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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 616 of 1098

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Page 616
६०६* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
हन्ताकृतोपकरणैर्मित्रारिगुरुलघवौः ।<br>शरणागतसंत्यागी त्यक्तसत्यपरिश्रयः ॥ ४४<br>इति निःशेषमथवा निःशेषं वै न शक्यते।<br>तस्याविनयमाख्यातुं स्रष्टा तत्र परायणम् ॥ ४५<br>इत्युक्तः स्वात्मभूर्देवः सुरैर्दैत्यविचेष्टितम् ।<br>सुरानुवाच भगवांस्ततः स्मितमुखाम्बुजः ॥ ४६उस दैत्यका मित्र और शत्रुके प्रति भी बड़े-छोटेका विचार नहीं रह गया है। वह शरणमें आये हुएका भी त्याग कर देता है और सत्यका तो उसने व्यवहार ही छोड़ दिया है। यही सब उसकी बुराइयाँ हैं अथवा उसकी उद्दण्डता तो पूर्णरूपसे कही ही नहीं जा सकती। उसे तो ब्रह्मा ही जानें। इस प्रकार देवताओं द्वारा उस दैत्यकी कृतियोंका वर्णन किये जानेपर देवाधिदेव भगवान् ब्रह्माके मुखकमलपर मुसकराहट आ गयी, तब वे देवताओंसे बोले—॥ ३८–४६ ॥
ब्रह्मोवाच<br>अवध्यस्तारको दैत्यः सर्वैरपि सुरासुरैः।<br>यस्य वध्यः स नाद्यापि जातस्त्रिभुवने पुमान् ॥ ४७<br>मया स वरदानेन च्छन्दयित्वा निवारितः।<br>तपसः साम्प्रतं राजा त्रैलोक्यदहनात्मकात् ॥ ४८<br>स च वव्रे वधं दैत्यः शिशुतः सप्तवासरात् ।<br>स सप्तदिवसो बालः शंकराद् यो भविष्यति ॥ ४९<br>तारकस्य निहन्ता स भास्कराभो भविष्यति।<br>साम्प्रतं चाप्यपत्नीकः शंकरो भगवान् प्रभुः ॥ ५०<br>यच्चाहमुक्तवान् यस्या ह्युत्तानकरता सदा।<br>उत्तानो वरदः पाणिरेष देव्याः सदैव तु ॥ ५१<br>हिमाचलस्य दुहिता सा तु देवी भविष्यति।<br>तस्याः सकाशाद् यः शर्वस्त्वरण्यां पावको यथा ॥ ५२<br>जनयिष्यति तं प्राप्य तारकोऽभिभविष्यति।<br>मयाप्युपायः स कृतो यथैवं हि भविष्यति ॥ ५३<br>शेषश्चाप्यस्य विभवो विनश्येत् तदनन्तरम् ।<br>स्तोककालं प्रतीक्षध्वं निविशङ्केन चेतसा ॥ ५४ब्रह्माजीने कहा— देवगण! दैत्यराज तारक सभी देवताओं एवं राक्षसोंद्वारा अवध्य है। जो उसका वध कर सकता है, वह पुरुष अभी त्रिभुवनमें उत्पन्न ही नहीं हुआ है। मैंने ही उस दैत्यराजको वरदान देकर त्रिलोकीको भस्म करनेवाले उस तपसे निवारण किया था। उस समय उस दैत्यने सात दिनके बालकद्वारा अपनी मृत्युका वरदान माँगा था। वह सप्तदिवसीय बालक जो शंकरजीसे उत्पन्न होगा, सूर्यके समान तेजस्वी होगा। वही तारकका वध करनेवाला होगा, किंतु इस समय सामर्थ्यशाली भगवान् शंकर पत्नी-रहित हैं। इसके लिये मैंने पहले जिस देवीके विषयमें उत्तानकरताकी बात कही थी, वही देवी हिमाचलकी कन्याके रूपमें प्रकट होगी। उस देवीका वह वरदायक हाथ सदा उत्तान ही रहेगा। उस देवीके सम्पर्कसे शंकरजी अरणीमें अग्निकी तरह जिस पुत्रको उत्पन्न करेंगे, उसे सम्मुख पाकर तारक पराजित हो जायगा। मैंने भी पहलेसे ही वैसा उपाय कर रखा है, जिससे यह सब वैसा ही होगा। तदनन्तर उसका यह सारा वैभव नष्ट हो जायगा। तुमलोग निःशङ्क चित्तसे थोड़े-से कालकी और प्रतीक्षा करो ॥ ४७–५४ ॥
इत्युक्तास्त्रिदशास्तेन साक्षात्कमलजन्मना।<br>जग्मुस्तं प्रणिपत्येशं यथायोग्यं दिवौकसः ॥ ५५<br>ततो गतेषु देवेषु ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>निशा सस्मार भगवान् स्वतनोः पूर्वसम्भवाम् ॥ ५६<br>ततो भगवती रात्रिरुपतस्थे पितामहम्।<br>तां विविक्ते समालोक्य ब्रह्मोवाच विभावरीम् ॥ ५७कमलजन्मा साक्षात् ब्रह्माद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर स्वर्गवासी देवगण उन देवेश्वरको प्रणाम करके अपने-अपने स्थानको चले गये। तदनन्तर देवताओंके चले जानेपर लोकपितामह भगवान् ब्रह्माने जिसे पहले अपने शरीरसे उत्पन्न किया था, उस निशाका स्मरण किया। तब भगवती रात्रिदेवी पितामहके निकट उपस्थित हुईं। उस विभावरी (रात्रि)-को एकान्तमें उपस्थित देखकर ब्रह्मा बोले ॥ ५५–५७ ॥