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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 615 of 1098

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Page 615

* अध्याय १५४ * ६०५

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कृतवानसि सर्वगुणातिशयं<br>यमशेषमहीधरराजतया ।<br>सममिङ्गितभावविधिः स गिरि-<br>र्गगनेन सदोच्चयतां हि गतः ॥ ३४<br><br>अधिवासविहारविधावुचितो<br>दितिजेन पविक्षतशृङ्गतटः ।<br>परिलुण्ठितरत्नगुहानिवहो<br>बहुदैत्यसमाश्रयतां गमितः ॥ ३५<br><br>सुरराज स तस्य भयेन गतं<br>व्यदधादशरीर इतोऽपि वृथा ।<br>उपयोग्यतया विवृतं सुचिरं<br>विमलद्युतिपूरितदिग्वदनम् ॥ ३६<br><br>भवतैव विनिर्मितमादियुगे<br>सुरहेतिसमूहमकुण्ठमिदम् ।<br>दितिजस्य शरीरमवाप्य गतं<br>शतधा मतिभेदमिवाल्पमनः ॥ ३७जिस हिमालयको समस्त पर्वतोंका राजा होनेके कारण आपने सर्वगुण-सम्पन्न बनाया, जो ऊँचाईमें आकाशतक व्याप्त था और संकेतानुसार चलनेवाला था, उसके शिखरके तटप्रान्तको उस दैत्यने वज्रसे तोड़-फोड़कर अपने निवास और विहारके उपयुक्त बना लिया है। उसकी गुफाओंके रत्न लूट लिये गये और अब वह बहुत-से दैत्योंका निवासस्थान बन गया है। उस दैत्यके भयसे वह शरीरहीन होनेपर भी इससे भी बढ़कर बुरे कामोंमें लगाया जा रहा है। सुरराज! कृतयुगके आदिमें आपने ही देवताओंके लिये उपयोगी समझकर जिन विशाल, चिरस्थायी, अपनी निर्मल कान्तिसे दिशाओंको उद्भासित करनेवाले एवं अप्रतिहत अस्त्रसमूहोंका निर्माण किया था, वे अस्त्र भी उस दैत्यके शरीरपर गिरकर कायरकी बुद्धि-भिन्नताकी तरह सैकड़ों टुकड़ोंमें टूट-टूट कर चूर हो गये॥ ३४-३७॥
आसारधूलिध्वस्ताङ्गा द्वारस्थाः स्मः कदर्थिनः ।<br>लब्धप्रवेशाः कृच्छ्रेण वयं तस्यामरद्विषः ॥ ३८देवेश! (इतना ही नहीं) उस देवद्रोहीके द्वारपर कीचड़ और धूलिसे भरे हुए अङ्गवाले हमलोग तिरस्कार-पूर्वक बैठाये गये थे और बड़ी कठिनाईसे हमलोगोंको उसकी सभामें प्रवेश करनेका अवसर मिला था।
सभायाममरा देव निकृष्टेऽप्युपवेशिताः ।<br>वेत्रहस्तैरजल्पन्तस्ततोऽपहसितास्तु तैः ॥ ३९उस सभामें भी देवगण निकृष्ट आसनोंपर बैठाये गये थे। वहाँ यद्यपि हमलोग कुछ बोल नहीं रहे थे, तथापि उसके बेंतधारी भृत्योंद्वारा हमलोगोंका उपहास किया जा रहा था।
महार्थाः सिद्धसर्वार्था भवन्तः स्वल्पभाषिणः ।<br>चाटुयुक्तमथो कर्म ह्यमरा बहुभाषत ॥ ४०वे कह रहे थे—'देवगण! आपलोग बड़े सम्मानित एवं सभी प्रयोजनोंको सिद्ध करनेवाले हैं, इसीलिये थोड़ा बोलते हैं न?' उनकी इन व्यङ्ग्यपूर्ण बातोंका उत्तर भी देवगण अनेक प्रकारकी चाटुताभरी बातोंद्वारा देते थे।
सभेयं दैत्यसिंहस्य न शक्रस्य विसंस्थुला ।<br>वदतेति च दैत्यस्य प्रेष्यैर्विहसिता बहु ॥ ४१'यह दैत्यसिंह तारककी सभा है, इन्द्रकी लड़खड़ानेवाली सभा नहीं है, बोलो, बोलो।' इस प्रकार उस दैत्यके परिचारकोंद्वारा हमलोगोंकी बहुत हँसी उड़ायी गयी है।
ऋतवो मूर्तिमन्तस्तमुपासन्ते ह्यहर्निशम् ।<br>कृतापराधसंत्रासं न त्यजन्ति कदाचन ॥ ४२वहाँ छहों ऋतुएँ शरीर धारणकर रात-दिन उसकी सेवामें लगी हैं। वे कोई अपराध न हो जाय—इस भयसे उसे कभी नहीं छोड़तीं।
तन्त्रीत्रयलयोपेतं सिद्धगन्धर्वकिन्नरैः ।<br>सुरागमुपधा नित्यं गीयते तस्य वेश्मसु ॥ ४३सिद्ध, गन्धर्व और किंनर उसके महलोंमें निष्कपरूपसे नित्य वीणापर तीनों लयोंसमेत सुन्दर राग अलापते रहते हैं।