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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 617 of 1098

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Page 617
* अध्याय १५४ *६०७

| ब्रह्मोवाच | **ब्रह्माजीने कहा—*विभावरि (रात्रिदेवी)! इस समय देवताओंका एक बहुत बड़ा कार्य आ उपस्थित हुआ है। देवि! उसे तुम्हें अवश्य पूरा करना है। अब उस कार्यका निर्णय सुनो। दैत्यराज तारक देवताओंका कट्टर शत्रु है, वह अजेय है। उसका विनाश करनेके लिये भगवान् शंकर जिस पुत्रको उत्पन्न करेंगे, वही उस तारकका वध करनेवाला होगा। उधर शंकरजीकी पत्नी जो दक्षपुत्री सती थी, वह देवी किसी कारणवश कुपित होकर शरीरको भस्म कर चुकी है। वही लोकसुन्दरी देवी हिमाचलकी कन्याके रूपमें प्रकट होगी। भगवान् शंकर उसके वियोगसे तीनों लोकोंको शून्य समझकर हिमाचलकी सिद्धोंद्वारा सेवित कन्दरामें तपस्या कर रहे हैं। वे उस देवीके जन्मकी प्रतीक्षा करते हुए वहाँ कुछ कालतक निवास करेंगे। उत्कृष्ट तप करनेवाले उन दोनों (शिव-पार्वती)-से जो महाबली पुत्र उत्पन्न होगा, वही तारक दैत्यका विनाशक होगा। शुभानने! वह सुन्दरी देवी जन्म लेनेके पश्चात् थोड़ा होश सँभालनेपर जब विरहसे उत्कण्ठित होकर गाढ़ रूपसे शंकरजीके समागमकी लालसासे युक्त हो जायगी तब उन दोनों घोर तपस्वियोंका संयोग होगा। उस समय उन दोनोंमें थोड़ा वाक्-कलह भी हो जायगा जिससे तारकके विनाशके प्रति पुनः संशय दिखायी पड़ने लगेगा, अतः उन दोनोंके संयुक्त होनेपर सुरतकी आसक्तिके अवसरपर तुम्हें जैसा विघ्न उपस्थित करना होगा, उसे भी सुन लो॥ ५८—६७॥ |
| विभावरि महत्कार्यं विबुधानामुपस्थितम्।<br>तत्कर्तव्यं त्वया देवि शृणु कार्यस्य निश्चयम्॥ ५८<br>तारको नाम दैत्येन्द्रः सुरकेतुरनिर्जितः।<br>तस्याभावाय भगवान्जनयिष्यति चेश्वरः॥ ५९<br>सुतं स भविता तस्य तारकस्यान्तकारकः।<br>शंकरस्याभवत् पत्नी सती दक्षसुता तु या॥ ६०<br>सा मृता कुपिता देवी कस्मिंश्चित्कारणान्तरे।<br>भविता हिमशैलस्य दुहिता लोकभाविनी॥ ६१<br>विरहेण हरस्तस्या मत्वा शून्यं जगत्त्रयम्।<br>तपस्यन् हिमशैलस्य कन्दरे सिद्धसेविते॥ ६२<br>प्रतीक्षमाणस्तज्जन्म कञ्चित् कालं निवत्स्यति।<br>तयोः सुतमतपोर्भाविता यो महाबलः॥ ६३<br>स भविष्यति दैत्यस्य तारकस्य विनाशकः।<br>जातमात्रा तु सा देवी स्वल्पसंज्ञा च भामिनी॥ ६४<br>विरहोत्कण्ठिता गाढं हरसङ्गमलालसा।<br>तयोः सुतमतपसोः संयोगः स्याच्छुभानने॥ ६५<br>ततस्ताभ्यां तु जनितः स्वल्पो वाक्कलहो भवेत्।<br>ततोऽपि संशयो भूयस्तारकं प्रति दृश्यते॥ ६६<br>तयोः संयुक्तयोस्तस्मात् सुरतासक्तिकारणे।<br>विघ्नस्त्वया विधातव्यो यथा ताभ्यां तथा शृणु॥ ६७ | |
| गर्भस्थाने च तन्मातुः स्वेन रूपेण रञ्जय।<br>ततो विहाय शर्वस्तां विश्रान्तो नर्मपूर्वकम्॥ ६८<br>भर्त्सयिष्यति तां देवीं ततः सा कुपिता सती।<br>प्रयास्यति तपश्चर्तुं तत्तस्मात् तपसे पुनः॥ ६९<br>जनयिष्यति यः शर्वादमितद्युतिमण्डितम्।<br>स भविष्यति हन्ता वै सुरारीणामसंशयम्॥ ७०<br>त्वयापि दानवा देवि हन्तव्या लोकदुर्जयाः।<br>यावच्च न सती देहसंक्रान्तगुणसञ्चया॥ ७१ | उस समय तुम उसकी माताके गर्भस्थानमें प्रवेश करके उसपर अपने रूपकी छाप डाल दो। तब शंकरजी उसे छोड़कर विश्राम करने लगेंगे और परिहासमें उस देवीकी भर्त्सना करेंगे जिससे कुपित होकर वह पुनः तपस्या करनेके लिये चली जायगी। पुनः उस तपस्यासे लौटनेपर वह शंकरजीके सम्पर्कसे जिस उत्कृष्ट कान्तिसे सुशोभित पुत्रको उत्पन्न करेगी, वह निःसंदेह देव-शत्रुओंका संहारक होगा। देवि! तुम्हें भी इन लोकदुर्जय दानवोंका संहार करना चाहिये, किंतु जबतक तुम सतीके समागमसे उसके शरीरसे संक्रमित हुए गुणसमूहोंसे युक्त नहीं हो जाओगी, |


* इन मूल श्लोकोंका ऋग्वेद, अथर्ववेद एवं आथर्वणपरिशिष्टप्रोक्त रात्रिसूक्तादिसे घनिष्ठ सम्बन्ध है। पूर्ण जानकारीके लिये यहाँका भी अर्थ ध्येय है। ये श्लोक बृहद्धर्मपुराणमें भी हैं।