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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 613 of 1098

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Page 613
  • अध्याय १५४ * | ६०३
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    सम्भूतास्ते त्वत्त एवादिसर्गे<br>भूयस्तां तां वासनां तेऽभ्युपेयुः।<br>त्वत्संकल्पेनानन्तमायाविमूढः<br>कालोऽमेयो ध्वस्तसंख्याविकल्पः ॥ १३<br>भावाभावव्यक्तिसंहारहेतु-<br>स्त्वं सोऽनन्तस्तस्य कर्तासि चात्मन्।<br>येऽन्ये सूक्ष्माः सन्ति तेभ्योऽभिगीतः<br>स्थूला भावाश्चावतारश्च तेषाम् ॥ १४<br>तेभ्यः स्थूलैस्तैः पुराणैः प्रतीतो<br>भूतं भव्यं चैवमुद्भूतिभाजाम्।<br>भावे भावे भावितं त्वा युनक्ति<br>युक्तं युक्तं व्यक्तिभावान्निरस्य।<br>इत्थं देवो भक्तिभाजां शरण्य-<br>स्त्राता गोप्ता नो भवानन्तमूर्तिः ॥ १५ | वे सभी आदिसृष्टिके समय आपसे ही प्रकट हुए थे और आपके संकल्पके अनुसार उन्हें पुनः वैसी-वैसी वासना प्राप्त हुई थी। आप अनन्त मायाओंद्वारा निगूढ़, अप्रमेय कालस्वरूप एवं कल्पित संख्यासे अतीत हैं। आप भाव और अभावकी उत्पत्ति और संहारके कारण हैं। आत्मस्वरूप भगवन्! आप अनन्त विश्व-ब्रह्माण्डके कर्ता हैं। अन्यान्य जितने सूक्ष्म, स्थूल तथा उनको भी ढकनेवाले अर्थात् उनसे उत्कृष्ट भाव हैं, उनके द्वारा भी आपका गुणगान किया गया है। उनसे बढ़कर जो स्थूल एवं प्राचीन हैं, उनके द्वारा भी आप जाने गये हैं। आप उन्नतिशीलोंके भूत एवं भविष्य-रूप हैं। आप प्रत्येक भावमें अनुप्रविष्ट होकर व्यक्त होते हैं और व्यक्तिभावका निरसन कर उसमें अवस्थित रहते हैं। इस प्रकार अनन्त मूर्ति धारण करनेवाले देवाधिदेव! आप हम भक्तजनोंके लिये शरणदाता, रक्षक और सहायक होइये ॥११-१५॥
    विरिञ्चिममराः स्तुत्वा ब्रह्माणमविकारिणम्।<br>तस्थुर्मनोभिरिष्टार्थसम्प्राप्तिप्रार्थनास्ततः ॥ १६<br>एवं स्तुतो विरिञ्चिस्तु प्रसादं परमं गतः।<br>अमरान् वरदेनाह वामहस्तेन निर्दिशन् ॥ १७ | इस प्रकार देवगण अविकारी ब्रह्माकी स्तुति करके मनमें अभीष्ट प्रयोजनकी सिद्धिके लिये प्रार्थना करते हुए खड़े रहे। देवताओंद्वारा इस प्रकार स्तुति किये जानेपर ब्रह्मा परम प्रसन्न हुए और अपने वरदायक बायें हाथसे देवताओंको निर्देश करते हुए बोले ॥१६-१७॥
    ब्रह्मोवाच<br>नारीवाभर्तृका कस्मात् तनुस्ते त्यक्तभूषणा।<br>न राजते तथा शक्र म्लानवक्त्रशिरोरुहा ॥ १८ | **ब्रह्माजीने कहा—**इन्द्र! भूषणोंसे रहित तथा मलिन मुख एवं बालोंसे युक्त तुम्हारा शरीर पतिविहीना स्त्रीकी तरह शोभा नहीं पा रहा है।
    हुताशन विमुक्तोऽपि न धूमेन विराजसे।<br>भस्मनेव प्रतिच्छन्नो दग्धदावाग्निरोषितः ॥ १९ | हुताशन! धूमसे रहित होनेपर भी तुम्हारी शोभा नहीं हो रही है। ऐसा प्रतीत होता है मानो तुम चिरकालसे जलकर शान्त हो गये हो और राखसे ढक गये हो।
    यमामयमये नैव शरीरे त्वं विराजसे।<br>दण्डस्यालम्बनेनेव ह्यकृच्छ्रस्तु पदे पदे ॥ २० | यमराज! इस रोगी शरीरमें तुम्हारी शोभा नहीं हो रही है। ऐसा ज्ञात होता है, मानो तुम पग-पगपर कठिनाईका अनुभव करते हुए कालदण्डके सहारे चल रहे हो।
    रजनीचरनाथोऽपि किं भीत इव भाषसे।<br>राक्षसेन्द्र क्षताराते त्वमरातिविक्षतो यथा ॥ २१ | राक्षसेन्द्र निर्ऋति! तुम राक्षसोंके स्वामी होकर भी भयभीतकी तरह क्यों बोल रहे हो? अरे शत्रुसंहारक! तुम तो शत्रुओंद्वारा घायल किये हुए-से दीख रहे हो।
    तनुस्ते वरुणोच्छुष्का परीतस्येव वह्निना।<br>विमुक्तरुधिरं पाशं फणिभिः प्रविलोकयन् ॥ २२ | वरुण! तुम्हारा शरीर अग्निसे घिरे हुएकी तरह अत्यन्त शुष्क दीख रहा है। ऐसा लग रहा है मानो सर्पोंने तुम्हारे पाशमेंसे खून उगल दिया है।
    वायो भवान् विचेतस्कस्त्वं स्निग्धैरिव निर्जितः।<br>किं त्वं बिभेषि धनद संन्यस्यैव कुबेरताम् ॥ २३ | वायुदेव! तुम स्नेहीजनोंद्वारा पराजित हुएकी तरह अचेत-से दीख रहे हो। कुबेर! तुम अपने यक्षाधिपत्यको त्यागकर क्यों भयभीत हो रहे हो?
    रुद्रास्त्रिशूलिनः सन्तो वदध्वं बहुशूलताम्।<br>भवन्तः केन तत्क्षिप्तं तेजस्तु भवतामपि ॥ २४ | रुद्रगण! तुमलोग तो त्रिशूलधारी थे, बताओ तो सही, तुम्हारे त्रिशूलकी विशिष्ट क्षमता कहाँ