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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 618 of 1098

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Page 618
६०८* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तत्सङ्गमेन तावत् त्वं दैत्यान् हन्तुं न शक्यसे।<br>एवं कृते तपस्तप्त्वा सृष्टिसंहारकारिणी ॥ ७२<br>समाप्तनियमा देवी यदा चोमा भविष्यति।<br>तदा स्वमेव तद्रूपं शैलजा प्रतिपत्स्यते ॥ ७३<br>तनुस्तवापि सहजा सैकानंशा भविष्यति।<br>रूपांशेन तु संयुक्ता त्वमुमायां भविष्यसि ॥ ७४<br>एकानंशेति लोकस्त्वां वरदे पूजयिष्यति।<br>भेदैर्बहुविधाकारैः सर्वगा कामसाधिनी ॥ ७५तबतक दैत्योंका संहार करनेमें समर्थ नहीं हो सकोगी। ऐसा करनेपर जब सृष्टिका संहार करनेवाली वह देवी तपस्या करनेके पश्चात् नियमोंको समाप्त कर उमारूपसे प्रकट होगी, तब पार्वती अपने उसी रूपको प्राप्त करेंगी। साथ ही तुम्हारा जो यह प्राकृतिक शरीर है, वह भी एकानंशा नामसे प्रसिद्ध होगा और तुम उमाके रूपके अंशसे युक्त होकर उमासे प्रकट होओगी। वरदायिनि ! संसार 'एकानंशा' नामसे तुम्हारी पूजा करेगा। तुम अनेकों प्रकारके भेदोंद्वारा सर्वगामिनी एवं कामनाओंको सिद्ध करनेवाली होओगी ॥ ६८-७५ ॥
ओंकारवक्त्रा गायत्री त्वमिति ब्रह्मवादिभिः।<br>आक्रान्तिरूजिताकारा राजभिश्च महाभुजैः ॥ ७६<br>त्वं भूरिति विशां माता शूद्रैः शैवीति पूजिता।<br>क्षान्तिर्मुनीनामक्षोभ्या दया नियमिनामिति ॥ ७७<br>त्वं महोपायसंदोहा नीतिर्नयविसर्पणाम्।<br>परिच्छित्तिस्त्वमर्थानां त्वमीहा प्राणिहृच्छया ॥ ७८<br>त्वं मुक्तिः सर्वभूतानां त्वं गतिः सर्वदेहिनाम्।<br>त्वं च कीर्तिमतां कीर्तिस्त्वं मूर्तिः सर्वदेहिनाम् ॥ ७९<br>रतिस्त्वं रक्तचित्तानां प्रीतिस्त्वं हृष्टदर्शिनाम्।<br>त्वं कान्तिः कृतभूषाणां त्वं शान्तिर्दुःखकर्मणाम् ॥ ८०<br>त्वं भ्रान्तिः सर्वभूतानां त्वं गतिः क्रतुयाजिनाम्।<br>जलधीनां महावेला त्वं च लीला विलासिनाम् ॥ ८१<br>सम्भूतिस्त्वं पदार्थानां स्थितित्वं लोकपालिनी।<br>त्वं कालरात्रिर्निःशेषभुवनावलिनाशिनी ॥ ८२<br>प्रियकण्ठग्रहानन्ददायिनी त्वं विभावरी।<br>इत्यनेकविधैर्देवि रूपैर्लोके त्वमर्चिता ॥ ८३<br>ये त्वां स्तोष्यन्ति वरदे पूजयिष्यन्ति वापि ये।<br>ते सर्वकामानाप्स्यन्ति नियता नात्र संशयः ॥ ८४इसी प्रकार ब्रह्मवादी विप्रगण तुम्हें ओंकाररूप मुखवाली गायत्री और महाबाहु नृपतिवृन्द उन्नतिशीला शक्ति कहेंगे। तुम पृथ्वीरूपसे वैश्योंकी माता कहलाओगी और शूद्र 'शैवी' कहकर तुम्हारी पूजा करेंगे। तुम मुनियोंकी क्षुब्ध न की जा सकनेवाली क्षमा, नियमधारियोंकी दया, नीतिज्ञोंकी महान् उपायोंसे परिपूर्ण नीति, अर्थ-साधनाकी सीमा, समस्त प्राणियोंके हृदयमें निवास करनेवाली इच्छा, समस्त प्राणियोंकी मुक्ति, सम्पूर्ण देहधारियोंकी गति, कीर्तिमान् जनोंकी कीर्ति, अखिल देहधारियोंकी मूर्ति, अनुरागीजनोंकी रति, हर्षसे परिपूर्ण लोगोंकी प्रीति (प्रसन्नता), शृङ्गारसे सुसज्जित प्राणियोंकी कान्ति (शोभा), दुःखिजनोंके लिये शान्तिरूपा, निखिल प्राणियोंकी भ्रान्ति, यज्ञानुष्ठान करनेवालोंकी गति, समुद्रोंकी विशाल वेला (तट), विलासियोंकी लीला, पदार्थोंकी सम्भूति (उत्पत्तिस्थान), लोकोंका पालन करनेवाली स्थिति, सम्पूर्ण भुवनसमूहोंको नाश करनेवाली कालरात्रि तथा प्रियतमके गलेसे लगनेपर उत्पन्न हुए आनन्दको देनेवाली रात्रिके रूपमें सम्मानित होओगी। देवि ! इस प्रकार तुम संसारमें अनेक प्रकारके रूपोंद्वारा पूजित होओगी। वरदे ! जो लोग नियमपूर्वक तुम्हारा स्तवन-पूजन करेंगे, वे सभी मनोरथोंको प्राप्त कर लेंगे, इसमें तनिक भी संशय नहीं है ॥ ७६-८४ ॥
इत्युक्ता तु निशा देवी तथेत्युक्त्वा कृताञ्जलिः।<br>जगाम त्वरिता तूर्णं गृहं हिमगिरेः परम् ॥ ८५ब्रह्माद्वारा इस प्रकार आदेश दिये जानेपर विभावरी (रात्रि) देवी हाथ जोड़कर 'अच्छा, ऐसा ही करूँगी' यों कहकर तुरंत ही बड़े वेगसे हिमाचलके उस सुन्दर भवनकी ओर प्रस्थित हुई।
तत्रासीनां महाहर्म्ये रत्नभित्तिसमाश्रयाम्।<br>ददर्श मेनामापाण्डुच्छविवक्त्रसरोरुहाम् ॥ ८६वहाँ पहुँचकर उसने एक विशाल अट्टालिकापर रत्ननिर्मित दीवालके सहारे बैठी हुई मेनाको देखा। उस समय उनके मुखकमलकी कान्ति कुछ पीली पड़ गयी थी।
किंचिच्छ्याममुखोदग्रस्तनभारावनामिताम् ।<br>महौषधिगणाबद्धमन्त्रराजनिषेविताम् ॥ ८७वे कुछ काले रंगवाले चूचुकोंसे युक्त स्तनके भारसे झुकी हुई थीं। उनके गलेमें जीव-