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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 612 of 1098

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Page 612

६०२ * मत्स्यपुराण *


| तन्निशाम्याब्रवीद् दैत्यः प्रतीहारस्य भाषितम्।<br>यथेष्टं स्थीयतामेभिर्गृहं मे भुवनत्रयम्॥ ४<br>केवलं पाशबन्धेन विमुक्तैरविलम्बितम्।<br>एवं कृते ततो देवा दूयमानेन चेतसा॥ ५<br>जग्मुर्जगद्गुरुं द्रष्टुं शरणं कमलोद्भवम्।<br>निवेदितास्ते शक्राद्याः शिरोभिर्धरणिं गताः।<br>तुष्टुवुः स्पष्टवर्णार्थैर्वचोभिः कमलासनम्॥ ६ | द्वारपालके उस कथनको सुनकर दैत्यराजने कहा—'अरे! ये स्वेच्छानुसार कहीं भी स्थित रहें, इन्हें शीघ्र ही केवल बन्धन-मुक्त कर दिया जाय; क्योंकि अब तो तीनों भुवन मेरा गृह है अर्थात् पूरे विश्वपर मेरा ही अधिकार है।' इस प्रकार बन्धन-मुक्त होनेके पश्चात् देवगण दुःखी चित्तसे जगद्गुरु कमलजन्मा ब्रह्माका दर्शन करनेके लिये उनकी शरणमें गये। वहाँ पहुँचकर उन इन्द्र आदि देवताओंने पृथ्वीपर सिर टेककर ब्रह्माको प्रणाम किया और उनसे अपनी करुण-कहानी कह सुनायी। तत्पश्चात् वे स्पष्ट अक्षरों एवं अर्थोंसे युक्त वचनोंद्वारा ब्रह्माकी स्तुति करने लगे॥ १—६॥ |
| देवा ऊचुः<br>त्वमोंकारोऽस्यङ्कुराय प्रसूतो<br>विश्वस्यात्मानन्तभेदस्य पूर्वम्।<br>सम्भूतस्यानन्तरं सत्त्वमूर्ते<br>संहारेच्छोस्ते नमो रुद्रमूर्ते॥ ७<br>व्यक्तिं नीत्वा त्वं वपुः स्वं महिम्ना<br>तस्मादण्डात् स्वाभिधानादचिन्त्यः।<br>द्यावापृथ्व्योरूर्ध्वखण्डावराभ्यां<br>ह्याण्डादस्मात् त्वं विभागं करोषि॥ ८<br>व्यक्तं मेरौ यजनायुस्तवैभू-<br>र्देवं विद्मस्त्वत्प्रणीतश्चकास्ति ।<br>व्यक्तं देवाजन्मनः शाश्वतस्य<br>द्यौस्ते मूर्धा लोचने चन्द्रसूर्यौ॥ ९<br>व्यालाः केशाः श्रोत्ररन्धा दिशस्ते<br>पादौ भूमिर्नाभिरन्ध्रे समुद्राः।<br>मायाकारः कारणं त्वं प्रसिद्धो<br>वेदैः शान्तो ज्योतिषा त्वं हि युक्तः॥ १० | देवगण बोले—सत्त्वमूर्ते! आप ओंकारस्वरूप हैं। आप विश्वकी रचनाके लिये प्रकट सर्वप्रथम अङ्कुर हैं और इस अनन्त भेदोंवाले विश्वके आत्मा अर्थात् मूलस्वरूप हैं। रुद्रमूर्ते! अन्तमें इस उत्पन्न हुए विश्वका संहार भी आप ही करते हैं, आपको नमस्कार है। आपका स्वरूप अचिन्त्य है। आप अपनी महिमासे अपने शरीरको अपने ही नामसे युक्त अण्ड अर्थात् ब्रह्माण्डके रूपमें प्रकटकर उसी ब्रह्माण्डसे ऊपर एवं नीचेके दो खण्डोंद्वारा आकाश और पृथ्वीका विभाजन करते हैं। हमलोग स्पष्टरूपसे ऐसा जानते हैं कि मेरुपर्वतपर आपने जो देवादि प्राणियोंकी आयु-सीमा निर्धारित की थी, वही कर्तव्यता आदि आपद्वारा निर्मित विधान अब भी प्रचलित है। देव! यह स्पष्ट है कि आप अजन्मा और अविनाशी हैं। आकाश आपका मस्तक, चन्द्रमा एवं सूर्य आपके नेत्र, सर्प केश, दिशाएँ कानोंके छिद्र, पृथ्वी दोनों चरण और समुद्र नाभिछिद्र हैं। आप मायाके रचयिता तथा जगत्के कारणरूपसे प्रसिद्ध हैं। वेदोंका कहना है कि आप परमज्योतिसे युक्त एवं शान्तस्वरूप हैं॥ ७—१०॥ |
| वेदार्थेषु त्वां विवृण्वन्ति बुध्वा<br>हृत्पद्मान्तःसंनिविष्टं पुराणम्।<br>त्वामात्मानं लब्धयोगा गृणन्ति<br>सांख्यैर्यास्ताः सप्त सूक्ष्माः प्रणीताः॥ ११<br>तासां हेतुर्याष्टमी चापि गीता<br>तस्यां तस्यां गीयसे वै त्वमन्तम्।<br>दृष्ट्वा मूर्तिं स्थूलसूक्ष्मां चकार<br>देवैर्भावाः कारणैः कैश्चिदुक्ताः॥ १२ | विद्वान्लोग आपको वेदार्थोंमें खोजते हैं और आपको जानकर अपने हृदयकमलके भीतरी भागमें स्थित पुराणपुरुष बतलाते हैं। योगके ज्ञाता आपको आत्मस्वरूप कहते हैं तथा सांख्यज्ञोंद्वारा जो सात सूक्ष्म मूर्तियाँ निर्मित की गयी हैं तथा उनकी हेतुभूता जो आठवीं कही गयी है, उन सभीके अन्तमें आपकी ही स्थिति मानी गयी है। यह देखकर आपने ही स्थूल एवं सूक्ष्म मूर्तियोंका आविष्कार किया था। किन्हीं अज्ञात कारणवश देवताओंने उन भावोंका वर्णन किया था। |

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