कार्यसाधनसत्वरम्।<br>स्मृतिं शक्रस्य विज्ञाय जातां तु भगवांस्तदा ॥ ११२<br>आजगाम मुदा युक्तो महेन्द्रस्य निवेशनम्।<br>तं स दृष्ट्वा सहस्राक्षः समुत्थाय महासनात्॥ ११३<br>यथार्हेण तु पाद्येन पूजयामास वासवः।<br>शक्रप्रणीतां तां पूजां प्रतिगृह्य यथाविधि ॥ ११४<br>नारदः कुशलं देवमपृच्छत पाकशासनम्।<br>पृष्टे च कुशले शक्रः प्रोवाच वचनं प्रभुः॥ ११५उस महोत्सवक अवसरपर महाबली सुमेरु आदि पर्वत शरीर धारणकर और हाथमें (उपहारके लिये) दिव्य पदार्थ लिये हुए तथा नदियों और सागरोंके दल सब ओरसे उपस्थित हुए। उस समय हिमाचल जगत्में सभी चराचर प्राणियोंद्वारा सेव्य तथा अभिगमन करने योग्य बन गये। वे श्रेष्ठ पर्वतके रूपमें मङ्गलरूप हो गये। तत्पश्चात् देवगण उस उत्सवका आनन्द लेकर हर्षपूर्वक अपने-अपने स्थानको चले गये। इधर हिमाचलकन्या पार्वतीदेवी आलस्यरहित एवं बुद्धिमान् पुरुषोंकी लक्ष्मीकी भाँति क्रमशः दिन-प्रति-दिन बढ़ने लगीं। पार्वती ने अपने देव, गन्धर्व, नागेन्द्र, पर्वत और पृथ्वीके शीलस्वभावसे युक्त गुणों तथा रूप, सौभाग्य और ज्ञानद्वारा क्रमशः तीनों लोकोंको जीत लिया और असाधारणरूपसे विभूषित भी किया। इसी बीच इन्द्रने देवताओंके अनुकूलवर्ती एवं शीघ्र ही कार्य-साधनमें जुट जानेवाले देवर्षि नारदका स्मरण किया। तब अपनेको इन्द्रद्वारा स्मरण किया गया जानकर भगवान् नारद हर्षपूर्वक महेन्द्रके निवासस्थानपर आये। उन्हें आया हुआ देखकर सहस्रनेत्रधारी इन्द्र अपने सिंहासनसे उठ खड़े हुए और उन्होंने यथायोग्य पाद्य आदिद्वारा नारदजीकी पूजा की। इन्द्रद्वारा विधिपूर्वक की गयी उस पूजाको ग्रहणकर नारदने देवराज इन्द्रसे कुशल-प्रश्न किया। तब कुशल पूछे जानेपर सामर्थ्यशाली इन्द्रने इस प्रकार कहा—॥ १०६—११५॥
इन्द्र उवाच<br>कुशलस्याङ्कुरे तावत् सम्भूते भुवनत्रये।<br>तत्फलोद्भवसम्पत्तौ त्वं भवातन्द्रितो मुने ॥ ११६<br>वेत्सि चैतत्समस्तं त्वं तथापि परिचोदकः।<br>निर्वृतिं परमां याति निवेद्यार्थं सुहृज्जने ॥ ११७**इन्द्र बोले—**मुने! त्रिभुवनके कल्याणके लिये अङ्कुर तो उत्पन्न हो गया है, किंतु उससे फलरूपी सम्पत्तिकी उत्पत्तिके निमित्त आप सावधान हो जायँ। यद्यपि आप यह सब कुछ जानते हैं, तथापि कहनेवाला अपने मित्रसे अपना प्रयोजन निवेदित करके परम संतोषका अनुभव करता है।