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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 611 of 1098

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Page 611
* अध्याय १५४ *६०१

| हतशेषाणि सैन्यानि देवानां विप्रदुद्रुवुः।<br>दिशो भीतानि संत्यज्य रणोपकरणानि तु॥ २१७<br>लोकपालांस्ततो दैत्यो बबन्धेन्द्रमुखान् रणे।<br>सकेशवान् दृढैः पाशैः पशुमारः पशूनिव॥ २१८<br>स भूयो रथमास्थाय जगाम स्वकमालयम्।<br>सिद्धगन्धर्वसंघृष्टविपुलाचलमस्तकम् ॥ २१९<br>स्तूयमानो दितिसुतैरप्सरोभिर्विनोदितः।<br>त्रैलोक्यलक्ष्मीस्तद्देशे प्राविशत् स्वपुरं यथा॥ २२०<br>निषसादासने पद्मरागरत्नविनिर्मिते।<br>ततः किन्नरगन्धर्वनागनारीविनोदितैः।<br>क्षणं विनोद्यमानस्तु प्रचलन्मणिकुण्डलः॥ २२१ | दिया। मरनेसे बचे हुए देवताओंके सैनिकसमूह भयभीत हो युद्ध-सामग्रियोंका त्याग कर चारों दिशाओंमें भाग खड़े हुए। तब उस दैत्यने रणभूमिमें केशवसहित इन्द्र आदि सभी लोकपालोंको सुदृढ़ पाशसे उसी प्रकार बाँध लिया, जैसे कसाई पशुओंको बाँध लेता है। फिर वह रथपर बैठकर अपने उस निवासस्थानकी ओर चल पड़ा, जो सिद्धों एवं गन्धर्वोंसे सेवित एक विशाल पर्वतके शिखरपर अवस्थित था। उस समय उसके मनोरञ्जनके लिये दैत्यगण एवं अप्सराएँ उसकी स्तुति कर रही थीं। उस देशमें त्रिलोकीकी लक्ष्मी इस प्रकार प्रविष्ट हो रही थी मानो अपने नगरमें जा रही हो। वहाँ पहुँचकर वह पद्मराग मणि एवं रत्नोंसे बने हुए सिंहासनपर विराजमान हुआ। तब किंनर, गन्धर्व और नागोंकी स्त्रियाँ उसका मनोविनोद करने लगीं। मन बहलाते समय उसके मणिनिर्मित कुण्डल झलमला रहे थे॥ २१६—२२१॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे देवासुरसंग्रामे तारकजयलाभो नाम त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १५३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके देवासुरसंग्राममें तारक-जयलाभ नामक एक सौ तिरपनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १५३॥


एक सौ चौवनवाँ अध्याय

तारकके आदेशसे देवताओंकी बन्धन-मुक्ति, देवताओंका ब्रह्माके पास जाना और अपनी विपत्तिगाथा सुनाना, ब्रह्माद्वारा तारक-वधके उपायका वर्णन, रात्रिदेवीका प्रसङ्ग, उनका पार्वतीरूपमें जन्म, काम-दहन और रतिकी प्रार्थना, पार्वतीकी तपस्या, शिवपार्वती-विवाह तथा पार्वतीका वीरकको पुत्ररूपमें स्वीकार करना*

| सूत उवाच<br>प्रादुरासीत् प्रतीहारः शुभ्रनीलाम्बुजाम्बरः।<br>स जानुभ्यां महीं गत्वा पिहितास्यः स्वपाणिना॥ १<br>उवाचानाविलं वाक्यमल्पाक्षरपरिस्फुटम्।<br>दैत्येन्द्रमर्कवृन्दानां विभ्रतं भास्वरं वपुः॥ २<br>कालनेमिः सुरान् बद्धांश्चादाय द्वारि तिष्ठति।<br>स विज्ञापयति स्थेयं क्व बन्दिभिरिति प्रभो॥ ३ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो ! तदनन्तर स्वच्छ नीले कमल-सा वस्त्र धारण किये द्वारपाल तारकके सम्मुख उपस्थित हुआ। वह अपने हाथसे मुखको ढके हुए था। उसने घुटनोंके बल पृथ्वीपर माथा टेककर सूर्यसमूहोंके-से उद्दीप्त शरीर धारण करनेवाले दैत्येश्वर तारकसे स्वल्प किंतु स्पष्ट शब्दोंमें निवेदन किया—'प्रभो ! कालनेमि देवताओंको बंदी बनाकर साथ लिये हुए द्वारपर खड़ा है। वह पूछ रहा है कि इन बंदियोंको कहाँ रखा जाय।' |


* मत्स्यपुराणका यह अध्याय पुराण-साहित्यमें सबसे बड़ा दीखता है। पर ये सभी श्लोक ठीक इसी प्रकार शिवपुराण पार्वतीखण्ड १—१०, स्कन्दपुराण महेश्वरखण्ड, केदारखण्ड २५—३५, कौमारिकाखण्ड २१—३१, कालिकापुराण ४४—५०, पद्मपुराण सृष्टिखण्ड ३१—३२ आदिमें भी प्राप्त होते हैं।